संजय सक्सेना
लखनऊ से रायबरेली तक की महज अठहत्तर किलोमीटर की दूरी बुधवार को उत्तर प्रदेश की राजनीति में हजारों किलोमीटर लंबी बहस में बदल गई। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने नए हाईटेक पीडीए रथ पर सवार होकर जिस दिन रायबरेली पहुंचे, उसी दिन से यह सवाल हर गली-चौराहे पर गूंजने लगा कि आखिर 2027 के विधानसभा चुनाव की शुरुआत के लिए कांग्रेस के इस पुश्तैनी गढ़ को ही क्यों चुना गया। जवाब उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है। यह फैसला महज एक जिले तक सीमित नहीं, बल्कि सपा की पूरी चुनावी रणनीति, गठबंधन की सौदेबाजी और सामाजिक समीकरण साधने की सोची-समझी चाल का हिस्सा है। सबसे पहले आंकड़ों की बात। 2022 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली की छह सीटों में से सपा ने चार पर कब्जा जमाया था। बछरावां से श्याम सुंदर भारती, हरचंदपुर से राहुल लोधी, सरेनी से देवेंद्र प्रताप सिंह और ऊंचाहार से मनोज पांडेय, चारों सपा के टिकट पर जीते थे। बाद में मनोज पांडेय पाला बदलकर भाजपा में चले गए और आज योगी सरकार में मंत्री हैं। इसके बावजूद तीन विधायकों के साथ रायबरेली आज भी सपा के लिए पूरी तरह बेगानी जमीन नहीं है। यही आंकड़ा अखिलेश को यह भरोसा देता है कि गांधी परिवार की परंपरागत सीट में भी उनकी पार्टी की जड़ें उतनी कमजोर नहीं जितनी बाहर से दिखती हैं।
तात्कालिक वजह भी कम दिलचस्प नहीं। सत्रह सितंबर को रायबरेली के फिरोज गांधी डिग्री कॉलेज में सदस्यता अभियान के दौरान समाजवादी छात्र सभा और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई थी। मामला बढ़ा तो सपा जिलाध्यक्ष और कोतवाल के बीच तीखी बहस का वीडियो वायरल हो गया। विधायक राहुल लोधी ने पुलिस पर पिटाई का आरोप लगाया, जिसे पुलिस ने पूरी तरह खारिज किया। लेकिन अखिलेश यादव ने इस स्थानीय विवाद को हाथोंहाथ लपक लिया और इसे सीधे पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज पर हमला करार दे दिया। एक कॉलेज परिसर की मामूली नोकझोंक को राष्ट्रीय स्तर के सामाजिक न्याय के नैरेटिव में बदल देना, यही अखिलेश की राजनीति की पुरानी पहचान रही है और इस बार भी उन्होंने वही दांव चला। गठबंधन की सियासत इस पूरी कहानी का सबसे पेचीदा हिस्सा है। सपा और कांग्रेस इंडिया गठबंधन के साथी हैं, लेकिन सीट बंटवारे पर बातचीत अभी अटकी हुई है। लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस यूपी में ज्यादा सीटों की मांग कर रही है, जबकि सपा खुद को राज्य में बड़े भाई की भूमिका में देखती है। ऐसे हालात में राहुल गांधी के अपने संसदीय क्षेत्र में रथ उतारना कोई इत्तेफाक नहीं। यह कांग्रेस को साफ संकेत है कि सपा उसके सबसे मजबूत किले में भी अपनी दावेदारी छोड़ने वाली नहीं। पार्टी का दावा है कि हर विधानसभा सीट पर भाजपा के 2022 के वोटों में सत्ताईस हजार तक की सेंध लगाई जा सकती है। यह दावा भले ही स्वतंत्र रूप से सत्यापित न हो, लेकिन इससे सपा का इरादा जरूर झलकता है कि वह सिर्फ यादव-मुस्लिम समीकरण तक सीमित रहने वाली पार्टी नहीं रह गई है।
रथ का पहला पड़ाव भी संदेशों से भरा है। बछरावां सीमा के पास चुरुआ में रथ पर सवार होने के बाद अखिलेश सीधे हरचंदपुर विधायक राहुल लोधी के घर पहुंचे, जो गैर-यादव ओबीसी चेहरा हैं। इसके साथ बछरावां के दलित विधायक श्याम सुंदर भारती की मौजूदगी भी तय की गई। लोधी और पासी, दोनों समुदायों का रायबरेली की सियासत में खासा असर है और सपा इन्हीं वोट बैंकों में यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़कर सेंध लगाना चाहती है। जीआईसी मैदान की जनसभा में अखिलेश ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने के साथ-साथ भाजपा सरकार पर पुलिस के जरिए पीडीए समाज को दबाने का आरोप भी दोहराया। इतिहास पर नजर डालें तो अखिलेश की रथ यात्राओं का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है। 2012 में बारह सितंबर 2011 को शुरू हुई क्रांति रथ यात्रा के बाद सपा को पूर्ण बहुमत मिला था और पार्टी दो सौ चौबीस सीटों पर जीती थी। इसके उलट 2017 की विकास रथ यात्रा बुरी तरह नाकाम रही, तब सपा महज सैंतालीस सीटों पर सिमट गई थी जबकि भाजपा को तीन सौ बारह सीटें मिली थीं। 2022 में गाजीपुर से शुरू हुई समाजवादी विजय रथ यात्रा के बाद पार्टी का वोट शेयर तो बढ़ा और एक सौ ग्यारह सीटें मिलीं, लेकिन सरकार नहीं बन सकी। यानी रथ यात्रा हमेशा जीत की गारंटी नहीं रही, फिर भी यह अखिलेश की चुनावी शैली का स्थायी हिस्सा बन चुकी है।
विरोधी खेमे ने भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने तंज कसा कि अखिलेश साइकिल छोड़कर रथ पर सवार होकर सिर्फ कांग्रेस को शक्ति प्रदर्शन दिखाना चाहते हैं। मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने पीडीए को परमानेंट डिवाइडेड अलायंस बताते हुए सवाल उठाया कि लोधी समाज के दिग्गज नेता कल्याण सिंह के घर श्रद्धांजलि देने अखिलेश कभी क्यों नहीं गए। लखनऊ-रायबरेली मार्ग पर अखिलेश के खिलाफ पोस्टर भी लगे, जिनमें बीस करोड़ की वैनिटी वैन और सड़क निर्माण को लेकर सवाल पूछे गए। यह पोस्टरबाजी बताती है कि रायबरेली में जमीनी विरोध भी उतना ही सक्रिय है जितना सपा का उत्साह।कुल मिलाकर देखें तो रायबरेली से निकला यह रथ केवल एक जिले का दौरा नहीं, बल्कि तीन मोर्चों पर एक साथ चली गई चाल है। एक तरफ जातीय समीकरण को धार देकर ओबीसी-दलित सामाजिक अभियांत्रिकी मजबूत करने की कोशिश है, दूसरी तरफ कांग्रेस पर सीट बंटवारे की मेज से पहले मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति है, और तीसरी तरफ पार्टी कैडर को 2027 के लिए सक्रिय मोड में लाने का इरादा है। असली परीक्षा अभी बाकी है। मंच से भाषण देना आसान है, लेकिन उसे बूथ तक पहुंचाना कठिन काम है। रथ की धूल में 2027 के कई सियासी चेहरे झलक रहे हैं, मगर उनकी असली तस्वीर आने वाले महीनों की गठबंधन बातचीत और जमीनी संघर्ष से ही साफ होगी।





