हनुमान अंश : भारत की जड़ों से संवाद करती फिल्म

Hanuman Ansh: A film that engages with India's roots

सुरेश हिंदुस्तानी

भारत को समझना हो तो उसकी जड़ों तक जाना होगा और भारत की जड़ों को समझना हो तो उसकी आध्यात्मिक चेतना को अनुभव करना होगा। इसी चेतना का एक उज्ज्वल प्रतिबिंब है ‘हनुमान अंश’। यह केवल एक फिल्म नहीं, भारतीय जीवन-दर्शन की उस धारा का सिनेमाई रूप है, जो मनुष्य को उसकी मिट्टी, उसकी आस्था, उसकी संस्कृति और उसकी आत्मिक पहचान से जोड़ती है। भारत वह भूमि है, जिसकी आत्मा प्रकाश में रमी हुई है। ‘हनुमान अंश’ इसी प्रकाश का एक चलचित्र है। इसकी चमक केवल पर्दे पर दिखाई देने वाली रोशनी नहीं, बल्कि दर्शक के भीतर जागने वाली अनुभूति है। यही कारण है कि यह फिल्म धीरे-धीरे दर्शकों के मन में स्थान बनाती गई और देखते ही देखते एक असाधारण सिनेमाई घटना में परिवर्तित हो गई। फिल्म की यात्रा भी अपने आप में एक कहानी है। शुरुआत में इसका प्रदर्शन सीमित रहा। प्रचार का विस्तार भी अपेक्षाकृत छोटा था। पहले दिन इसकी कमाई लगभग दस लाख रुपये रही और शुरुआती सप्ताह में भी इसकी गति साधारण रही। लेकिन भारतीय समाज की एक विशेषता है, जब कोई कथा उसके मन की गहराई को छू लेती है, तब उसके प्रचार का माध्यम स्वयं समाज बन जाता है। यही ‘हनुमान अंश’ के साथ हुआ।

दर्शकों ने फिल्म देखी, अनुभव की और फिर उसके बारे में अपने परिवार, मित्रों और परिचितों से बात की। धीरे-धीरे वर्ड ऑफ माउथ ने वह काम किया, जिसे बड़े प्रचार अभियान भी हमेशा नहीं कर पाते। शो बढ़ने लगे, दर्शकों की संख्या बढ़ी और तीसरे-चौथे सप्ताह तक फिल्म ने ऐसी छलांग लगाई कि व्यापार विश्लेषक भी इसकी गति को असाधारण मानने लगे। एक रिपोर्ट के अनुसार चौथे सप्ताह तक फिल्म भारत में 70 करोड़ से अधिक की कमाई कर चुकी थी और इसके शो शुरुआती संख्या से कई गुना बढ़ गए। आज उपलब्ध बॉक्स ऑफिस आंकड़े इस यात्रा को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। लगभग 2 करोड़ के बजट में बनी फिल्म ने 100 करोड़ के आसपास की कमाई का आंकड़ा पार किया है। यह अनुपात अपने आप में भारतीय सिनेमा के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। यहाँ प्रश्न केवल कमाई का नहीं है। असली प्रश्न है दर्शकों ने इसमें ऐसा क्या देखा, जो उन्हें बार-बार सिनेमाघर तक ले गया? उत्तर शायद इसकी कथा की आत्मीयता में छिपा है।

‘हनुमान अंश’ नीम करोली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक प्रभाव से प्रेरित फिल्म है। उनके जीवन में भक्ति, सेवा, प्रेम, करुणा और मानवता के भाव प्रमुख रहे। फिल्म ने इन्हीं भावों को केंद्र में रखकर एक ऐसी कथा प्रस्तुत की, जिसमें आध्यात्मिकता जीवन से अलग दिखाई देने वाली अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन को अर्थ देने वाली अनुभूति बन जाती है।

आज का युवा संसार अत्यंत तीव्र गति से बदल रहा है। तकनीक, सोशल मीडिया, प्रतिस्पर्धा और उपलब्धियों की दौड़ ने जीवन की गति बढ़ाई है। ऐसे समय में मन को ठहराव देने वाली कथा, आत्मा को स्पर्श करने वाला विचार और अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों से जोड़ने वाला अनुभव स्वाभाविक रूप से आकर्षण पैदा करता है। ‘हनुमान अंश’ की लोकप्रियता में इसी भावभूमि की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है। कुछ विश्लेषणों ने भी इसकी सफलता को ऐसी कहानियों के प्रति दर्शकों की बढ़ती रुचि से जोड़ा है, जो उन्हें शांति और अपनी संस्कृति से जुड़ाव का अनुभव देती हैं। इस सफलता ने भारतीय फिल्म उद्योग के सामने एक महत्वपूर्ण विचार भी रखा है कि बजट फिल्म की भव्यता रच सकता है, लेकिन दर्शकों का प्रेम उसकी आत्मा तय करता है।

बड़े सितारे, विशाल सेट, महंगा प्रचार और भारी निवेश अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, किंतु अंततः सिनेमा दर्शक के हृदय में स्थान बनाकर ही दीर्घजीवी होता है। ‘हनुमान अंश’ ने सीमित संसाधनों के साथ जिस तरह दर्शकों तक अपनी पहुँच बनाई, वह इस बात का उदाहरण है कि कहानी में आत्मीयता हो, भाव में प्रामाणिकता हो और विषय समाज की चेतना से जुड़ा हो, तो दर्शक स्वयं उसके सबसे प्रभावशाली प्रचारक बन जाते हैं।

इसी समय बड़े बजट की कुछ फिल्मों का अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन भी चर्चा में रहा। ‘टॉक्सिक’ और ‘बंटवारा 1947’ जैसी फिल्मों के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन की तुलना में ‘हनुमान अंश’ की यात्रा ने बजट और दर्शक-स्वीकृति के संबंध पर नए सिरे से विमर्श को जन्म दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण संकेत इसके दर्शक वर्ग से मिलता है। युवा पीढ़ी का इस तरह की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कथा की ओर आकर्षित होना भारतीय समाज की बदलती रुचियों का संकेत माना जा सकता है। यह परिवर्तन केवल फिल्म की सफलता तक सीमित नहीं है। यह उस सांस्कृतिक आत्मविश्वास की ओर संकेत करता है, जिसमें आधुनिकता के साथ अपनी जड़ों के प्रति सम्मान भी समान रूप से उपस्थित है। यही ‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसने दर्शकों को केवल एक फिल्म नहीं दी, बल्कि एक अनुभव दिया- अपनी मिट्टी को देखने का, अपनी परंपरा को महसूस करने का और अपनी सांस्कृतिक स्मृति से संवाद करने का अनुभव। सिनेमा के पर्दे पर चलती तस्वीरें कुछ घंटों में समाप्त हो जाती हैं, लेकिन कुछ कथाएँ दर्शक के भीतर आगे चलती रहती हैं। ‘हनुमान अंश’ ऐसी ही कथा बनती दिखाई दे रही है। इसलिए इसकी सफलता को केवल बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों में देखना अधूरा होगा। इसकी वास्तविक सफलता उस क्षण में है, जब कोई युवा सिनेमाघर से बाहर निकलकर अपने भीतर एक प्रश्न, एक अनुभूति और अपनी जड़ों से जुड़ने की एक नई आकांक्षा लेकर लौटता है। ‘हनुमान अंश’ भारत की उस जड़ का स्पर्श है, जिससे उसकी चेतना सदियों से पोषित होती आई है। यह उस प्रकाश की एक किरण है, जिसमें भारत स्वयं को पहचानता है।