भगवान शांतिनाथ के अद्वितीय संदेश प्रकाश स्तंभ

The unique message of Lord Shantinath, the beacon of light

जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान श्री 1008 शांतिनाथ
जी के जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व पर विशेष

प्रो. रवि जैन/ डॉ. अर्चना जैन

नमः श्री शन्तिनाथाय, जगच्छान्तिविधायिने । कृत्स्नकर्मोंघशान्ताय शान्तये सर्वकर्मणाम्
जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान श्री 1008 शांतिनाथ जी का जीवन मानवता के लिए शांति, करुणा और आत्मसंयम का अद्वितीय संदेश देता है। उनका नाम ही शांतिनाथ इस बात का प्रतीक है, उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से संसार को आंतरिक शांति का मार्ग दिखाया। जैन धर्म के अनुसार श्री शांतिनाथ भगवान सोलहवें तीर्थंकर और पंचम चक्रवर्ती के साथ-साथ कामदेव पद के भी धारक थे।भगवान शांतिनाथ का जीव जब सर्वार्थ सिद्धि से माता एरा देवी के गर्भ में आया तो स्वर्ग के देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया। नौ महीने व्यतीत हो जाने के बाद हस्तिनापुर के राजा श्री विश्व सेन और रानी श्रीमती एरा देवी के घर ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन प्रातः काल में तीन लोक के नाथ ने जन्म लिया। भगवान शांतिनाथ जी का जन्म हस्तिनापुर में इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। देवों ने सुमेरु. पर्वत पर ले जाकर जन्मभिषेक महोत्सव मनाया और उनका नाम शांतिनाथ रखा। शांतिनाथ भगवान की आयु एक लाख वर्ष की थी , शरीर 40 धनुष ऊंचा था और बदन स्वर्ण के समान था और उनका चिन्ह हिरण है। उनके पिता महाराज विश्वसेन एक प्रतापी और न्यायप्रिय शासक थे,जबकि माता एरा देवी अत्यंत धर्मनिष्ठ और आदर्श नारी थीं। भगवान की यौवन अवस्था आने पर उनके पिता ने अनेक कन्याओं के साथ उनका विवाह कर ।दिया। इस तरह भगवान के कुमार काल के पच्चीस हजार वर्ष व्यतीत हो गए तब महाराज विश्व सेन ने अपना राज्य सौंप कर भोगों से विरक्ति ले ली। जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष और व्यतीत हो गए, तब उनकी आयुधशाला में चक्रवर्ती के वैभव को प्रकट करने वाला चक्र रत्न उत्पन्न हो गया। चक्र रत्न आदि को लेकर भगवान दिग्विजय के लिए निकल गए और विधिवत्त दिग्विजय करके इस भरत क्षेत्र में एक छत्र शासन किया। चक्रवर्ती की छियानवे हजार रानियां थीं और चक्रवर्ती के वैभव से परिपूर्ण थीं। जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष साम्राज्य पद में व्यतीत हो गए तब एक समय स्वयं को दर्पण में देखते हुए उन्हें अपने पूर्व जन्म का स्मरण हो गया तब भगवान शरीर संसार और भोगों के स्वरूप का विचार करते हुए विरक्त हो गए। शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव हुआ, भौतिक सुख क्षणिक हैं और वास्तविक आनंद आत्मा की शुद्धि में है। इस अनुभूति ने उन्हें संसार के मोह-माया से दूर होकर दीक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कठोर ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मज्ञान की दिशा में प्रगति की। वैराग्य होने पर लौकान्तिक देवों ने आकर उनकी पूजा स्तुति की और उस समय इंद्र भी उपस्थित हो गए।

