रत्नज्योति दत्ता
नई दिल्ली : पुलिस को प्राप्त व्यापक अधिकारों और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कायम करने की आवश्यकता पर पूर्व केंद्रीय सुरक्षा सचिव एवं आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद की पुस्तक ‘पुलिसिंग द रिपब्लिक’ के विमोचन के दौरान गंभीर चर्चा हुई।
न्यायपालिका, राजनीति और पुलिस से जुड़े वक्ताओं ने पुलिस की जवाबदेही बढ़ाने तथा संस्थागत सुधारों की जरूरत पर जोर दिया।
ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठान में आजाद के अनुभवों के आधार पर अपराध और भ्रष्टाचार से निपटने की चुनौतियों के साथ-साथ कानून लागू करने वाली एजेंसियों की संवैधानिक अधिकारों के प्रति जवाबदेही की पड़ताल करती है।
उद्घाटन संबोधन में 4 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र में पुलिस व्यवस्था संविधान और कानून के शासन से मजबूती से जुड़ी होनी चाहिए।
हिरासत में होने वाली मौतों पर सवाल उठाते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, “क्या किसी नागरिक को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद उसके जीवन के मौलिक अधिकार से वंचित किया जा सकता है? क्या गिरफ्तारी के साथ ही नागरिक के जीवन के अधिकार को स्थगित किया जा सकता है?”
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक डी.के. बसु फैसले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “कानून के शासन से संचालित सभ्य समाज में हिरासत में मौत शायद सबसे जघन्य अपराधों में से एक है।”
फर्जी मुठभेड़ों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए भुइयां ने कहा, “मुठभेड़ की विचारधारा एक आपराधिक विचारधारा है।” उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाइयां कानून के शासन को कमजोर करती हैं।
उन्होंने पुलिस की संस्थागत स्वतंत्रता पर भी जोर देते हुए कहा, “पुलिस की प्रतिबद्धता, निष्ठा और जवाबदेही केवल कानून के शासन के प्रति होनी चाहिए।”
इसके बाद पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री एवं सांसद पी. चिदंबरम, महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक डी. सिवानंदन और आजाद की भागीदारी में परिचर्चा हुई। इंडिया टुडे की प्रबंध संपादक मरिया शकील ने इसका संचालन किया।
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन ने पुस्तक की भूमिका लिखी है।
चिदंबरम ने सुरक्षा उपायों और संस्थागत तंत्र के बावजूद हिरासत में मौतों के जारी रहने पर सवाल उठाया। केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के कामकाज को सुव्यवस्थित करने और उसके संस्थागत ढांचे का भी उल्लेख किया।
महाराष्ट्र पुलिस का नेतृत्व कर चुके सिवानंदन ने हिरासत में होने वाली मौतों, विशेषकर न्यायिक हिरासत में मौतों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इंटरपोल का मानना है कि हिरासत में होने वाली मौतों को समाप्त किया जा सकता है।
आजाद ने कहा कि पुस्तक के जरिए उन्होंने भ्रष्टाचार और संस्थानों के क्षरण से जुड़े मुद्दों को व्यापक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास किया है।





