व्यवस्था की चिता पर जलते सपने: आखिर कब रुकेगा मौत का कारोबार?

Dreams Burning on the Pyre of the System: When Will the Trade in Death Finally Stop?

लखनऊ के कोचिंग सेंटर में लगी आग ने केवल 15 जिंदगियां नहीं छीनी बल्कि उस सड़ी-गली व्यवस्था का भयावह चेहरा भी उजागर कर दिया, जो हर त्रासदी के बाद शोक तो व्यक्त करती है लेकिन जिम्मेदारी तय करने से बचती है। बंद निकास द्वार, अवैध निर्माण और प्रशासनिक मिलीभगत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि देश में कई मौतें आग से नहीं बल्कि व्यवस्था की घोर लापरवाही से होती हैं।

योगेश कुमार गोयल

लखनऊ के अलीगंज स्थित एक कोचिंग सेंटर में लगी आग में 15 छात्रों की दर्दनाक मौत उस व्यवस्था के चेहरे से नकाब हटाने वाली त्रासदी है, जो वर्षों से भ्रष्टाचार, लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के सहारे चल रही है। जिन बच्चों को उनके माता-पिता बेहतर भविष्य के सपने लेकर कोचिंग भेजते हैं, वे यदि धुएं से भरे कमरों, बंद दरवाजों और अवैध निर्माणों के बीच दम तोड़ दें तो उसे केवल हादसा कहना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। यह उन परिस्थितियों में हुई मौत है, जिसे रोका जा सकता था, टाला जा सकता था और जिसकी जिम्मेदारी तय की जा सकती है। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में हादसा था या फिर भ्रष्ट व्यवस्था द्वारा किया गया एक सुनियोजित प्रशासनिक हत्याकांड? घटना के विवरण किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने के लिए पर्याप्त हैं। आग लगने के बाद छात्र जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे। कुछ तीसरी मंजिल से नीचे कूद गए, कुछ बाथरूम में छिप गए, यह सोचकर कि शायद वहां धुएं से बच सकेंगे लेकिन दम घुटने से उनकी मौत हो गई। यह दृश्य किसी युद्ध या प्राकृतिक आपदा का नहीं बल्कि उस इमारत का दृश्य था, जिसे नियमों की अनदेखी कर व्यावसायिक लाभ कमाने के लिए तैयार किया गया था। जहां पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं थे, जहां फायर सेफ्टी मानकों का पालन नहीं हुआ और जहां छात्रों की सुरक्षा से अधिक महत्व मुनाफे को दिया गया।

कुछ ही समय पहले दिल्ली के मालवीय नगर में भी भीषण आग ने 21 लोगों की जान ले ली थी। उससे पहले मुंडका, अनाज मंडी, करोल बाग, अलीपुर और उपहार सिनेमा जैसे अनेक अग्निकांड देश देख चुका है। हर बार जांच में लगभग एक जैसी बातें सामने आती हैं, अवैध निर्माण, बंद निकास मार्ग, फायर एनओसी का अभाव, क्षमता से अधिक लोगों की मौजूदगी, प्रशासनिक अनदेखी और भ्रष्टाचार। यदि हर बार कारण एक जैसे हैं तो फिर इन घटनाओं को दुर्घटना नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का परिणाम माना जाना चाहिए। लखनऊ अग्निकांड की प्रारंभिक जांच ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिस इमारत में कोचिंग सेंटर चल रहा था, वहां स्वीकृत नक्शे के विपरीत निर्माण किया गया था। सेटबैक क्षेत्र तक को कवर कर लिया गया था। नीचे पेट शॉप और गेमिंग जोन संचालित हो रहे थे जबकि ऊपर कोचिंग सेंटर और लाइब्रेरी चल रही थी। एक ही इमारत में अलग-अलग व्यावसायिक गतिविधियों का ऐसा मिश्रण सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत खतरनाक माना जाता है। सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि जिस रास्ते से छात्रों को बाहर निकलना था, वह प्रभावी रूप से बंद था। ऐसे में आग लगने के बाद उनके पास बचने का कोई विकल्प नहीं बचा। यह केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि मानव जीवन के प्रति घोर उपेक्षा का उदाहरण है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसी इमारतें अस्तित्व में आती कैसे हैं? क्या नगर निगम, विकास प्राधिकरण, फायर विभाग, बिजली विभाग और स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं होती? कोई भी अवैध निर्माण रातों-रात खड़ा नहीं हो जाता। उसकी नींव पड़ती है, दीवारें खड़ी होती हैं, मंजिलें बनती हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन दिए जाते हैं और फिर वहां व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक विभाग शामिल होते हैं। सच्चाई यही है कि भ्रष्टाचार और मिलीभगत की जड़ें इतनी गहरी हैं कि नियम केवल फाइलों में रह जाते हैं जबकि जमीन पर अवैधता का साम्राज्य खड़ा हो जाता है। देश का शहरी विकास मॉडल भी इस समस्या के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। आज अधिकांश शहरों में अधिक से अधिक लाभ कमाने की होड़ लगी हुई है। बिल्डर अतिरिक्त मंजिलें जोड़ देते हैं, सेटबैक क्षेत्र को कवर कर लेते हैं, बेसमेंट का उपयोग अवैध व्यावसायिक गतिविधियों के लिए करते हैं और आपातकालीन निकास को स्टोर रूम में बदल देते हैं। बदले में कुछ अधिकारियों की जेबें गर्म हो जाती हैं और फाइलों में सब कुछ वैध दिखाई देने लगता है। नतीजा यह होता है कि एक पूरी इमारत धीरे-धीरे मौत के जाल में बदल जाती है और किसी दिन एक चिंगारी सैंकड़ों परिवारों की खुशियां छीन लेती है।

