मुकेश गुप्ता
सदाबहार नग़मे : ज़िंदगी का फ़लसफ़ा — देश के प्रमुख कवियों, गीतकारों और शायरों ने हिंदी सिनेमा को लाज़वाब, सुनहरे गीतों से नवाज़ा है। ये गीत सिर्फ़ धुन और लफ़्ज़ नहीं हैं। ये वो चिराग़ हैं, जो अँधेरे में रास्ता दिखाते हैं। मन को शांति देते हैं। जब मन डगमगाता है, तो कोई गीत कंधे पर हाथ रखकर कहता है —
“मन रे, तू काहे ना धीर धरे वो निर्मोही मोह न जाने, जिनका मोह करे”
गीतकार: शैलेंद्र | फ़िल्म: चित्रलेखा (1964)
ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच यही है कि कुछ भी ठहरता नहीं। हर लम्हा फिसल रहा है और शायद इसीलिए गीत हमें याद दिलाते हैं कि जीना अभी है, इसी वक़्त।
“हर घड़ी बदल रही है, रूप ज़िंदगी…”
गीतकार: जावेद अख्तर | फ़िल्म: कल हो ना हो (2003)
“आने वाला पल, जाने वाला है…”
गीतकार: गुलज़ार | फ़िल्म: गोलमाल (1979)
साथ ही जीवन के बारे में बताते हैं —
“जीना यहाँ, मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ”
गीतकार: शैली शैलेंद्र | फ़िल्म: मेरा नाम जोकर (1970)
और जब किसी से पुराने झगड़े भूलकर नई शुरुआत करनी हो, तो ये गीत मतभेद भुला देता है —
“छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी नए दौर में लिखेंगे मिलकर नई कहानी”
गीतकार: प्रेम धवन | फ़िल्म: हम हिंदुस्तानी (1960)
सच तो ये है कि सुख-दुख तो आते-जाते रहेंगे। रुकना नहीं है, क्योंकि —
“संसार है एक नदिया, सुख-दुख दो किनारे हैं हर हाल में बहना है, चलना है, ज़िंदगी की यही रीति पुरानी है”
गीतकार: प्रदीप | फ़िल्म: मिलन (1967)
लोग क्या कहेंगे? इस सवाल ने कितने सपने तोड़े हैं। पर साहिर ने बरसों पहले जवाब दे दिया था —
“कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना छोड़ो बेकार की बातों में, कहीं बीत न जाए रैना”
गीतकार: आनंद बक्शी | फ़िल्म: अमर प्रेम (1972)
और जब सफलता हाथ न लग रही हो, तो किशोर दा का ये बेफ़िक्र अंदाज़ याद रखिए —
“मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया”
गीतकार: साहिर लुधियानवी | फ़िल्म: हम दोनों (1961)
हार मान लेना सबसे आसान है। मगर गीत हिम्मत देता है —
“रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के काँटों पे चल के मिलेंगे साये बहार के”
गीतकार: साहिर लुधियानवी | फ़िल्म: इम्तिहान (1974)
और जब हौसला चाहिए हो — देश के लिए, टीम के लिए, खुद के लिए — तो बस एक लाइन काफ़ी है —
“कोई हमें क्या रोकेगा, जब हौसला बना ले कोई सरहदें पार कर जाएगा, चक दे इंडिया”
गीतकार: जावेद अख्तर | फ़िल्म: चक दे इंडिया (2007)
आत्मबोध की लौ जलाते गीत
ज़िंदगी के शोर में जब अंदर की आवाज़ दब जाए, तो ये गीत हमें खुद से मिलवाते हैं। ये प्रार्थना हैं, सवाल हैं और उम्मीद भी।
इंसानियत का सबसे पहला सबक —
“ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हों हमारे करम नेकी पर चलें और बदी से टलें, ताकि हँसते हुए निकले दम”
गीतकार: भरत व्यास | फ़िल्म: दो आँखें बारह हाथ (1957)
सच बोलने की ताक़त शैलेंद्र ने दो लाइनों में समझा दी —
“सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है न हाथी है, न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है”
गीतकार: शैलेंद्र | फ़िल्म: तीसरी कसम (1966)
और जब निराशा छाई हो, तो उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए —
“वो सुबह कभी तो आएगी, इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा, जब दुख के बादल पिघलेंगे”
गीतकार: साहिर लुधियानवी | फ़िल्म: फिर सुबह होगी (1958)
कभी-कभी तन्हाई में यादों के दीप जलते हैं —
“कहीं दूर जब दिन ढल जाए, साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए, मेरे ख़यालों के आँगन में कोई”
गीतकार: योगेश | फ़िल्म: आनंद (1971)
मोहब्बत में टूटना भी एक फ़लसफ़ा दे जाता है —
“जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला हमने तो जब कलियाँ माँगीं, काँटों का हार मिला”
गीतकार: साहिर लुधियानवी | फ़िल्म: प्यासा (1957)
और जब रिश्ते उलझ जाएँ, तो साहिर ने बहुत अच्छा रास्ता दिखाया —
“चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की”
गीतकार: साहिर लुधियानवी | फ़िल्म: गुमराह (1963)
इंसाफ़ और मोहब्बत का पैग़ाम देता ये गीत आज भी उतना ही सच्चा है —
“इंसाफ़ का मंदिर है ये, भगवान का घर है कहते हैं इसको मंदिर-मस्जिद, प्यार की ये रहगुज़र है”
गीतकार: शकील बदायूंनी | फ़िल्म: अमर (1954)
ये गीत पुराने ज़रूर हैं, पर इनकी बातें हमेशा नई लगती हैं। क्योंकि ज़िंदगी के सवाल वही हैं — बस हर पीढ़ी अपने लिए जवाब इन नग़मों में ढूँढ़ लेती है। आज के गीतों में तकनीक और प्रस्तुति भले ही आधुनिक हो, लेकिन पुराने गीतों की गहराई, भाव और दर्शन उन्हें आज भी अमर बना देते हैं।





