प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
जब कागजों की मंजूरियाँ और बंद लिफाफे सच को ढकने लगते हैं, तब आग केवल इमारतों तक सीमित नहीं रहती, वह व्यवस्था की आत्मा को भी झुलसा देती है। लखनऊ के अलीगंज की घटना किसी एक दिन की दुर्घटना नहीं, बल्कि उस लंबी लापरवाही का विस्फोट थी जिसमें सुरक्षा को हमेशा बाद में टाल दिया गया। इसी पृष्ठभूमि में एक तीखा सवाल उभरता है—जो अब फुसफुसाहट नहीं, बल्कि कठोर सामाजिक आरोप बन चुका है। यह सिर्फ एक घटना का वर्णन नहीं, बल्कि उस ढांचे का दर्पण है जहाँ शिक्षा धीरे-धीरे जोखिम और लाभ के बीच झूलता हुआ बाजार बन गई है।
22 जून 2026 की दोपहर ने लखनऊ के अलीगंज की एक साधारण सी इमारत को मौत के मंजर में बदल दिया। नीचे पेट शॉप और क्लिनिक की रोजमर्रा की हलचल थी, जबकि ऊपर कोचिंग सेंटर में भविष्य संवारने के सपने बुने जा रहे थे। लेकिन कुछ ही पलों में वह इमारत धुएं और आग के भयानक जाल में कैद हो गई। छात्र जान बचाने के लिए भागे, खिड़कियों तक पहुंचे, कुछ ने मजबूरी में छलांग लगाई, पर अधिकांश घने धुएं की दीवार में फंस गए। चीखें धीरे-धीरे खामोशी में घुल गईं। कम से कम 15 युवा जीवन, जो अभी सपनों को पूरी तरह समझ भी नहीं पाए थे, “लखनऊ आग में 15 जवान सपनों की राख” बनकर हमेशा के लिए मिट गए।
यह हादसा किसी अचानक तकनीकी खराबी का नतीजा भर नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था की उपज था जिसने वर्षों तक चेतावनियों को अनसुना किया। जिस भवन में कोचिंग संचालित हो रही थी, उसे 2016 में अवैध निर्माण पर एलडीए द्वारा ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी हुआ था, जिसे दो महीने बाद वापस ले लिया गया था। फायर एनओसी मौजूद नहीं था, और आपातकालीन निकास या तो बंद पड़े थे या केवल औपचारिकता बनकर रह गए थे। खिड़कियों पर लगी लोहे की जालियाँ/ग्रिल्स बाहर निकलने में बाधक बनीं। प्रारंभिक रिपोर्ट्स के अनुसार एसी में संभावित शॉर्ट सर्किट सिर्फ एक चिंगारी थी, असली आग तो उस लापरवाही में थी जो वर्षों से सुलग रही थी। नीचे व्यापार की रफ्तार जारी थी और ऊपर जीवन दम तोड़ रहा था।
जैसे-जैसे हादसे की परतें खुलती गईं, वही पुराना और असहज करने वाला सवाल फिर सामने खड़ा हो गया—आखिर यह सब हुआ कैसे? अनुमति किसने दी, निरीक्षण किसने किया, और किसने जानबूझकर नजरें फेर लीं? यह केवल प्रशासनिक लापरवाही भर नहीं दिखती, बल्कि एक ऐसे तंत्र की ओर इशारा करती है जहाँ नियमों की कीमत तय होती है और सुरक्षा सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाती है। यह पैटर्न नया नहीं है। कोटा की आत्महत्याएँ, दिल्ली के राजेंद्र नगर की बेसमेंट बाढ़ और अब लखनऊ की यह अग्निकांड—हर जगह कहानी एक ही जैसी दिखती है: भीड़ बढ़ाओ, मुनाफा कमाओ और सुरक्षा को बाद के लिए छोड़ दो।