उपहार सिनेमा अग्निकांड को लगभग तीन दशक बीत चुके हैं। उस घटना में बंद निकास द्वारों के कारण 59 लोगों की मौत हुई थी। देश ने उस समय कड़े कानूनों और सख्त निगरानी की मांग की थी। लेकिन क्या वास्तव में कुछ बदला? यदि बदला होता तो मुंडका, अनाज मंडी, करोल बाग, मालवीय नगर और लखनऊ जैसी घटनाएं दोहराई नहीं जाती। हर बड़े हादसे के बाद जांच समितियां बनती हैं, मुआवजे घोषित होते हैं, कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया जाता है और मीडिया में कुछ दिनों तक बहस चलती है। फिर मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है और व्यवस्था अगले हादसे का इंतजार करने लगती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज भी देश के लगभग हर शहर में हजारों ऐसी इमारतें मौजूद हैं, जो किसी भी समय अग्निकांड का केंद्र बन सकती हैं। संकरी गलियों में बनी बहुमंजिला इमारतें, बिना वेंटिलेशन के कोचिंग सेंटर, अवैध रूप से संचालित फैक्ट्रियां, बेसमेंट में चल रहे व्यवसाय, बंद खिड़कियां और एकमात्र निकास मार्ग, ये सभी भविष्य की त्रासदियों के संकेत हैं। कई स्थानों पर फायर सेफ्टी उपकरण केवल दिखावे के लिए लगाए जाते हैं। उनकी समय-समय पर जांच नहीं होती। आपातकालीन निकास मार्ग कागजों में तो मौजूद रहते हैं लेकिन वास्तविकता में ताले या सामान से बंद मिलते हैं। ऐसे में आग लगने पर लोग आग से कम और धुएं से अधिक मरते हैं।

लखनऊ में बाथरूम में छिपे छात्रों की दम घुटने से हुई मौतें इस बात का प्रमाण हैं कि उन्हें बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं मिला। यदि पर्याप्त निकास द्वार होते, यदि सुरक्षा मानकों का पालन किया गया होता, यदि नियमित निरीक्षण हुए होते और यदि संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई की होती तो संभव है कि ये सभी जिंदगियां बचाई जा सकती थी। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि इन मौतों के पीछे केवल आग नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता, भ्रष्टाचार और जवाबदेही का अभाव भी जिम्मेदार है। अब समय केवल संवेदना व्यक्त करने का नहीं है। देश को एक कठोर और निर्णायक नीति की आवश्यकता है। सभी व्यावसायिक इमारतों, कोचिंग सेंटरों, अस्पतालों, होटलों और मॉल्स का नियमित तथा डिजिटल सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए। फायर एनओसी की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और सार्वजनिक होनी चाहिए ताकि कोई भी नागरिक किसी भवन की सुरक्षा स्थिति की जांच कर सके। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना लगाने की परंपरा समाप्त होनी चाहिए और ऐसे निर्माणों को तत्काल ध्वस्त किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिम्मेदारी केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिन अधिकारियों के कार्यक्षेत्र में ऐसे अवैध निर्माण पनपते हैं, उन्हें भी समान रूप से उत्तरदायी बनाया जाना चाहिए।

कानूनी व्यवस्था में भी बदलाव की आवश्यकता है। जब किसी भवन मालिक या अधिकारी की लापरवाही के कारण लोगों की मौत होती है तो उसे केवल प्रशासनिक गलती मानकर छोड़ देना न्याय के साथ खिलवाड़ है। ऐसे मामलों में कठोर आपराधिक दायित्व तय होना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति मानव जीवन की कीमत पर लाभ कमाने का साहस न कर सके। लखनऊ का अग्निकांड केवल 15 परिवारों का व्यक्तिगत दुःख नहीं है, यह पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यह बताता है कि यदि हमने व्यवस्था की खामियों को दूर नहीं किया, यदि भ्रष्टाचार और मिलीभगत पर अंकुश नहीं लगाया और यदि सुरक्षा मानकों को केवल कागजी औपचारिकता बनाए रखा तो अगली त्रासदी केवल समय का प्रश्न होगी। तब फिर कुछ मासूम जिंदगियां बुझ जाएंगी, कुछ परिवार हमेशा के लिए उजड़ जाएंगे और व्यवस्था फिर वही पुराना राग अलापेगी। इसलिए अब खोखले आश्वासनों का समय समाप्त हो चुका है। अब जरूरत है जवाबदेही, पारदर्शिता और कठोर कार्रवाई की।