ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर उठ रहे सवाल ? भविष्य से खिलवाड़ कब तक

Questions raised about the on-screen marking system—how long will the future be toyed with?

सौरभ वार्ष्णेय

किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि नागरिकों के व्यक्तित्व, कौशल और सोच को विकसित करने का साधन भी है। इसलिए देश के विकास और भविष्य को मजबूत बनाने के लिए शिक्षा नीति पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। शिक्षा व्यवस्था में तकनीक का प्रवेश आज की आवश्यकता है। परीक्षा मूल्यांकन को अधिक पारदर्शी, तेज और त्रुटिरहित बनाने के उद्देश्य से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने 2026 में कक्षा 12 की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की। इस व्यवस्था में उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर परीक्षकों के सामने डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बोर्ड का दावा है कि इससे जोड़-घटाव की गलतियां कम होंगी, मूल्यांकन की निगरानी बेहतर होगी और परिणाम अधिक विश्वसनीय बनेंगे।

लेकिन जिस तकनीक को सुधार का माध्यम माना गया था, वही अब विवाद के केंद्र में है। देशभर से छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने स्कैनिंग की गुणवत्ता, उत्तर पुस्तिकाओं के कथित मिश्रण, कम अंक मिलने और मूल्यांकन संबंधी विसंगतियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। कुछ मामलों में छात्रों ने दावा किया कि उन्हें दिखाई गई स्कैन की गई उत्तर पुस्तिका उनकी नहीं थी, जबकि कई उत्तर पुस्तिकाओं को खराब स्कैनिंग के कारण दोबारा स्कैन करना पड़ा या मैन्युअल रूप से जांचना पड़ा।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रव्यापी क्रियान्वयन से पहले किए गए परीक्षणों में कई तकनीकी और संचालन संबंधी कमियां सामने आई थीं। आंतरिक रिपोर्टों में प्रशिक्षण की कमी, तकनीकी गड़बडिय़ों, मूल्यांकन की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को लेकर चेतावनियां दी गई थीं। कुछ विशेषज्ञों ने प्रणाली को पूर्ण रूप से लागू करने से पहले अधिक व्यापक परीक्षण की सलाह भी दी थी।यह विवाद केवल तकनीकी खामी का नहीं, बल्कि विश्वास का भी है। बोर्ड परीक्षाएं लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित करती हैं। कुछ अंकों का अंतर उच्च शिक्षा और करियर के अवसरों को बदल सकता है। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रक्रिया पर संदेह पैदा होता है तो उसका प्रभाव केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर पड़ता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन का सहारा लिया है।हालांकि यह भी सच है कि डिजिटल मूल्यांकन कोई नई अवधारणा नहीं है। दुनिया के अनेक परीक्षा बोर्ड और संस्थान वर्षों से ऐसी प्रणालियों का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं। समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन में दिखाई देती है। यदि स्कैनिंग, डेटा सुरक्षा, परीक्षकों के प्रशिक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण पर पर्याप्त ध्यान न दिया जाए तो तकनीक समाधान के बजाय नई समस्याएं पैदा कर सकती है।केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने भी कुछ विसंगतियों को स्वीकार करते हुए सुधारात्मक कदम उठाने का आश्वासन दिया है। यह स्वागतयोग्य है, किंतु केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा।

आवश्यकता इस बात की है कि पूरे विवाद की स्वतंत्र और पारदर्शी समीक्षा हो, तकनीकी कमियों की सार्वजनिक जानकारी दी जाए तथा प्रभावित विद्यार्थियों को शीघ्र और निष्पक्ष राहत प्रदान की जाए।शिक्षा में डिजिटल परिवर्तन को रोका नहीं जा सकता और न ही रोका जाना चाहिए। परंतु किसी भी सुधार की सफलता उसकी विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीक का उद्देश्य केवल प्रक्रिया को तेज करना नहीं, बल्कि विश्वास को मजबूत करना भी होना चाहिए। यदि पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित किए जाएं तो भविष्य की दिशा बन सकता है; अन्यथा यह एक ऐसे प्रयोग के रूप में याद किया जाएगा जिसने विद्यार्थियों के मन में परीक्षा व्यवस्था को लेकर अनावश्यक शंकाएं पैदा कर दीं।

ब्लैकलिस्टिंग शर्त हटाना—पारदर्शिता पर उठते सवाल
सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग परियोजना के टेंडर से विक्रेता को ब्लैकलिस्ट करने संबंधी शर्त हटाए जाने का मामला स्वाभाविक रूप से चर्चा और सवालों का विषय बना है। अब तक सीबीएसई ने सार्वजनिक रूप से इस बदलाव का स्पष्ट और विस्तृत कारण नहीं बताया है। ऐसे में यह केवल एक प्रशासनिक संशोधन नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा बन जाता है। किसी भी सार्वजनिक संस्था के टेंडर नियमों का उद्देश्य केवल सेवा प्रदाता चुनना नहीं होता, बल्कि निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, गुणवत्ता और सार्वजनिक धन की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होता है। ब्लैकलिस्टिंग का प्रावधान आमतौर पर उन कंपनियों के विरुद्ध एक निवारक उपाय माना जाता है जो अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करती हैं या जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहता। इसलिए यदि ऐसी शर्त हटाई जाती है, तो उसके पीछे की प्रशासनिक और कानूनी तर्कसंगतता स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए।यह भी संभव है कि सीबीएसई ने किसी कानूनी सलाह, नीति परिवर्तन या प्रक्रियागत सुधार के आधार पर यह निर्णय लिया हो। कई बार संस्थाएं ब्लैकलिस्टिंग के बजाय प्रदर्शन गारंटी, वित्तीय दंड या अन्य अनुबंधीय उपायों को अधिक प्रभावी मानती हैं। लेकिन जब तक आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक नहीं होता, तब तक अटकलों और संदेहों को बल मिलता रहेगा।शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में, जहां लाखों विद्यार्थियों के परिणाम और मूल्यांकन प्रक्रिया दांव पर होती है, वहां तकनीकी परियोजनाओं से जुड़े निर्णयों में अधिकतम पारदर्शिता अपेक्षित है। ष्टक्चस्श्व के लिए यह अवसर है कि वह इस बदलाव के पीछे के कारणों को सार्वजनिक करे और यह स्पष्ट करे कि गुणवत्ता, जवाबदेही तथा निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कौन-से वैकल्पिक सुरक्षा उपाय अपनाए गए हैं। प्रश्न केवल एक टेंडर शर्त का नहीं है, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों में विश्वास बनाए रखने का है। स्पष्ट संवाद और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया ही ऐसे मामलों में भरोसे को मजबूत कर सकती है।