माता-पिता हैं वर्तमान की शक्ति और भविष्य की प्रेरणा

Parents are the strength of the present and the inspiration of the future

ललित गर्ग

विश्व के अधिकतर देशों की संस्कृति में माता-पिता का रिश्ता सबसे बड़ा एवं प्रगाढ़ माना गया है। भारत में तो इन्हें ईश्वर का रूप माना गया है। माता-पिता को उनके बच्चों के लिए किए गए उनके काम, बच्चों के प्रति उनकी निस्वार्थ प्रतिबद्धता और इस रिश्ते को पोषित करने के लिए उनके आजीवन त्याग के लिए सम्मान और सराहना देने के लिए प्रतिवर्ष विश्व माता-पिता (अभिभावक) दिवस 1 जून को मनाया जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का पालन दिवस है। यह दिन हमें उस महान शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी अवसर देता है, जिसके कारण मानव जीवन का अस्तित्व, विकास और संस्कार संभव हो पाते हैं। वर्ष 2026 की थीम ‘माता-पिता के लिए एक साथ’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश लेकर आई है। यह केवल माता-पिता के सम्मान का आह्वान नहीं करती, बल्कि पूरे समाज, समुदायों, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारों को यह प्रेरणा देती है कि वे माता-पिता की भूमिका को समझें, उनके साथ खड़े हों और उनके दायित्वों को निभाने में सहयोग करें।

अधिकांश देशों में सदियों से माता-पिता का सम्मान करने की परंपरा रही है। माता-पिता ईश्वर का सबसे अच्छा उपहार हैं। जीवन में कोई भी माता-पिता की जगह नहीं ले सकता। वे सच्चे शुभचिंतक हैं। लेकिन मानव इतिहास में कभी भी परिवार और माता-पिता की भूमिका इतनी चुनौतीपूर्ण नहीं रही, जितनी आज है। तकनीकी क्रांति ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन मानवीय संबंधों को नई परीक्षाओं के सामने भी खड़ा कर दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में बच्चों की दुनिया तेजी से बदल रही है। ज्ञान के स्रोत घर और विद्यालय से निकलकर डिजिटल मंचों तक पहुंच गए हैं। ऐसे समय में माता-पिता की भूमिका केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वे बच्चों के भावनात्मक संतुलन, नैतिक विकास, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक चेतना के प्रमुख संरक्षक बन गए हैं। वे केवल जीवन देने वाले नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले हैं। दुनिया के हर समाज में माता-पिता को सम्मान दिया जाता है, लेकिन भारतीय संस्कृति ने उन्हें विशेष रूप से देवत्व का स्थान प्रदान किया है। हमारे उपनिषदों का उद्घोष ‘मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः’- मानव सभ्यता के श्रेष्ठतम जीवन मूल्यों में से एक है। मां अपने वात्सल्य, करुणा, त्याग और ममता से जीवन को सींचती है, जबकि पिता अपने परिश्रम, अनुशासन, संरक्षण और संघर्ष से भविष्य की मजबूत नींव रखता है। इसी कारण भारतीय परिवार व्यवस्था सदियों तक विश्व के लिए आदर्श बनी रही है।

हमारे इतिहास और पुराणों में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो माता-पिता के सम्मान और सेवा की प्रेरणा देते हैं। श्रवण कुमार की कथा केवल एक पुत्र की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। अपने वृद्ध और दृष्टिहीन माता-पिता को कंधों पर बैठाकर तीर्थयात्रा कराने वाले श्रवण कुमार ने यह सिद्ध किया कि माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। भगवान श्रीराम ने पिता दशरथ के वचन की रक्षा के लिए राज्य, वैभव और सुखों का त्याग कर वनवास स्वीकार किया। यह केवल आज्ञापालन नहीं था, बल्कि माता-पिता के सम्मान को सर्वाेच्च मानने का संदेश था। महाभारत, रामायण और जैन तथा बौद्ध साहित्य में भी माता-पिता के प्रति श्रद्धा को जीवन का सर्वाेच्च मूल्य माना गया है। भगवान के रूप में माता-पिता हमारे लिये एक सौगात हैं जिनकी हमें सेवा करनी चाहिए और कभी उनका दिल नहीं तोडना चाहिए। एक बच्चे को बड़ा और सभ्य बनाने में उसके पिता का योगदान कम करके नहीं आंका जा सकता। मां का रिश्ता सबसे गहरा एवं पवित्र माना गया है, लेकिन बच्चे को जब कोई खरोंच लग जाती है तो जितना दर्द एक मां महसूस करती है, वही दर्द एक पिता भी महसूस करते हैं। पिता कठोर इसलिये होते हैं ताकि बेटा उन्हें देख कर जीवन की समस्याओं से लड़ने का पाठ सीखे, सख्त एवं निडर बनकर जिंदगी की तकलीफों का सामना करने में सक्षम हो। माँ ममता का सागर है पर पिता उसका किनारा है। माँ से ही बनता घर है पर पिता घर का सहारा है। माँ से स्वर्ग है माँ से बैकुंठ, माँ से ही चारों धाम है पर इन सब का द्वार तो पिता ही है। आधुनिक समाज में माता-पिता और उनकी संतान के संबंधों की संस्कृति को जीवंत बनाने की अपेक्षा है।

