सीबीएसई के ओएसएम संकट से परे: एक विश्वसनीय मूल्यांकन तैयार करना

Beyond CBSE's OSM crisis: Designing a reliable assessment

डॉ. विजय गर्ग

सीबीएसई ने -ओएसएम-यानी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को अपनाया था। लेकिन किसी भी बड़े तकनीकी बदलाव की तरह, इस व्यवस्था को भी ज़मीनी स्तर पर कई गंभीर प्रशासनिक, तकनीकी और व्यावहारिक संकटों का सामना करना पड़ा है। इस ‘ओएसएम संकट’ ने न केवल परीक्षा परिणामों की सटीकता पर सवाल उठाए, बल्कि छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के मानसिक तनाव को भी बढ़ा दिया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस संकट के कारणों को समझें और इससे आगे बढ़कर एक अभेद्य, सुरक्षित और अत्यंत विश्वसनीय मूल्यांकन मॉडल की नींव रखें।

ओएसएम क्या है और यह संकट क्यों खड़ा हुआ?

ऑनलाइन स्क्रीन मार्किंग के तहत पारंपरिक कागजी उत्तर पुस्तिकाओं को पहले उच्च क्षमता वाले स्कैनर्स के जरिए डिजिटल फाइलों में बदला जाता है। इसके बाद, ये डिजिटल कॉपियां देश भर के विभिन्न मूल्यांकन केंद्रों पर तैनात शिक्षकों के कंप्यूटर या लैपटॉप स्क्रीन पर भेजी जाती हैं। शिक्षक स्क्रीन पर ही टूल्स की मदद से अंकों का निर्धारण करते हैं।
यह तकनीक सिद्धांत रूप में बेहतरीन है, क्योंकि यह भौतिक कॉपियों को खोने या फटने के जोखिम को खत्म करती है और अंकों के योग की गलतियों को स्वचालित रूप से रोकती है। इसके बावजूद, यह प्रणाली निम्नलिखित कारणों से एक बड़े ‘संकट’ में तब्दील हो गई:

  • अस्थिर तकनीकी ढांचा : परीक्षा परिणामों के पीक सीजन के दौरान अचानक सर्वर डाउन होना, कॉपियों का स्क्रीन पर लोड न होना या धुंधली स्कैनिंग के कारण छात्रों की लिखावट को समझने में दिक्कत आना सबसे बड़ी बाधा साबित हुआ।
  • डिजिटल साक्षरता और प्रशिक्षण का अभाव: भारत में आज भी एक बड़ी संख्या में वरिष्ठ शिक्षक पारंपरिक रूप से पेन-पेपर मूल्यांकन के आदी हैं। उन्हें बिना किसी व्यापक व्यावहारिक प्रशिक्षण के सीधे जटिल सॉफ्टवेयर के सामने बैठा दिया गया, जिससे मूल्यांकन की गति और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुईं।
  • मानसिक और शारीरिक थकान : लगातार 6 से 8 घंटे कंप्यूटर स्क्रीन पर बारीक लिखावट को देखना शिक्षकों के लिए शारीरिक रूप से थकाऊ साबित हुआ। इस थकान के कारण मूल्यांकन के अंतिम घंटों में मानवीय त्रुटियों की संभावना बढ़ गई।
  • लॉजिस्टिक और समय का दबाव: कॉपियों को स्कैन करने वाली बाहरी एजेंसियों और बोर्ड के समन्वय में कमी के कारण कई बार गलत कोड वाली कॉपियां जांचकर्ताओं के पास पहुंच गईं, जिससे परिणाम घोषित करने में देरी हुई।

शिक्षा केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह छात्रों के भविष्य, अवसरों और आत्मविश्वास की आधारशिला भी है। इसी कारण परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली में विश्वास किसी भी शैक्षिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी होती है। हाल के दिनों में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली को लेकर उठे विवादों ने इस विश्वास को चुनौती दी है। छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा मूल्यांकन संबंधी विसंगतियों, तकनीकी खामियों तथा पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं। मीडिया रिपोर्टों में भी स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं, पोर्टल संबंधी समस्याओं और मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख किया गया है।

एक विश्वसनीय मूल्यांकन मॉडल के निर्माण की पंचसूत्रीय रणनीति

“मूल्यांकन केवल किसी छात्र की स्मृति का परीक्षण नहीं है, बल्कि यह शिक्षा प्रणाली की ईमानदारी और विश्वसनीयता की कसौटी भी है।”

सीबीएसई को ओएसएम संकट से आगे निकलने और भविष्य के लिए एक त्रुटिहीन मॉडल तैयार करने के लिए निम्नलिखित पांच स्तंभों पर काम करना होगा:

1. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का बुद्धिमत्तापूर्ण एकीकरण

