प्रीति पांडेय
यूपीआई को लेकर बाजार में इन दिनों एक नई बहस छिड़ी हुई है। सरकार लगातार स्पष्ट कर रही है कि आम ग्राहक से यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और छोटे व्यापारियों के लिए भी बड़ी संख्या में लेन-देन पहले की तरह शुल्क-मुक्त रहेंगे। इसके बावजूद बाजार के कई हिस्सों में व्यापारी ग्राहकों से यूपीआई के बजाय नकद भुगतान मांगने लगे हैं। इससे ग्राहक भी असमंजस में हैं कि आखिर यूपीआई पर नया नियम आया क्या है, किसे शुल्क देना होगा और क्या आने वाले दिनों में डिजिटल भुगतान महंगा हो सकता है?
दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ Merchant Discount Rate यानी MDR से जुड़ी व्यवस्था और उससे संबंधित कानून में किया गया बदलाव है। समस्या सिर्फ शुल्क की नहीं है। असली चुनौती यह है कि नियमों की तकनीकी भाषा, सरकारी स्पष्टीकरण और बाजार में उसकी व्यावहारिक समझ के बीच अभी भी काफी अंतर दिखाई दे रहा है।
आखिर नया बदलाव क्या है?
अगस्त 2026 में संसद से पारित Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 के जरिए Payment and Settlement Systems Act, 2007 में बदलाव किया गया। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य सीधे तौर पर ग्राहकों पर यूपीआई शुल्क लगाना नहीं है, बल्कि भविष्य में कुछ श्रेणियों के डिजिटल व्यापारी लेन-देन पर शुल्क व्यवस्था बनाने के लिए कानूनी आधार तैयार करना है।
इसके बाद 15 सितंबर 2026 को सरकार ने मौजूदा व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए बताया कि ₹2,000 तक के व्यापारी भुगतान पर MDR शून्य रहेगा। इसके अलावा निर्धारित श्रेणी में आने वाले छोटे व्यापारी भी शून्य-MDR व्यवस्था में बने रहेंगे।
सरकार के मुताबिक फिलहाल ₹2,000 से अधिक के कुछ P2M यानी Person-to-Merchant लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन के लिए प्रति लेन-देन MDR की अधिकतम सीमा ₹300 बताई गई है। कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग फ्लैट शुल्क और पूंजी बाजार से जुड़े लेन-देन के लिए अलग दर निर्धारित की गई है।
यानी यह समझना जरूरी है कि हर यूपीआई भुगतान पर शुल्क नहीं लगाया गया है।
ग्राहक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है?
ग्राहकों के बीच सबसे बड़ा डर यही है कि कहीं दुकान पर यूपीआई से भुगतान करने पर उनसे अतिरिक्त पैसा तो नहीं लिया जाएगा।
सरकार का स्पष्ट कहना है कि MDR ग्राहक से वसूल किया जाने वाला शुल्क नहीं है। यह व्यापारी भुगतान से जुड़े बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और यूपीआई ऐप जैसे भुगतान इकोसिस्टम के प्रतिभागियों के बीच वितरित होने वाला शुल्क है। सरकार ने यह भी कहा है कि बैंक यह सुनिश्चित करें कि व्यापारी MDR का बोझ ग्राहक पर न डालें।
यूपीआई ऐप प्रदाताओं को भी प्लेटफॉर्म या छिपा हुआ शुल्क लगाने की अनुमति नहीं होने की बात सरकार ने कही है।
इसलिए सामान्य ग्राहक के लिए संदेश फिलहाल सीधा है—₹2,000 तक के सामान्य व्यापारी भुगतान पर MDR नहीं है और ग्राहक से MDR लेने का प्रावधान नहीं है।
फिर बाजार में भ्रम क्यों है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
एक तरफ सरकार कह रही है कि ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा। दूसरी तरफ कुछ दुकानदार यूपीआई की जगह कैश मांगने लगे हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यापारी नया शुल्क ग्राहक से वसूल रहा है। बल्कि इसके पीछे कई व्यावहारिक कारण हो सकते हैं।
पहला कारण है जानकारी का अधूरा पहुंचना।
MDR क्या है, P2M क्या है, ₹2,000 की सीमा किस प्रकार के लेन-देन पर लागू होती है, छोटे व्यापारी के लिए शून्य-MDR व्यवस्था कैसे काम करेगी—ये सब सामान्य दुकानदार के लिए तकनीकी विषय हैं। कानून और सरकारी स्पष्टीकरण की भाषा बाजार में ग्राहक और दुकानदार तक अक्सर बहुत सरल रूप में पहुंचती है—“यूपीआई पर अब चार्ज लगेगा।”
यहीं से भ्रम पैदा होता है।
दुकानदारों की चिंता क्या है?
