रामराज्य की अवधारणा आज भी प्रासंगिकः प्रो. उपेन्द्र

The concept of Ram Rajya remains relevant today: Prof. Upendra

रविवार दिल्ली नेटवर्क

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के भारतीय ज्ञान परम्परा- आईकेएस केंद्र के तत्वावधान में त्रेता युगः धर्माधारित शिक्षा एवम् ऋषि आश्रमों का उदय पर ऑनलाइन 14वीं राष्ट्रीय कॉन्क्लेव

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के सेंटर फॉर वैदिक साइंस में विभागाध्यक्ष एवम् संस्थापक-समन्वयक प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी ने कहा, वेद, उपनिषद, वेदांग, उपवेद, पुराण एवम् षड्दर्शन में निहित ज्ञान परम्परा ही भारतीय शिक्षा का मूल आधार हैं। उन्होंने तक्षशिला और पुष्कलावती जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों, प्रश्नोपनिषद, शिक्षावल्ली, स्वाध्याय, श्रवण-मनन, गुरु-शिष्य परम्परा की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, रामराज्य की अवधारणा और नैतिक शिक्षा का महत्व समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए आज भी प्रासंगिक है। प्रो. त्रिपाठी तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के भारतीय ज्ञान परम्परा- आईकेएस केंद्र के तत्वावधान में त्रेता युगः धर्माधारित शिक्षा एवम् ऋषि आश्रमों का उदय पर ऑनलाइन आयोजित 14वीं राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। इससे पूर्व मां सरस्वती की वंदना के संग राष्ट्रीय कॉन्क्लेव का शंखनाद हुआ। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में कला संकाय- शिक्षा विभाग के प्रो. पतंजलि मिश्रा ने बतौर विशिष्ट वक्ता कहा, भारतीय आश्रम केवल निवास की व्यवस्था नहीं, बल्कि अनुशासन, सेवा, आत्मसंयम, कर्मयोग और मोक्ष प्राप्ति की जीवन-पद्धति है।

प्रो. मिश्रा ने छांदोग्य उपनिषद के सत्यकाम जाबाल, विदुर नीति, गार्गी एवम् मैत्रेयी के दार्शनिक संवादों के संग-संग सा विद्या या विमुक्तये की अवधारणा के जरिए भारतीय शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, व्यक्ति का मूल्य उसके ज्ञान, चरित्र और व्यवहार से निर्धारित होता है, न कि उसके पद और संपत्ति से। टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन ने वेब ऑफ साइंस एवम् स्कोपस सरीखी प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित शोधपत्रों, पुस्तकों, पेटेंट और अनुसंधान परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा, भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक शोध का समन्वय ही भविष्य की शिक्षा का आधार बनेगा। टीएमयू के आईकेएस केंद्र की कोर्डिनेटर डॉ. अलका अग्रवाल ने सभी का स्वागत करते हुए कहा, त्रेता युग की शिक्षा व्यवस्था केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन, कर्तव्यबोध और धर्ममय जीवन मूल्यों का विकास करना था। कार्यक्रम में डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन, लॉ कॉलेज के डीन प्रो. हरबंश दीक्षित, लॉ कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुशील कुमार आदि मौजूद रहे। राष्ट्रगान के संग कॉन्क्लेव का समापन हुआ।