अशोक भाटिया
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के नतीजो के बाद खास असर उत्तर प्रदेश की राजनीति और खासकर समाजवादी पार्टी पर पड़ा है। पहले ऊन्होने राज्य में समाजवादी पार्टी ने चुनावी रणनीति और मैनेंजमेंट करने वाली कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी ( IPAC ) के साथ अपनी डील रद्द कर दी । यह डील कुछ महीने पहले पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सलाह पर ही हुई थी। बंगाल में टीएमसी और ममता की हार के बाद अखिलेश ने IPAC के साथ करार से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं।अहम बात यह है कि तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के चुनावी मैनेंजमेंट का काम कर रही थी। इन दोनों ही राज्यों में दोनों पार्टियों को बुरी हार का सामना करना पड़ रहा है। दिलचस्प बात यह भी है कि दोनों राजनीतिक दलों के सुप्रीमो यानी एमके स्टालिन और ममता बनर्जी तक अपनी ही सीट से चुनाव हार गए हैं। दोनों राज्यों की हार के बीच अखिलेश यादव ने एहतियात बरतने के संकेत दिए हैं और आईपैक से करार खत्म कर लिया है।
दरअसल, आईपैक के सूत्रों ने बताया कि इस साल की शुरुआत में सपा के साथ तय हुआ समझौता अब रद्द हो चुका है। ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं, जब पिछले महीने ईडी ने बंगाल कोयला तस्करी मामले में कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के तहत आई-पैक के निदेशक विनेश चंदेल को गिरफ्तार किया था।निदेशक के खिलाफ हुई इस कार्रवाई ने कंपनी के कामकाज पर संदेह पैदा कर दिया है। एक सूत्र ने कहा, “हमारे कार्यालयों पर ईसी की छापेमारी और हमारे निदेशक (विनेश चंदेल) की गिरफ्तारी ने इस समझौते को अधर में लटका दिया है।”
ईडी के निशाने पर आने के चलते आईपैक के राजनीतिक क्लाइंट्स की टेंशन भी बढ़ गई और चुनावी अभियान चलाने की फर्म की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। एक अन्य सूत्र ने व्यापक राजनीतिक संदर्भ की ओर इशारा करते हुए कहा कि हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भी सपा को पुनर्विचार करने पर मजबूर किया है, जिसके चलते उसने कंपनी के साथ अपने रिश्ते तोड़ दिया।एक अन्य सूत्र ने बताया, “विधानसभा चुनावों में टीएमसी और डीएमके की हार ने सपा को व्याकुल कर दिया था। विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो गई थी, खासकर तब जब ममता बनर्जी अपनी ही सीट से भारी अंतर से हार गईं। यही अंतिम झटका था। कुछ इसी तरह एमके स्टालिन भी तमिलनाडु में टीवीके प्रत्याशी से बुरी तरह हारे थे।”
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में आईपैक के क्लाइंस्ट का प्रदर्शन इतना खराब रहा है कि सपा को आईपैक की क्षमता पर शक होने लगा था। सूत्रों के अनुसार, यह कंसलटेंसी कंपनी पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु दोनों राज्यों में चुनावी रणनीतियों से जुड़ी रही है, जहां चुनावी परिणाम उन पार्टियों की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे जिन्हें वह सलाह दे रही थी। ईडी की छापेमारी के बाद के हफ्तों में आईपैक ने चुनावों से कुछ सप्ताह पहले बंगाल में अपने संचालन को काफी हद तक कम कर दिया है।सूत्रों ने बताया कि राज्य में कई कार्यालय या तो अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए थे या उनमें कर्मचारियों की संख्या बहुत कम कर दी गई थी, और गैर-जरूरी प्रचार कार्य रोक दिए गए थे। कम सक्रियता के कारण टीएमसी और आईपैक के बीच दूरियां और बढ़ गईं। आईपैक के कई सूत्रों ने पुष्टि की कि ईडी की छापेमारी के बाद टीएमसी नेताओं के साथ उनके संबंध खराब हो गए। एक सूत्र ने बताया, “नेताओं को हमसे पूरी मदद की उम्मीद थी, खासकर चुनावों से पहले के दिनों में। हालांकि, जमीनी स्तर पर हमारी कम सक्रियता ने उन्हें बेहद नाराज कर दिया।”
बंगाल-तमिलनाडु चुनाव नतीजों और सपा द्वारा कैंसिल की गई डील के घटनाक्रम का कंपनी के संगठन पर भी पड़ा है। सूत्रों ने बताया कि कंपनी ने उत्तर प्रदेश में अपना कार्यालय बंद कर दिया है और लगभग 30-40 नियुक्त लोगों को काम पर न आने के लिए कहा गया है। जिससे सपा चुनाव प्रचार की तैयारियों का काम पूरी तरह रुक जाने का संकेत मिलता है।आईपैक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि कई कारकों ने इस समझौते के टूटने में योगदान दिया। अधिकारी ने कहा, “सपा के साथ समझौता करवाने में ममता बनर्जी ने अहम भूमिका निभाई थी लेकिन उत्तर प्रदेश परियोजना का नेतृत्व करने के लिए चुने जा रहे चंदेल की गिरफ्तारी ने योजना को खतरे में डाल दिया। साथ ही बीजेपी की ओर से भी समझौता रद्द करने का दबाव था।”
