घर बैठे अखिलेश कैसे करेंगे बीजेपी के वोट में सेंधमारी

How will Akhilesh make inroads into the BJP's vote bank from the comfort of his home?

संजय सक्सेना

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव कब तक सोशल मीडिया पर ट्वीट करके अपनी राजनीति चमकाते रहेंगे। वह क्यों अपने एयर कंडीशनर रूम से बाहर आकर जनता से संवाद नहीं करते हैं। बिना हाथ-पैर हिलाए और चलाए अखिलेश कभी मोदी तो कभी योगी सरकार पर हर उस मुद्दे के खिलाफ हमला बोलते रहते हैं, जिससे उन्हें लगता है कि बीजेपी के वोट बैंक में वह सेंधमारी कर सकते हैं। आज तक अयोध्या जाकर प्रभु श्री रामलला के दर्शन नहीं करने वाले अखिलेश यादव चंदा चोरी के नाम पर चोरी के आरोपियों को नहीं, योगी-मोदी सरकार को ज्यादा कोस रहे हैं। लेकिन वह यह भूल गए हैं कि जनता की याददाश्त कमजोर नहीं है। सपा की सरकार के समय चाहे मुख्यमंत्री मुलायम सिंह रहे हों या फिर अखिलेश यादव, मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत में ही लगे रहते थे। इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने से परहेज नहीं करते थे। मुलायम सिंह ने कारसेवकों पर गोली चलाने से परहेज नहीं किया, और बाद में यहां तक कहा कि इससे अधिक हम (मुलायम) मुसलमानों के लिए क्या कर सकते थे। तो अखिलेश यादव ने मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान पीड़ितों का धर्म देखकर सिर्फ मुसलमानों को मुआवजा देने का आदेश जारी किया था। आतंकवादियों के मुकदमों वापस लेने जैसा शर्मनाक कारनामा भी अखिलेश सरकार में ही हुआ था। सपा मुखिया मुसलमानों को खुश करने के लिए कब्रिस्तान में सरकारी धन पानी की तरह बहाते थे।

समाजवादी गुंडों ने लखनऊ में बसपा सुप्रीमो मायावती पर कैसे जानलेवा हमला किया था, यह जगजाहिर है। इस हमले में अतीक अहमद जैसा माफिया भी शामिल था। व्यक्तिगत रूप से भी अखिलेश ने कई बार मर्यादाएं तोड़ने में देरी नहीं की। अपने पिता के साथ भरे मंच पर अभद्रता, चाचा शिवपाल को बार-बार अपमानित करने का आरोप भी अखिलेश यादव पर लगा हुआ है। यह और बात है कि समाजवादियों और उनके मुखिया को यह सब याद नहीं है। अखिलेश यादव द्वारा चंदा चोरी मामले को आस्था से इतर जिस तरह से राजनीतिक रंग दिया जा रहा है, उससे समाजवादी पार्टी को किस तरह से सियासी फायदा मिल सकता है। यह यक्ष प्रश्न है। फिलहाल, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की आजकल हर उस मुद्दे पर त्वरित प्रतिक्रिया आती है, हर विवाद पर उनका बयान तैयार रहता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सोशल मंच पर की जाने वाली यह राजनीति जमीनी हकीकत से जुड़ी है? क्या केवल कमरे में बैठकर किए गए संदेशों से जनता का दिल जीता जा सकता है? राजनीति के जानकार मानते हैं कि जो नेता जनता के बीच जाकर संवाद नहीं करता, वह केवल अपने समर्थकों को संबोधित करता रहता है, नए मतदाताओं तक उसकी पहुंच नहीं बन पाती।

