एआई की बढ़ती प्यास और दुनिया का जल भविष्य

AI's Growing Thirst and the World's Water Future

के. पी. मलिक

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस) को 21वीं सदी की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति माना जा रहा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वित्त, रक्षा और प्रशासन जैसे लगभग हर क्षेत्र में एआई के बढ़ते उपयोग ने विकास की नई संभावनाएं पैदा की हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और तकनीकी कंपनियां एआई को भविष्य की आर्थिक शक्ति के रूप में देख रही हैं। अमेरिका, चीन, यूरोप और भारत जैसे देश इस क्षेत्र में नेतृत्व हासिल करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। लेकिन इस तकनीकी दौड़ के बीच एक ऐसा पहलू है जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हो रही है, और वह है एआई का बढ़ता जल उपभोग। हाल के वर्षों में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों और संयुक्त राष्ट्र समर्थित आकलनों ने चेतावनी दी है कि एआई आधारित डेटा सेंटरों के तेजी से विस्तार के कारण आने वाले वर्षों में वैश्विक जल मांग में भारी वृद्धि हो सकती है। अनुमान है कि 2030 तक एआई और डेटा सेंटर उद्योग की पानी की जरूरतें इतनी बढ़ सकती हैं कि वे एक अरब से अधिक लोगों की वार्षिक जल आवश्यकताओं के बराबर पहुंच जाएं। यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि विकास, संसाधन प्रबंधन और मानव अस्तित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

दरअसल आमतौर पर एआई को एक डिजिटल तकनीक माना जाता है और लोगों को लगता है कि इसका संबंध केवल कंप्यूटर, इंटरनेट और सॉफ्टवेयर से है। लेकिन वास्तविकता यह है कि एआई के पीछे काम करने वाली संरचना अत्यंत संसाधन-गहन है। जब कोई व्यक्ति एआई चैटबॉट का उपयोग करता है, कोई कंपनी बड़े पैमाने पर डेटा विश्लेषण करती है या कोई संस्थान विशाल भाषा मॉडल को प्रशिक्षित करता है, तब इसके पीछे हजारों शक्तिशाली सर्वर लगातार सक्रिय रहते हैं। ये सर्वर भारी मात्रा में गर्मी उत्पन्न करते हैं और यदि उन्हें नियंत्रित न किया जाए तो पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है। इसी कारण डेटा सेंटरों में बड़े पैमाने पर कूलिंग सिस्टम का उपयोग किया जाता है, जिनमें पानी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सर्वरों को ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। जैसे-जैसे एआई मॉडल अधिक जटिल और शक्तिशाली बन रहे हैं, वैसे-वैसे उनकी ऊर्जा और जल आवश्यकताएं भी बढ़ती जा रही हैं।

एआई उद्योग के विस्तार के साथ दुनिया भर में नए डेटा सेंटरों का निर्माण तेजी से हो रहा है। बड़ी तकनीकी कंपनियां विशाल डेटा अवसंरचना विकसित कर रही हैं ताकि बढ़ती डिजिटल मांग को पूरा किया जा सके। लेकिन इन डेटा सेंटरों की स्थापना का अर्थ केवल अधिक बिजली की खपत नहीं है, बल्कि स्थानीय जल संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव है। कई देशों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां डेटा सेंटरों के बढ़ते जल उपयोग को लेकर स्थानीय समुदायों ने चिंता व्यक्त की है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां पहले से ही जल संकट मौजूद है, वहां डेटा सेंटरों की उपस्थिति संसाधनों के बंटवारे को लेकर नई चुनौतियां पैदा कर रही है।

दरअसल यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि दुनिया पहले से ही जल संकट का सामना कर रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अरबों लोगों को सुरक्षित और पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूजल का अत्यधिक दोहन और बढ़ती जनसंख्या ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे समय में यदि एआई उद्योग पानी की मांग को तेजी से बढ़ाता है, तो जल संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा और तीव्र हो सकती है। एक ओर कृषि क्षेत्र है, जो खाद्य सुरक्षा के लिए पानी पर निर्भर है, दूसरी ओर बढ़ते शहर हैं जिन्हें पेयजल और स्वच्छता के लिए अधिक संसाधनों की आवश्यकता है। उद्योगों की जरूरतें भी लगातार बढ़ रही हैं। अब इन सबके बीच डेटा सेंटर एक नए और तेजी से बढ़ते जल उपभोक्ता के रूप में सामने आ रहे हैं। भविष्य में यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है कि सीमित जल संसाधनों का प्राथमिक उपयोग किसके लिए किया जाए।

