अशोक भाटिया
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले अयोध्या राम मंदिर को लेकर सियासी बहस छिड़ गई हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सबसे पहले हिन्दुत्व की पिच पर उतर कर राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी होने का दावा किया, जिससे प्रदेश में सियासी भूचाल आ गया है। भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों से इनकार कर रही है वहीं विपक्ष एकजुट होता दिख रहा है।
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर उठ रहे सवालों के बाद प्रदेश की सियासत इसे लेकर गर्म हो गई है। आरोप हैं कि राम मंदिर के दानपात्र से करीब साढ़े सात करोड़ रुपये का चढ़ावा चोरी हो गया। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने खुलकर इस पर बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि 2027 में अयोध्या का मुद्दा और गर्मा सकता है।
राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर उस वक्त सवाल और बढ़ गए जब श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास ने ये कह दिया कि कि जब जांच करने वाले खुद बेईमान तो क्या जांच होगी? वहीं पूर्व बीजेपी सांसद बृजभूषण शऱण सिंह ने तो जो कहा उससे बीजेपी की बैचेनी और बढ़ गई।
बृजभूषण ने राम मंदिर के चढ़ावे पर जवाब देते हुए कहा कि मैंने सच गया तो परेशानी में आ जाऊंगा। वो बड़े लोग हैं, समय आने पर सच बताऊंगा। जिसके बाद विपक्षी दल ने उन बड़े लोगों का नाम पूछना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि आखिर वो बड़े लोग कौन है और वो समय कब आएगा जब बृजभूषण बोलेंगे? जो किसी से नहीं डरते वो किन बड़े लोगों से डर रहे हैं।
सपा आरोप लगा रही है कि मंदिर में बड़ी चोरी हुई है। बड़े लोगों के संरक्षण में हुई हैं। इसलिए इसकी जांच होनी चाहिए। अखिलेश यादव ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहते है कि चढ़ावे में चोरी होगी तो शिकायत तो होगी। अगर दूरबीन और सीसीटीवी काम कर रहे होते तो डबल इंजन की सरकार में ऐसा नहीं होता। कांग्रेस भी समाजवादी पार्टी के साथ सुर में सुर मिला रही है। कांग्रस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहत्ते है कि आप चढ़ावे की चोरी सोच सकते हैं आप किस नरक में जाएंगे?
इस मुद्दे पर अभी तक बीजेपी बैकफुट पर दिखाई दे रही है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इस सवाल पर झल्लाते हुए कहते है कि कौन कह रहा है गायब हो गए।? ये सरकार विषय नहीं है। हम किस-किस की बातों का जवाब देते रहेंगे। अयोध्या हमेशा से ही बीजेपी का अहम मुद्दा रही है। ऐसे में इस तरह की आरोप लगने से भाजपा की परेशानियां बढ़ सकती हैं।
इस पूरे विवाद में राम मंदिर से जुड़े वरिष्ठ संतों के बयानों ने मामले को और भी अधिक उलझा दिया है। श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास ने एक बहुत ही बड़ा बयान दिया है। उन्होंने जांच व्यवस्था पर ही गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि जब जांच करने वाले ही खुद बेईमान हैं तो क्या निष्पक्ष जांच होगी। ट्रस्ट से जुड़े इतने अहम व्यक्ति के इस सार्वजनिक बयान ने विपक्ष के आरोपों को और भी ज्यादा धार दे दी है। इस चौंकाने वाली टिप्पणी के बाद राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर उठने वाले सवालों की संख्या अचानक बहुत अधिक बढ़ गई है।
गौरतलब है कि राम मंदिर विवाद और आंदोलन के दौरान, सपा का रुख हमेशा से बहस का रहा है। 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस कार्रवाई और गोलीकांड का जिक्र आज भी राजनीतिक चर्चाओं में होता है। इसके अलावा, राम मंदिर मामले में आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान भी सपा का रुख सवालों के घेरे में रहा। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आज जब राम मंदिर को लेकर नए आरोप लगाए जा रहे हैं, तो लोग पार्टी के पुराने रुख को भी याद कर रहे हैं।