भगवान ने अपने नारायण नामक पुत्र का राज्याभिषेक करके राज्य सौंप दिया। इंद्र ने दीक्षाभिषेक करके सरवर सिद्धि नाम की पालकी में विराजमान कर मनुष्य और देव हस्तिनापुर के बाहर वन में ले गए । ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को नियम लेकर भगवान ने पंचमुखी केश लोच. करके नम: सिद्ध कहते हुए जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली और संपूर्ण परिग्रह का त्याग करके ध्यान में स्थिर हो गए। भगवान को तीन ज्ञान तो जन्म से ही थे, दीक्षा ग्रहण करते ही चौथ ज्ञान मनःपर्यय भी प्राप्त हो गया। दीर्घकालीन तपस्या के पश्चात उन्हें केवलज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई। फिर पौष शुक्ल दशमी के दिन 13वें गुणस्थान में पहुंचकर केवल ज्ञान से विभूषित हो गए । तुरंत ही इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने समोसरण की रचना कर दी। भगवान के समोसरण में छत्तीस गणधर थे ,इस प्रकार भगवान ने बहुत कiल तक समस्त जीवों के कल्याण के लिए धर्मोपदेश देना प्रारंभ किया। उन्होंने स्पष्ट किया, मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना क्रोध, लोभ और अहंकार है। इन पर विजय प्राप्त कर ही व्यक्ति सच्ची शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है। जब भगवान की आयु एक माह शेष रह गई तब सम्मेद शिखर आए और अपनी साधना पूर्ण की और चारों अघातिया कर्मों का नाश करके ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन लोक के अग्रभाग पर जाकर विराजमान हो गए यानी मोक्ष को प्राप्त किया। उत्तर पुराण में कहते हैं, संसार में श्री शांतिनाथ जिनेंद्र को छोड़कर अन्य तीर्थंकरों में ऐसा कौन है ,जिसने पूर्व प्रत्येक भव में बहुत भारी धर्म वृद्धि प्राप्त की हो अर्थात कोई नहीं,इसीलिए सबका भला करने वाले श्री शांतिनाथ भगवान का निरंतर ध्यान करना सभी को सदैव शांति एवं शक्ति प्रदान करता है। कहते हैं, भगवान शांतिनाथ भगवान के बाद कभी भी धर्म का विच्छेद नहीं हुआ। जैन धर्म निरंतर चलता रहा, इसीलिए सभी मंदिरों में अभिषेक के बाद शांति धारा करने का प्रचलन है।

हस्तिनापुर में श्री शांतिनाथ भगवान के चार कल्याणक हुए गर्भ, जन्म, तप: और केवल ज्ञान। अनेक तीर्थ श्री शांतिनाथ भगवान के अतिशय के लिए प्रसिद्ध है जैसे कि नागपुर के पास श्री रामटेक जी , हस्तिनापुर कल्याणक क्षेत्र, आहार जी अतिशय क्षेत्र आदि। भगवान शांतिनाथ जी ने अपने जीवन से यह भी सिखाया कि शांति केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं आती, बल्कि यह हमारे भीतर से उत्पन्न होती है। यदि मन शांत है, तो विपरीत परिस्थितियाँ भी हमें विचलित नहीं कर सकतीं। उनके उपदेशों में सहिष्णुता, करुणा और सभी जीवों के प्रति समान दृष्टि रखने की प्रेरणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आज के युग में, जहाँ प्रतिस्पर्धा, भौतिकवाद और स्वार्थ बढ़ता जा रहा है, भगवान शांतिनाथ जी का संदेश एक प्रकाश स्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। यदि समाज उनके सिद्धांतों—विशेषकर अहिंसा और अपरिग्रह को अपनाए, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन आएगा, बल्कि सामाजिक और वैश्विक स्तर पर भी शांति स्थापित हो सकती है। पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में भी उनके विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जैन दर्शन में प्रत्येक जीव चाहे, वह सूक्ष्म हो या स्थूल का सम्मान किया जाता है। यह दृष्टिकोण आज की पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान में भी सहायक हो सकता है। अंततः, भगवान श्री 1008 शांतिनाथ जी का जीवन हमें यह सिखाता है, सच्ची सफलता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति, नैतिक मूल्यों और आंतरिक शांति में निहित है। उनका संदेश केवल एक धर्म तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए एक सार्वभौमिक मार्गदर्शन है। यदि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं, तो एक शांत, संतुलित और सद्भावपूर्ण समाज का निर्माण संभव है, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक प्रतिष्ठित तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एवम् कॉलेज और पैरा मेडिकल में सीनियर फैकल्टी और जैन धर्म के विद्वान हैं।)