व्यापारियों के लिए यूपीआई केवल भुगतान का माध्यम नहीं रह गया है। यह रोजमर्रा के कारोबार का हिस्सा बन चुका है। National Payments Corporation of India के आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2026 में यूपीआई पर करीब 24.51 अरब लेन-देन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग ₹29.82 लाख करोड़ था।
ऐसे में अगर किसी व्यापारी को यह आशंका हो कि उसके कुछ लेन-देन पर MDR लगेगा, तो वह अपने भुगतान खर्च को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल करेगा।
व्यापारी की चिंता को इस तरह समझा जा सकता है:
“अगर यूपीआई भुगतान मेरे लिए लागत पैदा करेगा तो मेरे कारोबार पर उसका असर कितना होगा?”
यही वह बिंदु है जहां ग्राहक और दुकानदार के हित आपस में टकराते दिखाई दे सकते हैं।
सरकार कह रही है कि MDR ग्राहक पर नहीं डाला जाना चाहिए। लेकिन व्यापारी के नजरिए से यह सवाल फिर भी बना रहता है कि अगर उसकी लागत बढ़ती है तो वह लागत उसके मुनाफे को प्रभावित करेगी या कारोबार के दूसरे हिस्से में समायोजित होगी।
यही वजह है कि कुछ कारोबारी नकद भुगतान को प्राथमिकता देने लगें तो इसे केवल “नियम की गलत समझ” कहकर खत्म कर देना बाजार की वास्तविक चिंता को पूरी तरह समझना नहीं होगा।
₹2,000 की सीमा ने भी सवाल बढ़ाए
नए ढांचे में ₹2,000 की सीमा महत्वपूर्ण है।
मसलन, किसी ग्राहक ने ₹1,500 का सामान खरीदा तो सामान्य P2M भुगतान पर MDR नहीं लगेगा। लेकिन ₹5,000 के किसी पात्र व्यापारी लेन-देन के मामले में MDR का सवाल पैदा हो सकता है।
यहीं पर ग्राहकों के मन में दूसरा सवाल आता है—
“क्या दुकानदार अब बड़े भुगतान को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने को कहेगा?”
या फिर—
“क्या व्यापारी अतिरिक्त रकम मांगेगा?”
सरकारी व्यवस्था के अनुसार MDR ग्राहक पर नहीं डाला जाना चाहिए। लेकिन व्यवहार में बाजार व्यवस्था कितनी पारदर्शी रहती है, यह निगरानी और अनुपालन पर निर्भर करेगा।
इसलिए नियम का कागज पर स्पष्ट होना और उसका बाजार में सही तरीके से लागू होना—दो अलग बातें हैं।
छोटे दुकानदारों को लेकर सरकार ने क्या कहा है?
यहां सरकार का स्पष्टीकरण खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
सरकार के अनुसार P2PM श्रेणी में आने वाले छोटे व्यापारी, जिनमें स्ट्रीट वेंडर और मोहल्ले की छोटी दुकानें शामिल हैं, यदि वे यूपीआई QR के माध्यम से निर्धारित सीमा के भीतर भुगतान प्राप्त करते हैं तो उन्हें शून्य MDR का लाभ मिलता रहेगा। सरकार ने ₹1 लाख प्रति माह तक के भुगतान प्राप्त करने वाले ऐसे छोटे व्यापारियों को इस सुरक्षा के दायरे में बताया है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि “हर दुकानदार को अब यूपीआई पर 0.4 प्रतिशत देना होगा”—यह निष्कर्ष सही नहीं है।
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक MDR लगभग 4 प्रतिशत व्यापारी लेन-देन पर लागू होगा और करीब 96 प्रतिशत P2M लेन-देन प्रभावित नहीं होंगे।
फिर भी व्यापारी कैश क्यों मांग सकता है?