हाल के दिनों में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों को लेकर भी राजनीति तेज हुई है। विपक्षी दलों और भाजपा समर्थकों का आरोप है कि कुछ धार्मिक हस्तियों के बयानों का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी तरह गोसंरक्षण का मुद्दा भी चर्चा में है। आलोचकों का कहना है कि आज गोसंरक्षण की बात करने वाले नेताओं के शासनकाल में अवैध बूचड़खानों और गोवंश तस्करी जैसे मुद्दों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई थी। ऐसे आरोपों के कारण राजनीतिक विरोधी सपा की नीतियों और वर्तमान बयानों के बीच विरोधाभास होने की बात कहते हैं।
बता दें समाजवादी पार्टी पर लंबे समय से मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं। विरोधियों का दावा है कि सपा सरकारों के दौरान कई फैसले विशेष समुदाय को ध्यान में रखकर लिए गए, जबकि पार्टी हमेशा इन आरोपों को खारिज करती रही है। मुजफ्फरनगर दंगों से लेकर आतंकवाद के आरोपियों पर मुकदमे वापस लेने जैसे पुराने मुद्दे भी समय-समय पर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते रहते हैं। इसी कारण जब राम मंदिर, सनातन या धार्मिक मामलों पर सपा की ओर से कोई बयान आता है तो उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाने लगते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी दल अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं। ऐसे में राम मंदिर, सनातन, गोसंरक्षण और धार्मिक आस्था से जुड़े मुद्दे भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि अखिलेश यादव एक ऐसा संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें धार्मिक मुद्दों पर पूरी तरह विरोध या समर्थन की जगह मध्यम रास्ता अपनाया जाए। हालांकि, यह रणनीति कितनी सफल होगी, इसका फैसला जनता करेगी। फिलहाल इतना जरूर है कि राम मंदिर से लेकर सनातन और हिंदू वोट बैंक तक, ये सभी मुद्दे आने वाले चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं।
इस बीच शिवसेना उद्धव गुट ने भी इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया है। पार्टी नेता संजय राउत ने कहा कि उद्धव ठाकरे जल्द अयोध्या जाएंगे क्योंकि वह इस पूरे मामले से बेहद व्यथित हैं। राउत ने कहा कि भगवान राम जैसे बुला रहे हैं और अब अयोध्या जाकर इस मुद्दे को उठाना जरूरी हो गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर राम मंदिर जैसे पवित्र स्थल के चंदे पर सवाल कैसे खड़े हो सकते हैं।संजय राउत ने दावा किया कि उनकी पार्टी ने मंदिर निर्माण के लिए एक करोड़ रुपये का योगदान दिया था और अब ट्रस्ट को जवाब देना चाहिए। उन्होंने सीसीटीवी फुटेज और नृपेंद्र मिश्र की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। राउत ने पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि यदि वह कह रहे हैं कि उन्हें पूरी जानकारी है लेकिन ताकतवर लोगों के कारण बोल नहीं पा रहे, तो मामला बेहद गंभीर है।
हम आपको बता दें कि महिपाल सिंह नाम के एक व्यक्ति, जो खुद को मंदिर का पूर्व लेखा प्रभारी बताते हैं, उन्होंने दावा किया है कि लंबे समय से चंदे में अनियमितताएं हो रही थीं। उन्होंने कुछ प्रभावशाली लोगों के नाम लेने के साथ यह भी आरोप लगाया कि शिकायत करने के बाद उन्हें हटा दिया गया।
बहरहाल, राजनीतिक आरोपों और सफाइयों के बीच यह मामला अब केवल चुनावी बयानबाजी तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी घटनाक्रम की रिपोर्ट मांगी है और माना जा रहा है कि मंदिर प्रबंधन और व्यवस्थाओं की समीक्षा हो सकती है। ऐसे समय में जब भाजपा एक बार फिर राम मंदिर के भावनात्मक मुद्दे को चुनावी आधार बनाने की तैयारी में है, तब चंदे को लेकर उठे सवाल उसके लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकते हैं। क्योंकि जिस राम मंदिर को भाजपा ने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनाया, अब उसी मंदिर के चंदे को लेकर उठ रहा विवाद विपक्ष को नया हथियार देता दिखाई दे रहा है।





