असली पीड़ितों को कटघरे में लाते फर्जी आरोप

Spurious allegations putting genuine victims in the dock

डॉ. मोनिका शर्मा

हाल में टीवी कलाकार शिल्पा शिंदे ने पॉडकास्ट में स्वीकारा कि प्रोड्यूसर पर उनके द्वारा किया गया सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस झूठा था | शिल्पा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘मैं थोड़ी हूं साइको टाइप हूँ | उस समय मेरी सटक गई थी | मैंने अपने प्रोड्यूसर के खिलाफ सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस इसलिए दर्ज कराया था, क्योंकि मेरे पास कोई विकल्प था ही नहीं। जब यह केस किया उसके बाद समझौता हुआ और मैं उस स्थिति से बाहर निकल पाई।’ सोशल मीडिया से लेकर आमजन तक चर्चा विषय बनी यह स्वीकार्यता कई प्रश्न उठाती है | इतना ही नहीं ये बातें कामकाजी संसार में सेक्सुअल हैरेसमेंट की शिकार हुईं या हो रहीं महिलाओं की सच्ची शिकायतों को भी शंका के घेरे में लाने वाली हैं |

चिंतनीय है कि आज भी कामकाजी महिलाओं के लिए हालात सहज नहीं हैं | शारीरिक-मौखिक उत्पीड़न की असलियत सामने आने वाले आंकड़ों से कहीं अधिक दुखदायी है | बहुत सी महिलाएँ तो इस मामले में चुप्पी चुन लेती हैं | ऑक्सफेम इंडिया की ओर से करवाये गये एक सर्वे के मुताबिक भारत में 17 फीसदी महिलाएं वर्कप्लेस पर यौन शोषण का शिकार होती हैं। कुछ समय पहले सोशल नेटवर्किंग साइट लिंक्डइन द्वारा करवाऐ गये सर्वेक्षण के नतीजों में भी तीन भारतीय महिलाओं में से एक ने कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव की बात स्वीकारी थी | वहीं अहमदाबाद के वीमेंस एक्शन ग्रुप द्वारा करवाए गए सर्वे में तो 48 फीसदी महिलाओं ने यह माना था कि कार्यस्थल पर वे मौखिक, मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार बनती हैं। ये आंकड़े इसलिए भी विचारणीय हैं क्योंकि आमतौर पर इस तरह के शोषण को झेलने वाली अधिकतर महिलाएं दुर्व्यवहार की रिपोर्ट तक दर्ज़ नहीं करवातीं । कभी नौकरी छिन जाने और कभी सामाजिक मान्यताओं के डर से कोई कदम नहीं उठा पातीं।

ऐसे में झूठा केस करने का यह उदाहरण आम स्त्रियों की मुसीबत बढ़ाने वाला वाकया है | असल में कामकाजी दुनिया में महिलाओं का उत्पीड़न कई परतों में छुपा होता है | इसमें शारीरिक ही नहीं भावनात्मक उत्पीड़न भी शामिल है | उपहास करना, डराना, कमतर आंकना जैसी बातें मन को पीड़ा पहुंचाती हैं | वहीं अवांछित शारीरिक संपर्क, धक्का-मुक्की, हिंसक बर्ताव आदि शारीरिक हैरेसमेंट के तहत आता है | कुलमिलाकर उनके लिए असहज माहौल बनाना एक तरह से प्रताड़ित करना ही है | जाने कितनी महिलाएं इस असहजता को हर दिन जीती-झेलती हैं | ऐसे में एक टीवी अभिनेत्री का केस करने एक बरसों बाद किया गया यह खुलासा बहुत स्त्रियों की पीड़ा को शक के घेरे में लाने वाला है | यही वजह है कि झूठे सेक्शुअल हैरेसमेंट वाले इस कबूलनामे के बाद पुरुषों पर लगाये जाने वाले फर्जी मामलों को लेकर भी नई बहस छिड़ गई है |

स्त्री हो या पुरुष, किसी की छवि बिगाड़ने का यह खेल वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है | पुरुषों के लिए भी झूठे आरोप कम पीड़ादायी नहीं होते | फर्जी केस उनका करियर और प्रतिष्ठा भी बर्बाद करते हैं | परिवार बिखर जाते हैं | इतना ही नहीं यह न्याय व्यवस्था का भी दुरुपयोग ही हैं। बावजूद इसके हमारे यहाँ आज भी ऐसे फर्जी मामलों के चलते पुरुषों के मन और मान पहुँचती ठेस को लेकर कम ही सोचा जाता है | परंपरागत सोच वाले हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में यह माना जाता है कि कोई लड़की या महिला यौन उत्पीड़न का झूठा आरोप नहीं लगाएगी | जबकि किसी महिला द्वारा लगाए गए उत्पीड़न ने झूठे मामलों के चलते पुरुषों द्वारा आत्मह्त्या करने की घटनाएँ भी सामने आ चुकी हैं |

हालिया बरसों में कार्यस्थल से लेकर आम परिवेश तक, ऐसे फर्जी केस सामने आने लगे हैं | यही वजह है कि यौन उत्पीड़न के झूठे मामलों को लेकर न्यायालय ने भी सख्त रुख अपनाया है। अदालतों ने कई बार स्पष्ट किया है कि ऐसे फर्जी मामले न्याय व्यवस्था का समय बर्बाद करते हैं | साथ ही इनके चलते असली पीड़ितों के मामले भी कमजोर होते हैं। शिल्पा शिंदे के इस मामले में ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन ने एक बयान जारी कर इस बर्ताव की निंदा की है | साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के मामले में हस्तक्षेप करने और सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया है ।देखने में आ रहा है कि जनमानस में अब कानून जेंडर-न्यूट्रल कानून को लेकर भी मांग उठने लगी है | ध्यातव्य है कि जेंडर न्यूट्रल कानूनों के तहत वे कानूनी प्रावधान आते हैं, जो लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते | इन कानूनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर, कानून की नजर में सब समान हों | अपराध का लिंग से कोई लेना-देना न हो |

दरअसल, हमारे देश में बलात्कार, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, और कार्यस्थल पर हिंसा या शोषण से संबंधित अधिकतर कानून महिला-केंद्रित हैं। इसका कारण यह है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाएँ हमेशा दोयम दर्जे पर रही हैं | लैंगिक विभेद हमारे परिवेश का हिस्सा रहा है और कुछ हद तक आज भी है | स्त्री जीवन से जुड़ी इन स्थितियों के चलते महिलाओं को विशेष सुरक्षा देने के लिए ऐसे कानून बनाए गए थे | दुखद है कि कुछ महिलाओं ने इन क़ानूनों को हथियार बना लिया है | दुर्भाव की इस प्रवृत्ति से समग्र समाज से भरोसे का भाव रीत रहा है |