इस झटके के बावजूद समाजवादी पार्टी द्वारा पेशेवर चुनाव प्रचार समर्थन को पूरी तरह से छोड़ने की संभावना नहीं है। सूत्रों के अनुसार आईपैक के पूर्व कर्मचारियों के नेतृत्व वाली एक अन्य फर्म 2027 के चुनावों से पहले पार्टी की सहायता करने की उम्मीद है। हालांकि, सपा के भीतर बाहरी सलाहकारों पर निर्भरता को लेकर बढ़ती बेचैनी दिखाई दे रही है।सपा के एक पदाधिकारी ने कहा कि यह फैसला अपेक्षित था। उन्होंने कहा कि पिछले महीने ईडी द्वारा चंदेल की गिरफ्तारी के बाद आईपैक के साथ समझौता तोड़ना लाजमी था। इससे सपा नेताओं के बीच आईपैक के भविष्य के कार्यों को लेकर अनिश्चितता का माहौल बन गया था।”
पहले से परेशान अखिलेश को अगले साल विधानसभा के चुनाव के पहले राज्य के दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोट बैंक में अपनी पकड़ बढ़ाने के लिए आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना से लोकसभा सांसद चंद्रशेखर आजाद ने नई परेशानी शुरू कर दी है . चंद्रशेखर आजाद ने 4 जून 2026 से प्रदेश भर में यात्रा शुरु करदी हैं। आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के नेताओं ने बताया है कि चंद्रशेखर आजाद इस यात्रा के जरिए राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों को कवर करने वाले हैं। वे इस बार सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने वाले हैं। विधानसभा चुनाव को लेकर ASP के प्रदेश उपाध्यक्ष सौरभ किशोर ने को बताया, “हम पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) से शुरुआत करेंगे और हमारे नेता पूरे राज्य का दौरा करेंगे।”
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के नेताओं ने कहा कि पार्टी का चुनाव अभियान दलितों, मुसलमानों और अति पिछड़े वर्ग (ईबीसी) समूहों पर केंद्रित होगा। ASP इस बार के विधानसभा चुनाव में कम से कम 100 ईबीसी उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की योजना बना रही है। सूत्रों के अनुसार अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।एक अहम बात यह भी है कि ASP सामान्य सीटों पर भी 50 दलित उम्मीदवारों को भी उतारने की योजना बना रही है, जो विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक को करारा जवाब होगा। पार्टी नेताओं ने कहा कि उन्होंने मंडल और बूथ स्तर तक सभी जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में संगठनात्मक ढांचा तैयार कर लिया है।
चंद्र शेखर की लोकप्रियता और अब पार्टी का विस्तार करने की उनकी महत्वाकांक्षाओं ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का ध्यान आकर्षित किया है। हाल ही, में समाजवादी पार्टी के कुछ सांसदों ने अध्यक्ष अखिलेश यादव से अपील की थी कि वे चंद्रशेखर से बातचीत शुरू करें, हालांकि अखिलेश ने अपने सांसदों के इस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को ही टारगेट किया था।अखिलेश यादव ने इसे पीडीए का फॉर्मूला बताया था। इसका पार्टी को फायदा भी मिला था। उस चुनाव में सपा-कांग्रेस का गठबंधन हुआ था। सपा को 37 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थी, जबकि भाजपा को उत्तरप्रदेश में ही बड़ा नुकसान हुआ था। सपा और कांग्रेस दोनों के नेताओं ने कहा कि इस पीडीए अभियान से उन्हें दलित वोट हासिल करने में मदद मिली लेकिन अब एएसपी (कांशी राम) विपक्ष के लिए खतरा बन गए हैं क्योंकि वे इन्हीं वोटों को विभाजित कर सकते हैं।
चंद्र शेखर ने बताया कि उनकी पार्टी से इंडिया ब्लॉक को नुकसान की चिंता है लेकिन ये सभी बेकार हैं। उन्होंने कहा, “विपक्ष कहां है? वे बंगाल, केरल, दिल्ली , हरियाणा में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं… हर कोई सत्ता की कुर्सी चाहता है। हमने 2022 (विधानसभा चुनाव) और 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में एकजुट विपक्ष के लिए प्रयास किए। मुझे नहीं लगता कि सहयोगी दलों के बीच वोटों का ट्रांसफर होता है।”चंद्रशेखर ने कहा, “2024 के बाद से कांग्रेस और सपा ने कितने उपचुनाव जीते हैं? राजनीति में कोई धन्यवाद नहीं कहता। जब किसी को आपकी ज़रूरत होती है, तभी मीठी-मीठी बातें करते हैं। अगर किसी को भाजपा को हराने में हमारी मदद चाहिए, तो उन्हें आकर हमसे बात करनी चाहिए।”