तकनीकी संकट का समाधान अधिक तकनीक से ही संभव है, बशर्ते वह सहायक की भूमिका में हो। मूल्यांकन सॉफ्टवेयर में एआई टूल्स को शामिल किया जाना चाहिए जो कॉपियों के डिजिटाइज़ेशन के समय ही यह सुनिश्चित कर लें कि कोई पन्ना बिना स्कैन हुए या धुंधला तो नहीं रह गया। इसके अलावा, अंकों के जोड़ और प्रत्येक प्रश्न के उप-भागों में दिए गए अंकों के मिलान को एआई द्वारा री-वेरिफाई किया जाना चाहिए ताकि ‘नो-मार्क्स’ की स्थिति पैदा न हो।

2. ‘हाइब्रिड और फ्लेक्सिबल’ मूल्यांकन नीति

किसी भी तकनीक पर आंख मूंदकर शत-प्रतिशत निर्भरता आत्मघाती हो सकती है। सीबीएसई को एक लचीला रुख अपनाना चाहिए। व्यावहारिक विषयों, कला या अत्यधिक वर्णनात्मक ( विषयों के लिए, जहां स्क्रीन पर पढ़ना कठिन होता है, वहां आंशिक रूप से भौतिक मूल्यांकन का विकल्प खुला रखना चाहिए। वहीं, बहुविकल्पीय और संक्षिप्त उत्तरों के लिए ओएसएम को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

3. शिक्षकों के लिए ‘स्क्रीन-टाइम’ और कार्यभार का युक्तिकरण

एक थका हुआ शिक्षक कभी भी सही मूल्यांकन नहीं कर सकता। ओएसएम प्रणाली के तहत प्रति शिक्षक प्रतिदिन जांची जाने वाली कॉपियों की संख्या पर एक सख्त और वैज्ञानिक ऊपरी सीमा ( लागू होनी चाहिए। हर दो घंटे के स्क्रीन-वर्क के बाद अनिवार्य 15 मिनट का विश्राम और आंखों के तनाव को कम करने वाले ‘डार्क मोड’ या ‘एंटी-ग्लेयर’ इंटरफेस को सॉफ्टवेयर का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

4. त्रि-स्तरीय गुणवत्ता आश्वासन

विश्वसनीयता बहाल करने के लिए कॉपियों की जांच केवल एक स्तर पर नहीं होनी चाहिए।

  • प्रथम स्तर: मुख्य परीक्षक द्वारा सामान्य मूल्यांकन।
  • द्वितीय स्तर: एआई द्वारा विसंगतियों (जैसे किसी बहुत अच्छे छात्र को अचानक बहुत कम अंक मिलना) की पहचान।
  • तृतीय स्तर: वरिष्ठ परीक्षकों द्वारा रैंडम आधार पर कुल कॉपियों के न्यूनतम 5-10% हिस्से का पुनर्मूल्यांकन।

5. त्वरित और छात्र-अनुकूल शिकायत निवारण

मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता तब सबसे मजबूत होती है जब छात्रों को यह भरोसा हो कि गलती होने पर उसे सुधारा जा सकता है। री-इवैल्युएशन और कॉपियों की डिजिटल स्क्रूटनी की प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी, त्वरित और कम खर्चीला बनाया जाना चाहिए। यदि किसी छात्र के अंक पुनर्मूल्यांकन में महत्वपूर्ण रूप से बदलते हैं, तो संबंधित सॉफ्टवेयर और मूल्यांकनकर्ता दोनों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

सीबीएसई का ओएसएम संकट डिजिटल तकनीक की विफलता नहीं है, बल्कि यह अपर्याप्त पूर्व-तैयारी, बुनियादी ढांचे की कमजोरी और मानवीय कारकों की अनदेखी का परिणाम है। तकनीक हमेशा एक उत्कृष्ट सेवक होती है, लेकिन एक खराब मालिक। ओएसएम संकट से सीख लेकर सीबीएसई को अब एक ऐसा ‘मानव-केंद्रित तकनीकी ढांचा’ खड़ा करना होगा जो सुरक्षित भी हो और संवेदनशील भी। जब तक हम मूल्यांकन करने वाले शिक्षकों को सशक्त और तकनीक को सुदृढ़ नहीं करेंगे, तब तक एक विश्वसनीय परिणाम की कल्पना अधूरी है। आने वाले समय में एक पारदर्शी और मजबूत मूल्यांकन प्रणाली ही भारत के लाखों छात्रों के भविष्य को सुरक्षित और उज्ज्वल बना सकती है।

हालांकि किसी भी नई तकनीक के साथ शुरुआती चुनौतियाँ आना असामान्य नहीं है, लेकिन यह प्रकरण हमें एक महत्वपूर्ण सबक देता है—डिजिटलीकरण अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है। यदि तकनीक के साथ मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था, प्रशिक्षित मानव संसाधन और जवाबदेही की प्रणाली नहीं हो, तो आधुनिक उपकरण भी विवाद और अविश्वास का कारण बन सकते हैं।