बिना पटाखों की दिवाली : खुशियों के दीप जलाएँ, प्रदूषण के नहीं

Diwali without firecrackers: Light lamps of happiness, not pollution

सत्य भूषण शर्मा

दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा अनुपम पर्व है, जो अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है। यह केवल दीप जलाने, मिठाइयाँ बाँटने और घर सजाने का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव, आत्मीयता और सामाजिक एकता का महापर्व है। किंतु समय के साथ दीपावली मनाने के तरीकों में कुछ ऐसी परंपराएँ जुड़ गई हैं, जिनका हमारी प्रकृति, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पटाखों का अत्यधिक प्रयोग इसी चिंता का प्रमुख कारण है। आज आवश्यकता है कि हम दीपावली को उल्लासपूर्वक मनाएँ, लेकिन बिना पटाखों के।

प्रदूषण के विरुद्ध एक सार्थक पहल

पटाखों से निकलने वाला धुआँ वायु को विषाक्त बनाता है। इनमें मौजूद सूक्ष्म कण, हानिकारक गैसें और रासायनिक तत्व वातावरण की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। दीपावली के बाद अनेक शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। इसका प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों, श्वास संबंधी समस्याओं से पीड़ित लोगों और पशु-पक्षियों पर विशेष रूप से पड़ता है। तेज धमाकों से ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ता है, जिससे छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पशुओं को भय तथा परेशानी का सामना करना पड़ता है।

क्या कुछ क्षणों का आतिशबाजी का आनंद हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीव-जंतुओं की शांति से अधिक मूल्यवान है? यह प्रश्न प्रत्येक जागरूक नागरिक को स्वयं से पूछना चाहिए।

परंपरा का सम्मान, प्रकृति का संरक्षण

भारतीय संस्कृति में दीपावली का मूल स्वरूप प्रकाश, पवित्रता और मंगलकामना से जुड़ा है। भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन पर दीप प्रज्वलित कर हर्ष व्यक्त करने की परंपरा हमें प्रकाश और सकारात्मकता का संदेश देती है। इस उत्सव की आत्मा दीपों में है, धुएँ और धमाकों में नहीं। मिट्टी के दीपक जलाकर, घर-आँगन को रंगोली से सजाकर, जरूरतमंदों की सहायता करके और परिवार के साथ प्रेमपूर्ण समय बिताकर भी दीपावली को यादगार बनाया जा सकता है।

बच्चों को दें नई सोच और संस्कार

बच्चे समाज का भविष्य हैं। उन्हें यह समझाना हमारी जिम्मेदारी है कि त्योहार मनाने का अर्थ दूसरों को असुविधा पहुँचाना नहीं, बल्कि सभी के जीवन में खुशियाँ बाँटना है। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और अभिभावकों को मिलकर बच्चों में पर्यावरण संरक्षण के संस्कार विकसित करने चाहिए। दीपावली पर पौधारोपण, स्वच्छता अभियान, जरूरतमंद परिवारों को मिठाई एवं वस्त्र वितरण तथा मिट्टी के दीपकों को प्रोत्साहन जैसी गतिविधियाँ इस पर्व को अधिक सार्थक बना सकती हैं।

सामूहिक संकल्प से बनेगी स्वच्छ दीपावली

बिना पटाखों की दीपावली केवल पर्यावरण संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार समाज के निर्माण की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। हमें स्थानीय कारीगरों के मिट्टी के दीपक खरीदकर उनके रोजगार को प्रोत्साहित करना चाहिए। बिजली की अनावश्यक खपत से बचना चाहिए तथा प्लास्टिक और कचरे से मुक्त उत्सव मनाने का प्रयास करना चाहिए। समाज के प्रत्येक वर्ग को इस परिवर्तन का सहभागी बनना होगा।

उपसंहार

दीपावली का वास्तविक सौंदर्य आसमान में उठते धुएँ और धमाकों में नहीं, बल्कि घरों में जलते दीपों, चेहरों पर मुस्कान और हृदय में बसे प्रेम में है। आइए, इस दीपावली हम एक ऐसा संकल्प लें, जिसमें न किसी बच्चे की साँसें धुएँ से घुटें, न किसी बुजुर्ग की शांति भंग हो और न ही किसी पशु-पक्षी को भय का सामना करना पड़े।

हमारी दीपावली ऐसी हो, जहाँ दीप जलें, दिल मिलें, खुशियाँ बाँटी जाएँ और प्रकृति मुस्कराए।

याद रखिए—दीपावली रोशनी का त्योहार है, प्रदूषण का नहीं। बिना पटाखों की दिवाली ही स्वस्थ, सुरक्षित, संवेदनशील और समृद्ध भारत की ओर एक सार्थक पहल है।