अखिलेश की रणनीति स्पष्ट दिखती है। जब भी कोई ऐसा मुद्दा उठता है जिससे भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं में दरार डाली जा सके, वे तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। चाहे केंद्र की सरकार हो या प्रदेश की, उनके निशाने पर दोनों रहते हैं। यह राजनीतिक चालाकी तो है, लेकिन इसमें एक खोखलापन भी है। जो नेता स्वयं अपने कार्यकाल में जनहित के कार्य न कर पाया हो, वह दूसरों की कमियां गिनाकर कितने समय तक अपनी राजनीति चमका सकता है, यह विचारणीय है। चंदा चोरी के ताजे विवाद को लेकर अखिलेश यादव जिस तरह से सक्रिय हुए हैं, उसमें एक सोची-समझी रणनीति नजर आती है। इस मामले को आस्था और धर्म से परे ले जाकर उन्होंने इसे सरकारी विफलता का प्रतीक बनाने की कोशिश की है। उनका तर्क है कि यदि सरकार सक्षम होती तो श्रद्धालुओं के साथ ऐसा धोखा न होता। इस तर्क में एक सतही आकर्षण है जो सामान्य मतदाता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन जो बात वे नहीं कहते, वह यह है कि स्वयं उन्होंने आज तक अयोध्या जाकर श्री रामलला के दर्शन नहीं किए। जिस मंदिर और उस नगरी से करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी है, उसके प्रति उनका यह व्यवहार उनकी मानसिकता को उजागर करता है।

बहरहाल, चंदा चोरी के इस मामले को राजनीतिक रंग देने से समाजवादी पार्टी को कुछ सीमित लाभ अवश्य मिल सकता है। पहला, इससे उनका वह मतदाता वर्ग और मजबूती से जुड़ सकता है जो पहले से ही सत्तारूढ़ दल से नाराज है। दूसरा, जो लोग इस घटना से सीधे प्रभावित हुए हैं या जिनके परिचित प्रभावित हुए हैं, उनमें से कुछ सपा की ओर झुक सकते हैं। तीसरा, इस विषय को उठाकर वे यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि वे आम आदमी की पीड़ा के साथ खड़े हैं। परंतु इस रणनीति की एक बड़ी सीमा भी है। जब कोई नेता हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखता है, तो जनता धीरे-धीरे उसकी नीयत को पहचान लेती है। आस्था के मामले में राजनीति करना उल्टा भी पड़ सकता है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां धार्मिक भावनाएं बहुत गहरी हैं। वैसे भी समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व का इतिहास विवाद के मामले में बहुत उज्ज्वल नहीं रहा है। जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया था। इस घटना में अनेक निर्दोष श्रद्धालुओं की जान गई थी। बाद में मुलायम सिंह ने स्वयं कहा था कि उन्होंने मुसलमानों के लिए जो किया, उससे अधिक और क्या किया जा सकता था। यह बयान उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं को साफ-साफ बता देता है। हिंदू श्रद्धालुओं की जान लेकर एक वर्ग विशेष को संतुष्ट करने की यह राजनीति समाजवादी पार्टी की पहचान बन गई थी।

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल में भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया गया। मुजफ्फरनगर दंगों के समय पीड़ितों को मुआवजा देने में धर्म के आधार पर भेदभाव किए जाने के गंभीर आरोप उन पर लगे। जो हिंदू परिवार उस हिंसा में पीड़ित हुए, उन्हें सरकारी सहायता से वंचित रखा गया, ऐसा आरोप विपक्ष ने बार-बार लगाया। इससे भी आगे बढ़कर उनकी सरकार में आतंकवादियों के विरुद्ध दर्ज मुकदमे वापस लेने की कोशिश की गई, जो देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ था। इस शर्मनाक कारनामे को कोई भी देशभक्त नागरिक भूल नहीं सकता। कब्रिस्तानों के निर्माण और रखरखाव पर सरकारी धन का अत्यधिक व्यय करना भी उनकी तुष्टिकरण की नीति का हिस्सा था। इन सबके बावजूद अखिलेश यादव अपनी पार्टी को प्रासंगिक बनाए रखने में कुछ हद तक सफल रहे हैं। इसका कारण यह है कि उत्तर प्रदेश में एक बड़ा मतदाता वर्ग ऐसा है जो भाजपा का विकल्प चाहता है। इस शून्य को भरने की कोशिश में अखिलेश यादव हर उस मुद्दे को हाथ लगाते हैं जो सत्तारूढ़ दल के लिए असहज हो। चंदा चोरी का मामला भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। इससे उन्हें अल्पकालिक राजनीतिक लाभ मिल सकता है, परंतु दीर्घकालिक विश्वसनीयता के लिए उन्हें अपने अतीत की कालिख से मुक्ति पानी होगी।