माया
देश के विकास की चर्चा जब होती है तो गांवों का जिक्र स्वाभाविक रूप से आता है। भारत की बड़ी आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और खेती, पशुपालन, छोटे कारोबार तथा स्थानीय श्रम पर उसकी आजीविका निर्भर है। इसलिए इसके विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारें लगातार योजनाएं चला रही हैं। महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने से लेकर किशोरियों की शिक्षा, युवाओं के रोजगार, बच्चों की पढ़ाई, किसानों की आय, स्वास्थ्य, आवास, सड़क, बिजली और पानी तक शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसके लिए सरकारी योजना न हो।
बात करें राजस्थान की, तो यहां भी लाड़ो प्रोत्साहन योजना, मुख्यमंत्री नारी शक्ति उद्यम प्रोत्साहन योजना, राजीविका के स्वयं सहायता समूह, वीबी जी राम जी, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण, जल जीवन मिशन और मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना जैसी कई पहलें ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से चल रही हैं।
फिर सवाल उठता है कि इतनी योजनाओं और इतने वर्षों के प्रयास के बावजूद गांव शहरों की तुलना में पीछे क्यों रह जाते हैं? क्या समस्या योजनाओं की कमी है या उनके लाभ को जीवन में बदलने की प्रक्रिया में कहीं कोई कड़ी कमजोर पड़ जाती है? शायद इसका जवाब केवल सरकारी व्यवस्था में तलाशना ठीक नहीं होगा। गांव का विकास एक सामाजिक प्रक्रिया भी है और इसमें समाज की सोच, जानकारी, भागीदारी, स्थानीय नेतृत्व और लोगों की अपनी पहल की बड़ी भूमिका होती है।
किसी योजना का बनना उसकी सफलता की पहली सीढ़ी है, अंतिम मंजिल नहीं। कई बार गांव के लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उनके लिए कौन-सी योजना उपलब्ध है, उसकी पात्रता क्या है और आवेदन कैसे किया जा सकता है। सूचना की यह कमी सबसे अधिक उन परिवारों को प्रभावित करती है जिनके पास पढ़े-लिखे सदस्य कम हैं या जो डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल सहजता से नहीं कर पाते।
आज सरकारी सेवाओं का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन हो रहा है। यह सुविधा निश्चित रूप से पारदर्शिता और पहुंच बढ़ा सकती है, लेकिन डिजिटल जानकारी और उपकरणों की कमी वाले परिवारों के लिए यही प्रक्रिया कठिन भी हो सकती है। इसलिए केवल योजना की जानकारी उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है, उसे समझने और इस्तेमाल करने की क्षमता भी लोगों में विकसित करनी होगी।
गांव के विकास की दूसरी बड़ी चुनौती सामाजिक सोच है। महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की योजनाएं हों, लड़कियों की शिक्षा के लिए प्रोत्साहन हो या युवाओं के कौशल विकास की योजनाएं, इसका लाभ तभी पूरी तरह सामने आएगा जब परिवार और समाज भी बदलाव के लिए तैयार हों। राजस्थान में लाड़ो प्रोत्साहन योजना के तहत बालिकाओं के लिए प्रोत्साहन राशि का प्रावधान है और कालीबाई भील महिला संबल शिक्षा सेतु योजना के माध्यम से महिलाएं और बालिकाएं शिक्षा से जुड़ रही हैं।
सरकार के अनुसार लाड़ो योजना की शुरुआती किस्तों से लाखों बालिकाएं लाभान्वित हुई हैं। लेकिन किसी लड़की के खाते में आर्थिक सहायता पहुंचना और उसे अपनी शिक्षा जारी रखने, कौशल सीखने या रोजगार चुनने की वास्तविक स्वतंत्रता मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। यहां परिवार की सोच और लड़की के निर्णय लेने के अधिकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसी तरह महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने या उद्यम शुरू करने के लिए ऋण उपलब्ध कराने की योजना तभी स्थायी बदलाव ला सकती है जब महिला को आर्थिक निर्णयों में भी भागीदारी मिले। राजस्थान की ग्रामीण विकास नीति में राजीविका के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने, वित्तीय समावेशन बढ़ाने और महिलाओं को कृषि तथा गैर-कृषि उद्यमों से जोड़ने पर जोर दिया गया है। लेकिन कई परिवारों में अभी भी यह धारणा मौजूद है कि महिला की प्राथमिक जिम्मेदारी घर संभालना है। ऐसे माहौल में योजना महिला तक पहुंचने के बावजूद उसका पूरा लाभ उसके हाथ में नहीं आ पाता।
गांव के विकास में शिक्षा का सवाल भी केवल स्कूल की इमारत या छात्रवृत्ति तक सीमित नहीं है। बच्चों का नियमित स्कूल जाना, किशोरियों का पढ़ाई जारी रखना, युवाओं का उच्च शिक्षा या कौशल प्रशिक्षण तक पहुंचना और पढ़ाई के बाद रोजगार के अवसर मिलना, ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि गांव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसरों के बीच दूरी बनी रहती है तो पढ़े-लिखे युवा भी शहरों की ओर जाने लगते हैं। इससे गांव में प्रतिभा और नेतृत्व की कमी पैदा हो सकती है।
किसानों के मामले में भी यही बात दिखाई देती है। बीज, सिंचाई, कृषि ऋण, फसल बीमा या बाजार से जुड़ी योजनाएं किसान के लिए उपयोगी हैं, लेकिन छोटे किसान के सामने जानकारी, जोखिम, बाजार तक पहुंच और बदलते मौसम जैसी कई चुनौतियां एक साथ होती हैं। यदि किसान किसी योजना को समझने, आवेदन करने या उसका लाभ लेने की प्रक्रिया में अकेला पड़ जाता है तो योजना का उद्देश्य कमजोर हो सकता है। यहां किसान समूहों, स्वयं सहायता समूहों, सहकारी संस्थाओं और ग्राम स्तर के सामुदायिक संगठनों की भूमिका बढ़ाई जा सकती है।
दरअसल, बुनियादी सुविधाओं का विकास भी केवल निर्माण का विषय नहीं है। सड़क बनना जरूरी है, लेकिन उसका रखरखाव भी उतना ही जरूरी है। पानी की पाइपलाइन बिछाना महत्वपूर्ण है, लेकिन नियमित और साफ पानी मिलना उससे भी महत्वपूर्ण है। बिजली का कनेक्शन होना जरूरी है, लेकिन उसकी निरंतरता और उपयोग की क्षमता भी मायने रखती है। इसी तरह स्कूल, आंगनबाड़ी या स्वास्थ्य केंद्र का भवन बन जाने से सेवा अपने आप बेहतर नहीं हो जाती। किसी भी सुविधा की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वह रोजमर्रा के जीवन में कितनी उपयोगी और भरोसेमंद बन पाती है।
गांव का विकास इसलिए नहीं रुकता कि योजनाएं नहीं हैं। कई बार विकास की गति उस जगह धीमी पड़ जाती है जहां योजना और समाज के बीच संवाद कमजोर होता है। सरकार योजनाएं बना सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है और सुविधाएं पहुंचा सकती है, लेकिन उनके स्थायी परिणाम के लिए समाज की भागीदारी जरूरी है। शायद यही वह पहल होगी है जो आने वाले वर्षों में गांव और शहर के बीच की दूरी को कम कर सकता है।
(यह लेखिका की निजी राय है)





