9,585 करोड़ रुपये की PARIVARTAN योजना में 2 लाख से अधिक वाहनों के प्रतिस्थापन का लक्ष्य,बैंक और ऑटो कंपनियां भी बनीं साझेदार
विनोद सिंह ‘तकियावाला’
दिल्ली-एनसीआर की हवा को साफ करने की कोशिश में सरकार ने अब उन पहियों पर नजर डाली है,जो वर्षों से सड़कों पर दौड़ रहे हैं और जिनसे निकलने वाला धुआं हवा को लगातार जहरीला बना रहा है। प्रदूषण के कारणों की चर्चा जब भी होती है,वाहनों का नाम प्रमुखता से सामने आता है, लेकिन वाहनों की भी अपनी अलग-अलग श्रेणियां हैं।हर वाहन का प्रदूषण में योगदान एक जैसा नहीं है।खासकर पुराने ट्रक और बसें संख्या में कम होने के बावजूद प्रदूषण फैलाने में कहीं आगे हैं।इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने PARIVARTAN योजना शुरू की है।परियोजना का मकसद साफ है -पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों तथा बसों को सड़कों से हटाकर उनकी जगह BS-VI या उससे बेहतर उत्सर्जन मानक वाले अथवा इलेक्ट्रिक वाहनों को लाया जाए।
सर्वविदित रहे कि विगत 3 जून 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना को मंजूरी दी और 14 जुलाई को इसे शुरू किया गया।अब 27 अगस्त तक इसके पोर्टल पर 1,300 से अधिक लाभार्थी पंजीकरण करा चुके हैं। योजना से 42 बैंक और गैर- बैंकिंग वित्तीय कंपनियां जुड़ चुकी हैं,जबकि 15 ऑटोमोबाइल कंपनियों ने पात्र वाहन मालिकों को निर्धारित छूट देने के लिए समझौते किए हैं।शुरुआत भले ही छोटी दिखाई दे, लेकिन योजना का लक्ष्य काफी बड़ा है।सरकार दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हरियाणा,राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के जिलों में पंजीकृत दो लाख से अधिक पुराने ट्रकों और बसों को बदलना चाहती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इनमें लगभग 1.91 लाख ट्रक और 16,329 बसें शामिल हैं।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली की हवा केवल दिल्ली की सीमा के भीतर नहीं बनती और न ही बिगड़ती है। राष्ट्रीय राजधानी में आने-जाने वाले भारी वाहन पूरे एनसीआर के परिवहन तंत्र का हिस्सा हैं। दिल्ली से बाहर का ट्रक भी दिल्ली की हवा में योगदान देता है और दिल्ली में चलने वाला ट्रक एनसीआर के किसी दूसरे शहर की हवा को प्रभावित करता है। इसलिए प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई भी प्रशासनिक सीमाओं से बाहर जाकर ही प्रभावी हो सकती है। PARIVARTAN का दायरा दिल्ली के साथ हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के एनसीआर जिलों तक रखना इसी सोच का हिस्सा है।योजना की जरूरत को समझने के लिए कुछ आंकड़े काफी हैं।सरकार द्वारा उद्धृत आकलनों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में परिवहन क्षेत्र का योगदान PM2.5 प्रदूषण में करीब 14 प्रतिशत, कार्बन मोनोऑक्साइड में 40 प्रतिशत और नाइट्रोजन ऑक्साइड में लगभग 63 प्रतिशत है। लेकिन असली चिंता भारी वाहनों को लेकर है।ट्रक और बसें कुल वाहन बेड़े का लगभग तीन प्रतिशत हैं,लेकिन PM2.5 उत्सर्जन में उनकी हिस्सेदारी करीब 36 प्रतिशत बताई गई है। यानी सड़क पर उनकी संख्या कम है, मगर प्रदूषण में योगदान बहुत ज्यादा है।पुराने वाहनों के मामले में स्थिति और गंभीर है। सरकारी आकलन के मुताबिक एक प्री- BS भारी वाहन से होने वाला उत्सर्जन लगभग 14 BS-VI वाहनों के बराबर हो सकता है। BS-IV वाहन भी BS-VI वाहन की तुलना में करीब 2.7 गुना अधिक उत्सर्जन करता है। ऐसे में पुराने भारी वाहनों को हटाना प्रदूषण नियंत्रण की उस रणनीति का हिस्सा बन सकता है जिसमें कम संख्या में वाहनों को बदलकर अपेक्षाकृत बड़ा पर्यावरणीय लाभ हासिल किया जा सकता है।हालाँकि यहां यह समझना जरूरी है कि किसी ट्रक या बस मालिक के लिए उसका पुराना वाहन सिर्फ प्रदूषण फैलाने वाली मशीन नहीं है।वही उसकी पूंजी है,वही उसकी रोजी-रोटी है और उसी से उसके परिवार की आमदनी चलती है। ऐसे में केवल यह कह देना कि पुराना वाहन हटाइए, व्यवहारिक समाधान नहीं हो सकता।नया वाहन खरीदने के लिए बड़ी रकम चाहिए,बैंक से कर्ज लेना पड़ता है और कई वर्षों तक EMI चुकानी होती है। इसलिए यदि सरकार वास्तव में पुराने वाहनों को सड़क से हटाना चाहती है तो वाहन मालिक के सामने आर्थिक रूप से आकर्षक विकल्प रखना जरूरी है।