आज जब एकल परिवारों का विस्तार हो रहा है, जीवन की गति तेज हो गई है और रिश्तों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है, तब माता-पिता के प्रति संवेदनशीलता को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या, पारिवारिक विघटन और पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि कहीं आधुनिकता की दौड़ में हम अपने मूल्यों को तो नहीं खो रहे हैं। आर्थिक सफलता, सामाजिक प्रतिष्ठा और तकनीकी उपलब्धियां तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ मानवीय संवेदनाएं भी जीवित रहें। जिस घर में माता-पिता सम्मानित होते हैं, वहां संस्कारों की धारा बहती है; जहां उनका उपेक्षित होना प्रारंभ होता है, वहां परिवार की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है। वास्तव में माता-पिता किसी भी बच्चे के प्रथम गुरु होते हैं। विद्यालय ज्ञान दे सकता है, लेकिन जीवन जीने की कला, संघर्ष का साहस, प्रेम का भाव, करुणा की संवेदना और नैतिकता की नींव माता-पिता ही रखते हैं। वे अपने बच्चों के लिए अनगिनत त्याग करते हैं, अनेक सपनों का परित्याग करते हैं और बिना किसी अपेक्षा के उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए समर्पित रहते हैं। उनका प्रेम ऐसा निवेश है जिसका प्रतिफल वे कभी मांगते नहीं, लेकिन जिसकी छाया जीवनभर संतानों को सुरक्षा प्रदान करती रहती है। माता-पिता से जुड़ी संस्कृति एवं परिवारों को सशक्त बनाए बिना किसी भी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम माता-पिता को केवल सम्मान देने की औपचारिकता तक सीमित न रहें, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञता, संवेदनशीलता और सहयोग की संस्कृति विकसित करें। उनके अनुभवों को सुनें, उनके संघर्षों को समझें, उनके साथ समय बिताएं और उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि वे परिवार और समाज के लिए आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने पहले थे। माता-पिता केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की शक्ति और भविष्य की प्रेरणा हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नारे “सबका साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास’’ की गूंज और भावना अभिभावकों के जीवन में उजाला बने, तभी नया भारत निर्मित होगा। मानवीय रिश्तों में दुनिया में माता-पिता और संतान का रिश्ता अनुपम है, संवेदनाभरा है। माता-पिता हर संतान के लिए एक प्रेरणा हैं, एक प्रकाश हैं और संभावनाओं के पुंज हैं। हर माता-पिता अपनी संतान की निषेधात्मक और दुष्प्रवृत्तियों को समाप्त करके नया जीवन प्रदान करते हैं। माता-पिता की प्रेरणाएं संतान को मानसिक प्रसन्नता और परम शांति देती है। जैसे औषधि दुख, दर्द और पीड़ा का हरण करती है, वैसे ही माता-पिता शिव पार्वती की भांति पुत्र के सारे अवसाद और दुखों का हरण करते हैं।

विश्व माता-पिता दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि बदलती दुनिया में बहुत कुछ बदल सकता है, लेकिन माता-पिता के प्रेम, त्याग, मार्गदर्शन और समर्पण का कोई विकल्प कभी नहीं हो सकता। वे परिवार की जड़ हैं, संस्कृति के संवाहक हैं, मानवता के प्रथम शिक्षक हैं और सभ्यता की सबसे मजबूत नींव हैं। यदि हम एक संवेदनशील, संस्कारित और समृद्ध समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें माता-पिता के सम्मान और सशक्तिकरण को अपनी सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में शामिल करना होगा। इस दिवस को मनाने की सार्थकता तभी है जब हम केवल भारत में ही नहीं है बल्कि विश्व में अभिभावकों के साथ होने वाले अन्याय, उपेक्षा और दुर्व्यवहार पर लगाम लगाने की भी है। प्रश्न है कि दुनिया में अभिभावक दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों हुई? क्यों अभिभावकों की उपेक्षा एवं प्रताड़ना की स्थितियां बनी हुई है? चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि अभिभावकों की उपेक्षा के इस गलत प्रवाह को कैसे रोके। क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल अभिभावकों का जीवन दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी-आदमी के बीच के भावात्मक फासलों को भी बढ़ा दिया है।