एआई और जल संकट के बीच संबंध केवल पानी तक सीमित नहीं है। डेटा सेंटर भारी मात्रा में बिजली भी उपयोग करते हैं। यदि यह बिजली कोयले, तेल या गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से उत्पन्न होती है, तो कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। बढ़ता कार्बन उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को तेज करता है और जलवायु परिवर्तन जल संकट को और गंभीर बनाता है। इस प्रकार एआई , ऊर्जा और जल संसाधनों के बीच एक ऐसा चक्र बनता है जो पर्यावरणीय चुनौतियों को कई गुना बढ़ा सकता है। इसलिए एआई के प्रभाव का आकलन केवल उसकी तकनीकी उपलब्धियों या आर्थिक योगदान के आधार पर नहीं किया जा सकता। उसके पर्यावरणीय पदचिह्न को भी उतनी ही गंभीरता से समझना होगा।

भारत के संदर्भ में यह मुद्दा और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है और एआई को राष्ट्रीय विकास की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है। लेकिन इसके साथ ही देश गंभीर जल चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। कई शहर भूजल संकट की ओर बढ़ रहे हैं, कृषि क्षेत्र पर जल दबाव लगातार बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन मानसून की अनिश्चितता को बढ़ा रहा है। यदि भविष्य में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटरों का विस्तार होता है, तो जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। इसलिए भारत के लिए आवश्यक है कि वह एआई अवसंरचना के विकास को जल प्रबंधन की व्यापक रणनीति के साथ जोड़े।

इसका अर्थ यह नहीं है कि एआई के विकास को रोका जाए। एआई विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और आर्थिक उत्पादकता में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। चुनौती एआई को रोकने की नहीं, बल्कि उसे टिकाऊ बनाने की है। डेटा सेंटरों में जल दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों का उपयोग, पुनर्चक्रित जल का प्रयोग, नवीकरणीय ऊर्जा आधारित अवसंरचना का विस्तार और जल उपलब्धता को ध्यान में रखकर डेटा सेंटरों की स्थापना जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। साथ ही तकनीकी कंपनियों को अपने जल उपयोग और पर्यावरणीय प्रभाव के बारे में अधिक पारदर्शिता भी दिखानी होगी।

इतिहास गवाह है कि हर तकनीकी क्रांति अपने साथ नई संभावनाएं और नई चुनौतियां दोनों लेकर आती है। औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया लेकिन प्रदूषण और संसाधन दोहन की समस्याएं भी पैदा कीं। डिजिटल क्रांति ने दुनिया को जोड़ा लेकिन ऊर्जा खपत और इलेक्ट्रॉनिक कचरे जैसी चुनौतियां सामने आईं। एआई क्रांति भी इससे अलग नहीं है। यदि इसके विस्तार को प्राकृतिक संसाधनों की सीमाओं को ध्यान में रखकर संचालित नहीं किया गया, तो इसकी सफलता का मूल्य पर्यावरण और जल सुरक्षा के रूप में चुकाना पड़ सकता है।

बहरहाल, सवाल यह नहीं है कि एआई कितना शक्तिशाली बनेगा, बल्कि यह है कि वह कितना जिम्मेदार बनेगा। आने वाले वर्षों में दुनिया की वास्तविक परीक्षा इसी बात की होगी कि क्या वह तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य स्थापित कर पाती है। यदि एआई मानवता के भविष्य को बेहतर बनाने का माध्यम है, तो उसे उन संसाधनों की रक्षा भी करनी होगी जिन पर मानव जीवन स्वयं निर्भर करता है। इसलिए एआई का भविष्य केवल एल्गोरिदम और डेटा का नहीं, बल्कि पानी, ऊर्जा और सतत विकास का भी प्रश्न है। यही दृष्टिकोण इस तकनीकी क्रांति को वास्तव में मानव-केंद्रित और टिकाऊ बना सकता है।

(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)