डॉ विजय गर्ग
शिक्षा को हमेशा समाज की सबसे बड़ी ताकत माना गया है। स्कूल और कॉलेज ज्ञान के मंदिर कहे जाते थे, जहां बच्चों के सपनों को आकार मिलता था और उनके भविष्य की नींव रखी जाती थी। लेकिन आज शिक्षा धीरे-धीरे सेवा से अधिक व्यापार बनती जा रही है। महंगे निजी स्कूल, बढ़ती फीस, कोचिंग संस्थानों का विस्तार और शिक्षा के नाम पर दिखावा—इन सबने शिक्षा को एक बड़े उद्योग में बदल दिया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि गरीब और मध्यम वर्ग के माता-पिता आखिर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कहां जाएं?
आज एक सामान्य परिवार के लिए बच्चों की शिक्षा सबसे बड़ा आर्थिक बोझ बन चुकी है। स्कूलों की फीस हर साल बढ़ती जा रही है। प्रवेश शुल्क, वार्षिक शुल्क, परिवहन शुल्क, स्मार्ट क्लास शुल्क, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य गतिविधियों का खर्च मिलाकर शिक्षा आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। कई माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी जरूरतों में कटौती करते हैं। कुछ लोग कर्ज लेते हैं, तो कुछ अपनी बचत खत्म कर देते हैं। फिर भी उनके मन में यह डर बना रहता है कि यदि बच्चे को महंगे स्कूल में नहीं पढ़ाया गया, तो उसका भविष्य कमजोर हो जाएगा।
निजी स्कूलों और कॉलेजों के बीच प्रतिस्पर्धा अब शिक्षा से अधिक व्यवसायिक हो गई है। बड़े-बड़े भवन, वातानुकूलित कक्षाएं, चमकदार विज्ञापन और विदेशी पाठ्यक्रमों का आकर्षण माता-पिता को प्रभावित करता है। स्कूल अपने परिणामों और सुविधाओं को ऐसे प्रस्तुत करते हैं जैसे वे कोई कॉर्पोरेट कंपनी हों। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या केवल महंगी इमारतें और अंग्रेजी बोलना ही अच्छी शिक्षा का प्रमाण हैं? वास्तविक शिक्षा वह है जो बच्चों में सोचने की क्षमता, नैतिक मूल्य, संवेदनशीलता और आत्मविश्वास विकसित करे।
सरकारी स्कूलों की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। कई जगहों पर शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत सुविधाएं और संसाधनों की अनुपलब्धता के कारण लोग सरकारी स्कूलों पर भरोसा खोते जा रहे हैं। हालांकि अनेक सरकारी स्कूल उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, फिर भी समाज में यह धारणा बन गई है कि अच्छी शिक्षा केवल निजी स्कूलों में ही मिल सकती है। यही सोच शिक्षा के व्यापारीकरण को और बढ़ावा देती है।
कोचिंग और ट्यूशन संस्कृति ने भी शिक्षा को महंगा बना दिया है। बच्चे स्कूल के बाद घंटों कोचिंग संस्थानों में बिताते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी अब एक अलग उद्योग बन चुकी है। गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार इस अतिरिक्त खर्च को वहन करने में कठिनाई महसूस करते हैं। दूसरी ओर, बच्चों पर अंक और रैंक लाने का मानसिक दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
इस व्यवस्था में सबसे अधिक संघर्ष मध्यम वर्ग करता है। अमीर वर्ग आसानी से महंगी शिक्षा खरीद सकता है और गरीब वर्ग को कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ मिल जाता है, लेकिन मध्यम वर्ग अक्सर दोनों के बीच फंस जाता है। उनकी आय इतनी नहीं होती कि वे बिना चिंता के भारी फीस भर सकें, और न ही उन्हें पर्याप्त सहायता मिलती है। वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए चुपचाप संघर्ष करते रहते हैं।
यदि शिक्षा केवल पैसे वालों तक सीमित हो जाए, तो समाज में असमानता और बढ़ेगी। शिक्षा का उद्देश्य समाज में समान अवसर प्रदान करना और लोगों को सशक्त बनाना है। इसलिए सरकारों को चाहिए कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारी जाए, फीस नियंत्रण के लिए प्रभावी नीतियां बनाई जाएं और हर बच्चे के लिए सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जाए।
शिक्षा को व्यापार नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि बेहतर समाज और मजबूत राष्ट्र निर्माण का आधार है। यदि शिक्षा पूरी तरह बाजार की वस्तु बन गई, तो गरीब और मध्यम वर्ग के लाखों बच्चों के सपने अधूरे रह जाएंगे।
किसी देश की असली प्रगति उसके महंगे स्कूलों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां हर बच्चे को समान और सम्मानजनक शिक्षा मिल रही है या नहीं। इसलिए समय की मांग है कि शिक्षा को फिर से मानवीय मूल्यों और सामाजिक न्याय से जोड़ा जाए, ताकि हर बच्चा बिना आर्थिक बोझ के अपने सपनों को पूरा कर सके।