आज के दौर में छात्र केवल सीखने वाला नहीं रह गया, बल्कि एक चलती-फिरती आर्थिक इकाई में बदल चुका है। माता-पिता कर्ज के बोझ तले फीस चुकाते हैं, अपनी उम्मीदें गिरवी रखकर बच्चों का भविष्य “खरीदने” की कोशिश करते हैं। कोचिंग उद्योग इस मानसिक दबाव को बखूबी समझता है, इसलिए उसकी संरचना भी उसी अनुरूप गढ़ी जाती है—ऊंची दीवारें, नियंत्रित प्रवेश और अक्सर बंद पड़े आपात निकास। यही वह व्यवस्था है जिसने शिक्षा को धीरे-धीरे ऐसे तंत्र में बदल दिया है, जहाँ जीवन से अधिक महत्व उपस्थिति और फीस को मिलने लगता है।
हादसे के बाद प्रशासनिक प्रतिक्रिया भी उसी पुराने, परिचित ढर्रे पर आगे बढ़ी। जांच के आदेश जारी हुए, शोक संदेश दिए गए, मुआवजे की घोषणाएँ हुईं, कुछ गिरफ्तारियाँ और निलंबन भी हुए—जैसा हर बार होता आया है। मुख्यमंत्री स्तर से कार्रवाई के निर्देश आए, प्रधानमंत्री ने संवेदना व्यक्त की, लेकिन यह संवेदना भी कुछ ही समय में औपचारिकता बनकर रह गई। असली प्रश्न फिर भी अनुत्तरित रहे—क्या यह अंतिम हादसा होगा, या अगली त्रासदी की नींव पहले से ही रखी जा रही है? क्योंकि हर दुर्घटना के बाद यही चक्र दोहराया जाता है और समय के साथ समाज उसे भुला देने की आदत डाल लेता है।
अब प्रश्न व्यवस्था की कार्यप्रणाली नहीं, उसकी नींव की ईमानदारी पर है। कोचिंग सेंटरों को “शिक्षा का मंदिर” नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से व्यावसायिक इकाई मानकर सख्त नियंत्रण में लाना होगा। हर भवन का फायर ऑडिट और संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाणपत्र अनिवार्य होना चाहिए। बेसमेंट में कक्षाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगे। खिड़कियों पर लगी ग्रिलें रोकने का माध्यम बनने पर दंडनीय अपराध हों, और किसी भी मौत की स्थिति में प्रबंधन पर सीधे आपराधिक हत्या का मुकदमा चले। साथ ही एक स्वतंत्र “नेशनल कोचिंग सेफ्टी अथॉरिटी” बनाई जाए, जो राजनीतिक दबाव से मुक्त हो।
सुधार की सीमा केवल कोचिंग संस्थानों तक नहीं हो सकती। समस्या उस व्यापक शिक्षा ढांचे में छिपी है, जो छात्रों पर एकतरफा दबाव डालकर सफलता का सीमित रास्ता दिखाता है। जब सफलता का एकमात्र मानक प्रतियोगी परीक्षाएँ बन जाती हैं, तो कोचिंग उद्योग स्वतः ही अनियंत्रित बाजार में बदल जाता है। इसलिए स्कूल–कॉलेज स्तर पर सुधार, परीक्षा प्रणाली का संतुलन और मानसिक दबाव में कमी केवल शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले जरूरी कदम हैं।
अगर अब भी यह चेतावनी अनसुनी रही, तो हर शहर किसी न किसी दिन लखनऊ की ही पुनरावृत्ति बन जाएगा। हर इमारत किसी अंधेरी रात में “लखनऊ आग में 15 जवान सपनों की राख” जैसी दर्दनाक कहानी दर्ज करती रहेगी। हम तब भी सिर्फ खबरें पढ़ेंगे, जांचें देखेंगे और अगले हादसे के आने का इंतजार करते रहेंगे। लेकिन उस समय शायद सवाल पूछने वाला कोई नहीं बचेगा—क्योंकि तब तक सपने, उम्मीदें और जीवन, सब कुछ पहले ही राख में बदल चुका होगा, और व्यवस्था केवल पछतावे के पन्ने पलटती रह जाएगी।





