अशोक भाटिया
एक तरफ जहां पूरा भारतवर्ष रोशनी, उल्लास और बंधुत्व के महापर्व दीपावली के पावन प्रकाश में नहाया हुआ है, जहां हर घर के मुहाने पर जलते दीये और आसमान को छूती आतिशबाजी एक जीवंत और प्रगतिशील लोकतंत्र की खुशहाली को बयां कर रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत के ही एक अभिन्न हिस्से—पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से आ रही चीखें और धुंआ मानवता के अंतःकरण को झकझोर रहा है। जब स्वतंत्र भारत के नागरिक अपने परिवारों के साथ सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं, ठीक उसी समय नियंत्रण रेखा के उस पार रावलकोट में निर्दोष कश्मीरियों के घरों पर बारूद बरस रहा है। यह विरोधाभास केवल दो भौगोलिक क्षेत्रों की स्थिति का अंतर नहीं है, बल्कि यह दो अलग-अलग व्यवस्थाओं के चरित्र का जीवंत दस्तावेज है। एक तरफ वह भारत है जो विकास, लोकतंत्र और जनकल्याण के पथ पर अग्रसर है, और दूसरी तरफ वह पाकिस्तानी हुकूमत है जो अपने अवैध नियंत्रण वाले क्षेत्र के निहत्थे नागरिकों की वाजिब आवाजों को दबाने के लिए सैन्य ताकत, अंधाधुंध गोलीबारी और विनाशकारी ड्रोन हमलों का सहारा ले रही है। रावलकोट में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और असैन्य बस्तियों पर पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए हालिया ड्रोन हमलों और अंधाधुंध गोलीबारी में कम से कम सात निर्दोष नागरिकों (जिनमें चार मासूम बच्चे भी शामिल हैं) की मौत और 23 से अधिक लोगों का लहूलुहान होना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि इस्लामाबाद के लिए PoK की जनता केवल एक भौगोलिक बंधक है, जिसके बुनियादी मानवाधिकारों की उसकी नजर में कोई कीमत नहीं है।
रावलकोट के उमर फारूक चौक और बस टर्मिनल के समीप हुए इस हिंसक सैन्य एक्शन की पृष्ठभूमि को समझना बेहद जरूरी है। यह अशांति कोई अचानक उपजा तात्कालिक कानून-व्यवस्था का संकट नहीं है, जैसा कि पाकिस्तानी जनसंपर्क तंत्र इसे स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। असल में, जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के बैनर तले PoK की स्थानीय आबादी पिछले कई महीनों से अपने बुनियादी हकों के लिए शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर रही है। उनकी मांगें बेहद बुनियादी और तार्किक हैं—सस्ती बिजली, आटे और आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति, उनके अपने जल और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण, और दमनकारी प्रशासनिक व्यवस्था से मुक्ति। यह अत्यंत हास्यास्पद और क्रूर सच्चाई है कि जिस क्षेत्र की नदियों से पैदा होने वाली पनबिजली से पूरा पाकिस्तान रोशन होता है, उसी PoK के लोग भारी-भरकम बिजली बिलों और अघोषित कटौती के खिलाफ सड़कों पर बैठने को मजबूर हैं। इस लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन का जवाब पाकिस्तान की जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व वाली सेना ने संवाद से देने के बजाय संगीनों, मिसाइलों और आधुनिक सैन्य ड्रोनों से दिया है। नागरिकों के रिहायशी मकानों को निशाना बनाकर किए गए इन हमलों ने स्थानीय अवाम के भीतर संचित आक्रोश को एक राष्ट्रव्यापी नागरिक विद्रोह में तब्दील कर दिया है। मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से गूंजती प्रतिरोध की अपीलें और सुरक्षा बलों के सामने सीना तानकर खड़ी महिलाएं इस बात का साक्ष्य हैं कि अब वहां का समाज भय की सीमा को पार कर चुका है।
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी सेना ने कश्मीरियों के खून से अपने हाथ रंगे हैं, लेकिन इस बार रावलकोट में जिस बर्बरता का प्रदर्शन किया गया, उसने युद्ध के नियमों और मानवाधिकारों की तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियों को तार-तार कर दिया है। युद्ध के मैदान में दुश्मनों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले मिलिट्री ड्रोनों का प्रयोग अपने ही नियंत्रण वाली असैन्य आबादी और बच्चों पर करना एक अक्षम्य युद्ध अपराध (War Crime) की श्रेणी में आता है। स्थानीय नेताओं द्वारा सोशल मीडिया पर दिखाए गए बमों के छर्रे और जली हुई इमारतें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के लिए आंखें खोलने वाली होनी चाहिए। सूचनाओं के प्रवाह को रोकने