PARIVARTAN में इसी बात पर जोर दिया गया है। पात्रता वाले वाहन मालिक को नए वाहन के ऋण पर पाँच वर्षों तक पाँच प्रतिशत ब्याज बचत का लाभ मिलेगा।नए वाहन पर दस वर्षों के लिए रोड टैक्स की पूरी छूट और पंजीकरण शुल्क से भी राहत दी गई है।दिल्ली,हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकारें इस संबंध मेंअधिसूचनाएं जारी कर चुकी हैं।इसके अलावा योजना में शामिल वाहन निर्माता एक्स-शोरूम कीमत पर कम से कम आठ प्रतिशत की छूट देंगे। यानी सरकार ने वाहन बदलने की लागत को अलग-अलग स्तरों पर कम करने की कोशिश की है।
ईंधन और इलेक्ट्रिक वाहन के मामले में भी योजना ने दोनों विकल्प खुले रखे हैं। BS-VI डीजल या CNG वाहन खरीदने वालों को वाहन की श्रेणी के अनुसार पांच वर्षों तक हर महीने 1,200 रुपये से लेकर 4,800 रुपये तक के ईंधन वाउचर मिलेंगे।इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने वालों के लिए 64,000 रुपये से लेकर 2.56 लाख रुपये तक का एकमुश्त प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसका मतलब यह है कि सरकार एक तरफ तत्काल उपलब्ध स्वच्छ तकनीक वाले BS-VI वाहनों को बढ़ावा दे रही है तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर संक्रमण को भी प्रोत्साहित कर रही है।दिल्ली के मामले में कुछ श्रेणियों के लिए व्यवस्था और कड़ी है। Light Goods Vehicles के लिए इलेक्ट्रिक वाहन को प्राथमिकता नहीं बल्कि अनिवार्यता दी गई है, जबकि बसों के लिए BS-VI CNG या इलेक्ट्रिक विकल्प रखा गया है। इससे साफ है कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए सरकार कुछ वाहन श्रेणियों में अपेक्षाकृत तेज बदलाव चाहती है,लेकिन पुराने वाहन को हटाना तभी प्रभावी होगा जब वह वास्तव में परिवहन व्यवस्था से बाहर हो। यदि पुराना ट्रक दिल्ली से हटकर किसी दूसरे शहर में चलने लगे तो प्रदूषण खत्म नहीं होगा,केवल उसकी जगह बदल जाएगी।इसीलिए योजना में स्क्रैपिंग को भी जोड़ा गया है। BS-III और उससे पुराने वाहनों को पंजीकृत वाहन स्क्रैपिंग सुविधा केंद्र में स्क्रैप करना अनिवार्य है।BS-IV वाहनों के मामले में स्क्रैपिंग अथवा NCR से बाहरगैर-NCAP शहरों या कस्बों में बिक्री का विकल्प दिया गया है।इस व्यवस्था का उद्देश्य पुराने और अधिक प्रदूषणकारी वाहनों को धीरे-धीरे सड़क परिवहन व्यवस्था से बाहर करना है।इस पूरी योजना के लिए सरकार ने 9,585 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया है। इसमें 5,041 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की बजटीय सहायता है। योजना का वित्तपोषण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड के माध्यम से किया जा रहा है और इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के पास है।इतनी बड़ी वित्तीय व्यवस्था बताती है कि सरकार इसे केवल प्रदूषण के मौसम में उठाया गया कोई तात्कालिक कदम नहीं मान रही, बल्कि इसे वाहन बेड़े के दीर्घकालिक बदलाव के रूप में देख रही है।इस बदलाव में बैंक और वाहन निर्माता महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं। 42 बैंक और NBFC के योजना से जुड़ने का अर्थ है कि वाहन मालिकों के लिए ऋण की व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश की गई है। दूसरी ओर 15 ऑटो OEM का जुड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार अकेले नए वाहन खरीदने की लागत कम नहीं कर सकती। निर्माता की छूट और बैंक की वित्तीय सहायता मिलकर ही वाहन मालिक के लिए नया वाहन खरीदना व्यावहारिक बना सकती है।19 अगस्त को राजस्थान के अलवर में महेंद्र सिंह ने PARIVARTAN योजना के तहत पहला नया वाहन खरीदा।किसी योजना की पहली खरीद भले ही प्रतीकात्मक दिखाई दे,लेकिन वह इस बात का संकेत होती है कि सरकारी घोषणा अब वास्तविक लेन-देन में बदलने लगी है।