यहां हमें कानून और बाजार के व्यवहार के बीच अंतर समझना होगा।
किसी दुकानदार का कैश मांगना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उस पर निश्चित रूप से MDR का बोझ पड़ा है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—
नियम की अधूरी जानकारी।
भविष्य में शुल्क बढ़ने की आशंका।
बड़े यूपीआई लेन-देन पर संभावित लागत को लेकर चिंता।
बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर की व्यवस्था को लेकर भ्रम।
नकद और डिजिटल भुगतान के बीच हिसाब-किताब की अपनी सुविधा।
दूसरे व्यापारियों से मिली अपुष्ट जानकारी।
सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप पर चल रही अधूरी खबरें।
इसलिए बाजार में दिखाई देने वाला कैश की ओर झुकाव फिलहाल नियम के वास्तविक आर्थिक प्रभाव और नियम को लेकर बनी धारणा—दोनों का मिश्रण हो सकता है।
सरकार को आखिर ऐसा बदलाव करने की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार का तर्क है कि यूपीआई का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ा है, उसके साथ उसके पीछे की तकनीकी व्यवस्था, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने की क्षमता और भुगतान ढांचे में लगातार निवेश की जरूरत है।
जुलाई 2026 में यूपीआई पर 2,366 करोड़ लेन-देन हुए थे, जिनकी कुल राशि ₹29.9 लाख करोड़ बताई गई थी।
इतने बड़े पैमाने पर चलने वाले भुगतान नेटवर्क को लगातार सर्वर क्षमता, साइबर सुरक्षा, जोखिम प्रबंधन, फ्रॉड मॉनिटरिंग और तकनीकी उन्नयन की आवश्यकता होती है।
सरकार का कहना है कि केवल सब्सिडी पर निर्भर रहकर यूपीआई के अगले चरण की वृद्धि को लंबे समय तक बनाए रखना उचित नहीं होगा। इसी वजह से एक ऐसा ढांचा तैयार करने की जरूरत बताई गई है जिसमें भुगतान इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों के लिए सीमित और लक्षित राजस्व मॉडल उपलब्ध हो सके।
अभी उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों और नियमों से ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
यूपीआई का इस्तेमाल बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है और सरकार ने साफ किया है कि P2P भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेगा। साथ ही ₹2,000 तक के व्यापारी भुगतान और निर्धारित छोटे व्यापारियों की शून्य-MDR व्यवस्था भी जारी है।
इसलिए फिलहाल इसे “यूपीआई महंगा हो गया” कहना वास्तविक व्यवस्था को जरूरत से ज्यादा सरल बनाना होगा।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सही है कि बड़े व्यापारी भुगतान के लिए शुल्क व्यवस्था आने से व्यापारियों की लागत को लेकर नई चर्चा शुरू हुई है। बाजार इसी संभावित लागत और उसके भविष्य के प्रभाव को लेकर सतर्क है।
असली चुनौती नियम नहीं, भरोसा है
यूपीआई की सफलता की सबसे बड़ी वजह केवल तकनीक नहीं रही है। लोगों को यह भरोसा रहा कि QR कोड स्कैन करो, भुगतान करो और काम खत्म।
अगर किसी ग्राहक को दुकान पर पहुंचकर पहली बार सुनना पड़े कि “यूपीआई नहीं, कैश दो”, तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होगा कि आखिर हुआ क्या है।
इसी तरह दुकानदार को अगर अलग-अलग जगहों से अलग-अलग जानकारी मिले तो वह भी सुरक्षित विकल्प के तौर पर नकद को चुन सकता है।
इसलिए इस समय सबसे ज्यादा जरूरत स्पष्ट और सरल संचार की है।
सरकार, बैंक, NPCI और भुगतान ऐप कंपनियों को यह बात बेहद सरल भाषा में बतानी होगी कि—
किस भुगतान पर शुल्क है, किस पर नहीं है, किसे देना है, किसे नहीं देना है और ग्राहक से अतिरिक्त रकम लेने की अनुमति है या नहीं।
जब यह जानकारी हर व्यापारी तक स्पष्ट रूप से पहुंच जाएगी, तभी बाजार में पैदा हुआ भ्रम कम होगा।
ग्राहक क्या समझे?