के लिए रावलकोट और आसपास के इलाकों में मोबाइल नेटवर्क तथा इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह ठप कर दिया गया है ताकि सेना की इस क्रूरता की गवाहियां दुनिया के सामने न आ सकें। तथ्य छुपाने की इस हताश कोशिश के बावजूद जो खबरें और वीडियो छनकर बाहर आ रहे हैं, वे दिल दहला देने वाले हैं। जून से अब तक इस खूनी दमन चक्र में 153 से अधिक स्थानीय नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं। यह आंकड़ा किसी घोषित युद्ध क्षेत्र का नहीं, बल्कि उस इलाके का है जिसे पाकिस्तान दुनिया के मंचों पर ‘आजाद कश्मीर’ कहकर दुष्प्रचार करता है। रावलकोट की यह tragedy उस पाखंडी नैरेटिव के ताबूत में आखिरी कील है, जिसके सहारे पाकिस्तान दशकों से वैश्विक मंचों पर खुद को कश्मीरियों का हमदर्द साबित करने का ढोंग रचता आया है।
पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व का यह दावा कि वे केवल उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं, पूरी तरह खोखला और बेदम है। सच तो यह है कि पाकिस्तान का तथाकथित कश्मीर नैरेटिव अब अंदरूनी तौर पर पूरी तरह ढह चुका है। इस्लामाबाद अंतरराष्ट्रीय मंचों, जैसे संयुक्त राष्ट्र या ओआईसी में भारत के खिलाफ कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार की वकालत करता है, लेकिन जब PoK के असली कश्मीरी अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तो पाकिस्तानी हुकूमत के मंत्री उन्हें ‘देश का दुश्मन’ और ‘गद्दार’ करार दे देते हैं। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान को न तो कश्मीरियों से कोई सरोकार है और न ही उनकी संस्कृति या पहचान से। उसके लिए PoK केवल एक रणनीतिक भूभाग और भारत के खिलाफ आतंकवाद की नर्सरी संचालित करने का माध्यम मात्र है। भारत की सीमा के भीतर जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के हटने के बाद जिस तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं बहाल हुई हैं, रिकॉर्ड मतदान के साथ शांतिपूर्ण विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं, और चौतरफा बुनियादी ढांचे का विकास हो रहा है, उसने PoK के नागरिकों की आंखों से पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा का चश्मा उतार दिया है। वे देख रहे हैं कि नियंत्रण रेखा के इस पार उनका कश्मीरी भाई विकास और अमन की खुली हवा में सांस ले रहा है, जबकि वे स्वयं एक दिवालिया हो चुके मुल्क की सैन्य तानाशाही के तले पिस रहे हैं। यही आत्मबोध और तुलनात्मक यथार्थ पाकिस्तानी हुकूमत की सबसे बड़ी घबराहट है, जिसे दबाने के लिए वह अब अपने ही पाले हुए नागरिकों पर बमबारी कर रही है।
इस मानवीय संकट पर वैश्विक समुदाय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी बेहद चिंताजनक और उनके दोहरे रवैये को उजागर करने वाली है। गाजा या यूक्रेन के संकट पर हफ्तों तक बहस करने वाली वैश्विक संस्थाएं रावलकोट में तड़पते बच्चों और जलते घरों पर मौन साधे बैठी हैं। क्या PoK के नागरिकों के पास जीने का अधिकार नहीं है? क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर किसी चुनी हुई या सैन्य समर्थित सरकार को अपने ही लोगों पर ड्रोन दागने की खुली छूट दी जा सकती है? भारत के दृष्टिकोण से, यह समय रणनीतिक रूप से अत्यंत सतर्क रहने और कूटनीतिक आक्रामकता दिखाने का है। PoK संवैधानिक और ऐतिहासिक रूप से भारत का अभिन्न अंग है, और वहां के नागरिकों पर होने वाला कोई भी अत्याचार सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय हितों और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावित करता है। भारत को वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के इस नग्न दमन चक्र को पूरी ताकत से उठाना चाहिए और रावलकोट में इंटरनेट ब्लैकआउट के पीछे छिपे सच को दुनिया के सामने बेनकाब करना चाहिए। जब भारत में दीपावली के दीये जल रहे हैं, तब हमारी प्रार्थनाओं और कूटनीतिक प्रयासों में नियंत्रण रेखा के पार रह रहे हमारे उन भाइयों और बहनों की सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए, जो इस समय पाकिस्तानी सेना के खूनी खेल का शिकार हो रहे हैं। रावलकोट का यह क्रंदन वैश्विक चेतना के लिए एक कठोर चेतावनी है कि आतंकवाद और दमन पर टिकी कोई भी रियासत कभी भी अपने नागरिकों को शांति और समृद्धि नहीं दे सकती।