अब इस एक उदाहरण को हजारों और फिर लाखों मामलों तक पहुंचाना योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।क्योंकि 1,300 से अधिक पंजीकरण को अगर करीब 2.07 लाख संभावित लाभार्थियों के लक्ष्य के सामने रखकर देखा जाए तो अभी लंबी दूरी तय करनी बाकी है। योजना की शुरुआत के स्तर पर यह संख्या उत्साहजनक हो सकती है, लेकिन अंतिम सफलता का पैमाना यह नहीं होगा कि कितने लोगों ने पोर्टल पर पंजीकरण कराया। असली सवाल यह होगा कि कितने पुराने ट्रक और बसें वास्तव में सड़क से हटे, कितने नए BS-VI और इलेक्ट्रिक वाहन सड़कों पर आए और इससे दिल्ली-एनसीआर की हवा में कितना सुधार हुआ।इसके लिए जागरूकता भी जरूरी है और प्रक्रिया को आसान बनाना भी। सरकार ने पेट्रोल पंपों, ट्रांसपोर्ट नगरों, टोल प्लाजा और RTO कार्यालयों तक अभियान पहुंचाने की कोशिश शुरू कर दी है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल माध्यमों के जरिए वाहन मालिकों को योजना की जानकारी दी जा रही है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि योजना का वास्तविक लाभ उसी समय मिलेगा जब वाहन मालिक को यह स्पष्ट समझ आएगा कि पुराना वाहन छोड़ने और नया वाहन खरीदने पर उसकी जेब पर कुल कितना असर पड़ेगा।PARIVARTAN की सफलता का एक दूसरा पहलू भी है।यह योजना केवल प्रदूषण नियंत्रण की कोशिश नहीं, बल्कि वाणिज्यिक वाहन क्षेत्र के आधुनिकीकरण का अवसर भी बन सकती है।नए वाहन अपेक्षाकृत बेहतर तकनीक वाले होंगे,ईंधन दक्षता बढ़ सकती है और परिवहन क्षेत्र धीरे-धीरे अधिक स्वच्छ तकनीक की ओर बढ़ सकता है। यदि इलेक्ट्रिक वाहनों का हिस्सा बढ़ता है तो आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव केवल उत्सर्जन तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता पर भी पड़ेगा।फिर भी उम्मीदों और वास्तविकता के बीच की दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।दो लाख से अधिक वाहनों को बदलना आसान काम नहीं है।छोटे ट्रांसपोर्टरों की वित्तीय क्षमता, बैंक ऋण की शर्तें,नए वाहनों की उपलब्धता, स्क्रैपिंग की सुविधाएं और राज्यों के विभागों के बीच समन्वय -इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।यदि इनमें से किसी एक कड़ी में कमजोरी आई तो योजना की गति प्रभावित हो सकती है।दिल्ली-एनसीआर की प्रदूषण समस्या का समाधान निश्चित रूप से किसी एक योजना से नहीं होगा।पराली,धूल,निर्माण गतिविधियां,औद्योगिक प्रदूषण, मौसम और परिवहन -इन सभी पर समानांतर काम करना होगा। लेकिन जहाँ कुल वाहन बेड़े के करीब तीन प्रतिशत भारी वाहन PM2.5 उत्सर्जन में लगभग 36 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हों, वहां पुराने ट्रकों और बसों को बदलने की पहल को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
PARIVARTAN ने कम से कम दिशा स्पष्ट कर दी है।पुराने वाहन को केवल प्रतिबंधित करने के बजाय उसे बदलने का आर्थिक रास्ता दिया गया है। बैंक को साथ लिया गया है,वाहन निर्माता को साथ लिया गया है और राज्यों को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है।अब सरकार के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि इस व्यवस्था का लाभ कागज और पोर्टल से निकलकर वास्तविक वाहन मालिक तक पहुंचे।1,300 से अधिक पंजीकरण इस यात्रा की शुरुआत हैं। लक्ष्य करीब 2.07 लाख पुराने ट्रकों और बसों का है। इनके बीच का फासला बहुत बड़ा है,लेकिन यही फासला इस योजना की असली परीक्षा भी है।
आखिर दिल्ली-एनसीआर की हवा सरकारी आंकड़ों से नहीं बदलेगी।हवा तब बदलेगी जब सड़क पर दौड़ते पुराने,धुआँ उगलते पहिए सचमुच कम होंगे और उनकी जगह स्वच्छ तकनीक वाले नए पहिए दिखाई देंगे। PARIVARTAN की सफलता इसी बदलाव की गति से तय होगी।अगर यह योजना अपने लक्ष्य तक पहुंचती है तो यह केवल पुराने वाहनों का प्रतिस्थापन नहीं होगा,बल्कि दिल्ली-एनसीआर के परिवहन तंत्र के चरित्र में बदलाव की शुरुआत भी साबित हो सकती है।





