अजेश कुमार
राजनीति में चुनावी हार केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी दल की आंतरिक मजबूती, नेतृत्व की स्वीकार्यता और संगठनात्मक संरचना की वास्तविक स्थिति को भी उजागर कर देती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक अजेय दिखाई देने वाली तृणमूल कांग्रेस आज ऐसे ही एक कठिन दौर से गुजरती प्रतीत हो रही है। जिस समय दिल्ली में विपक्षी दल केंद्र सरकार के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करने के लिए एकजुटता का प्रदर्शन कर रहे थे, उसी समय तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरता असंतोष एक बड़े राजनीतिक संकट का संकेत दे रहा था। यह विरोध अब केवल संगठन या विधानसभा तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि संसदीय स्तर तक पहुंचता नजर आ रहा है।
हालिया घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से पनप रहा असंतोष अब खुले विद्रोह का रूप ले चुका है? यदि ऐसा है, तो इसके राजनीतिक परिणाम केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
राजनीतिक दलों में असहमति और मतभेद कोई नई बात नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक भी माना जाता है। किंतु जब मतभेद लगातार बढ़ते हुए संगठनात्मक टूट की स्थिति तक पहुंच जाएं, तब यह नेतृत्व के सामने गंभीर चुनौती बन जाते हैं। तृणमूल कांग्रेस के साथ फिलहाल कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है। विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। अनेक नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने नेतृत्व की कार्यशैली को लेकर सवाल उठाए। कुछ ने संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर नाराजगी जाहिर की, जबकि कुछ ने नेतृत्व के सीमित दायरे में सिमट जाने की शिकायत की। चुनावी हार के बाद इन असंतोषों को यदि समय रहते दूर कर लिया जाता तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती, लेकिन अब जब बड़ी संख्या में विधायक अलग राह पकड़ चुके हैं और सांसदों के स्तर पर भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है, तब यह केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का मामला नहीं रह जाता।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी दल में बगावत अचानक नहीं होती। उसके पीछे वर्षों से जमा होती नाराजगी, संवादहीनता और नेतृत्व के प्रति घटता विश्वास जिम्मेदार होता है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी यही स्थिति दिखाई देती है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया है कि संगठन में निर्णय लेने की शक्ति कुछ व्यक्तियों तक सीमित होती जा रही थी। इससे अनेक अनुभवी नेताओं को स्वयं को उपेक्षित महसूस होने लगा।
विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। विरोधियों का आरोप रहा है कि पार्टी में एक समानांतर शक्ति केंद्र विकसित हो गया था, जिसके कारण पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका सीमित होती चली गई। यद्यपि पार्टी नेतृत्व ने इन आरोपों को हमेशा खारिज किया, लेकिन हालिया घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि इन शिकायतों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत हमेशा उनकी जनस्वीकार्यता और संगठन पर मजबूत पकड़ रही है। उन्होंने वामपंथी शासन के तीन दशकों से अधिक लंबे दौर को समाप्त कर पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी थी। उनके नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक जनआंदोलन की तरह विकसित हुई। यही कारण था कि पार्टी का संगठन लंबे समय तक ममता बनर्जी के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द एकजुट बना रहा।
लेकिन राजनीति में कोई भी नेतृत्व केवल लोकप्रियता के सहारे लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकता। संगठन को लगातार संवाद, संतुलन और अवसरों की आवश्यकता होती है। जब नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह महसूस होने लगे कि उनकी भूमिका कम हो रही है या उनकी बात सुनी नहीं जा रही, तब असंतोष जन्म लेता है। यदि उस असंतोष का समय पर समाधान न किया जाए तो वह विद्रोह में बदल जाता है।
तृणमूल कांग्रेस की वर्तमान स्थिति को इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। यह केवल कुछ नेताओं के दल बदलने का मामला नहीं है, बल्कि यह उस संगठनात्मक चुनौती का संकेत है जो लंबे समय से आकार ले रही थी।
पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास भी इस संदर्भ में दिलचस्प है। जब तृणमूल कांग्रेस उभार पर थी, तब वामपंथी दलों के अनेक नेता और कार्यकर्ता उसके साथ आ गए थे। उस समय सत्ता परिवर्तन की संभावना और राजनीतिक भविष्य की तलाश ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक पलायन को जन्म दिया था। बाद में जब भारतीय जनता पार्टी राज्य में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरी, तब तृणमूल कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता वहां चले गए। इस दृष्टि से देखें तो राजनीतिक दलों के बीच नेताओं का आना-जाना कोई असामान्य घटना नहीं है। लेकिन वर्तमान परिस्थिति अलग है। चुनाव परिणाम आने के कुछ ही समय बाद जिस तेजी से असंतोष सामने आया है, उसने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी चौंकाया है। यह संकेत देता है कि समस्या केवल चुनावी पराजय तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर कहीं अधिक गहरे स्तर पर मौजूद है।
ममता बनर्जी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट बनाए रखने की है। इसके लिए केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। उन्हें संगठन के भीतर संवाद स्थापित करना होगा, नाराज नेताओं को विश्वास में लेना होगा और यह संदेश देना होगा कि पार्टी केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। यदि, यह प्रयास नहीं किया गया तो असंतोष और बढ़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ना तय है। वर्तमान समय में विपक्षी दल केंद्र सरकार के खिलाफ साझा रणनीति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, प्रश्नपत्र लीक, कृषि संकट और सामाजिक मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। लेकिन किसी भी विपक्षी गठबंधन की प्रभावशीलता उसके घटक दलों की मजबूती पर निर्भर करती है।
यदि विपक्ष के प्रमुख दलों में से एक आंतरिक संकट से जूझ रहा हो, तो उसका असर पूरे विपक्षी मोर्चे पर पड़ता है। तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की एक महत्वपूर्ण आवाज रही है। कई अवसरों पर ममता बनर्जी को विपक्षी राजनीति के संभावित केंद्रीय चेहरों में भी देखा गया। उनकी राजनीतिक सक्रियता और संघर्षशील छवि ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
ऐसी स्थिति में यदि उनकी पार्टी लगातार कमजोर होती दिखाई देती है, तो विपक्षी राजनीति की सामूहिक शक्ति भी प्रभावित होगी। विपक्ष की एकता केवल बैठकों और संयुक्त वक्तव्यों से मजबूत नहीं होती, बल्कि उसके लिए प्रत्येक दल का संगठनात्मक रूप से सशक्त होना भी आवश्यक है।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि तृणमूल कांग्रेस किसी अपरिवर्तनीय संकट में फंस चुकी है। भारतीय राजनीति में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहां बड़े राजनीतिक दल गंभीर चुनौतियों से उबरकर और अधिक मजबूत होकर सामने आए हैं। ममता बनर्जी स्वयं संघर्ष की राजनीति से निकली नेता हैं और उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में अनेक संकटों का सामना किया है। इसलिए उनकी राजनीतिक क्षमता को कम करके नहीं आंका जा सकता।
लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि वर्तमान संकट को केवल बाहरी साजिश या विरोधियों की रणनीति बताकर टाला नहीं जा सकता। किसी भी दल में बड़े पैमाने पर असंतोष तब ही उभरता है जब उसके भीतर कुछ वास्तविक समस्याएं मौजूद हों। इसलिए तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व को आत्ममंथन की आवश्यकता है।
आज पश्चिम बंगाल की राजनीति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर सत्तारूढ़ दल के भीतर असंतोष बढ़ रहा है, दूसरी ओर विपक्ष इस स्थिति को अपने लिए अवसर के रूप में देख रहा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि तृणमूल कांग्रेस इस चुनौती का सामना किस प्रकार करती है।
फिलहाल, इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह संकट केवल कुछ नेताओं की नाराजगी का मामला नहीं है, बल्कि नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक भविष्य से जुड़ा एक व्यापक प्रश्न है। ममता बनर्जी के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा अपनी पार्टी को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं के विश्वास को पुनः स्थापित करने की है। यदि वह इसमें सफल होती हैं तो यह संकट एक अस्थायी राजनीतिक झटका साबित हो सकता है। लेकिन यदि असंतोष की यह धारा और तेज होती है, तो इसके परिणाम पश्चिम बंगाल की राजनीति ही नहीं, राष्ट्रीय विपक्ष की दिशा और दशा को भी प्रभावित कर सकते हैं।
यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस में चल रही यह उठापटक केवल एक राज्य की राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि देश की व्यापक विपक्षी राजनीति के भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संकेत बन चुकी है।