फिलहाल ग्राहक के लिए पांच बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं।
P2P यानी व्यक्ति से व्यक्ति यूपीआई भुगतान मुफ्त रहेगा, राशि कितनी भी हो।
₹2,000 तक के सामान्य P2M भुगतान पर MDR नहीं है।
पात्र छोटे व्यापारियों के लिए शून्य-MDR व्यवस्था जारी है।
MDR ग्राहक से वसूल किया जाने वाला शुल्क नहीं है; सरकार ने व्यापारियों द्वारा इसे ग्राहक पर डालने से रोकने के लिए बैंकों को निर्देशित करने की बात कही है।
₹2,000 से ऊपर के कुछ व्यापारी लेन-देन पर MDR लागू हो सकता है, इसलिए बड़े व्यापारिक भुगतान के मामले में नियम की श्रेणी महत्वपूर्ण हो जाती है।व्यापारी के लिए सबसे बड़ा सवाल क्या है?
व्यापारी वर्ग की नाराज़गी को समझने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि “ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा।”
व्यापारी यह भी जानना चाहता है कि—
“अगर लागत मेरी तरफ आ रही है तो मेरे छोटे या बड़े कारोबार पर उसका वास्तविक असर क्या होगा?”
यही सवाल आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण रहेगा।
सरकार ने 2026 में कानून में बदलाव को यूपीआई की दीर्घकालिक स्थिरता, तकनीकी उन्नयन और वित्तीय समावेशन से जोड़ा है। वहीं बाजार के लिए चुनौती यह है कि इस नई व्यवस्था की लागत और नियमों को लेकर स्पष्टता कितनी जल्दी आती है।
यूपीआई पर डर से ज्यादा जरूरत है स्पष्ट जानकारी की
यूपीआई के नए नियम को लेकर बाजार में पैदा हुई बेचैनी को केवल अफवाह कहकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा। दूसरी ओर, यह कहना भी सही नहीं होगा कि अब हर यूपीआई भुगतान पर ग्राहक से शुल्क लिया जाएगा।
वास्तविक तस्वीर इससे अधिक जटिल है।
सामान्य ग्राहक के लिए यूपीआई अभी भी मुफ्त है। छोटे भुगतान और बड़ी संख्या में व्यापारी लेन-देन पर भी शुल्क नहीं है। लेकिन कुछ बड़े व्यापारी लेन-देन में MDR की व्यवस्था लागू हुई है, जिसने व्यापारियों के बीच लागत और भविष्य को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
अब असली परीक्षा नियम बनाने की नहीं, बल्कि नियम को बाजार तक साफ-साफ पहुंचाने और उसके पालन को सुनिश्चित करने की है।
अगर दुकानदार को पता हो कि उस पर कौन-सा शुल्क लागू है, ग्राहक को पता हो कि उससे क्या वसूला जा सकता है और बैंक तथा पेमेंट कंपनियां नियमों को पारदर्शी तरीके से लागू करें, तो भ्रम काफी हद तक खत्म हो सकता है।
लेकिन अगर जानकारी अधूरी रही, सोशल मीडिया पर आधी-अधूरी खबरें चलती रहीं और बाजार में ग्राहक से अलग-अलग रकम मांगी जाने लगी, तो समस्या आर्थिक लागत से ज्यादा विश्वास की बन सकती है।
और यूपीआई जैसी व्यवस्था के लिए, जिसका आधार ही लोगों का डिजिटल भुगतान पर भरोसा है, यही सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।





