661 करोड़ का सवाल: जवाबदेही किसकी?

The ₹661 crore question: Who is accountable?

डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा में सामने आए 661 करोड़ रुपये के कथित आईडीएफसी बैंक प्रकरण ने केवल एक वित्तीय अनियमितता के आरोपों को जन्म नहीं दिया है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, वित्तीय अनुशासन, संस्थागत पारदर्शिता और शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है। समाचारों के अनुसार इस मामले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, जांच एजेंसियाँ सक्रिय हैं, कुछ गिरफ्तारियाँ हुई हैं, कुछ अधिकारियों को निलंबित किया गया है तथा कुछ ने न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिकाएँ दायर की हैं। ऐसे में यह प्रकरण केवल किसी बैंक, किसी विभाग या किसी अधिकारी तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक ढाँचे की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोप तब तक केवल आरोप ही माने जाते हैं, जब तक सक्षम न्यायालय उन्हें प्रमाणित न कर दे। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार देता है। इसलिए किसी भी आरोपी को दोषी मान लेना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। दूसरी ओर, यदि सार्वजनिक धन से जुड़ी इतनी बड़ी राशि के संबंध में गंभीर आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतंत्र में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

यह कथित घोटाला इसलिए अधिक गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इसमें सरकारी धन के प्रबंधन पर प्रश्न उठे हैं। सरकारी धन वास्तव में जनता का धन होता है। यह वह राशि है जो नागरिक करों के माध्यम से सरकार को देते हैं ताकि उसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास, सिंचाई, सड़क, रोजगार और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं पर किया जा सके। यदि ऐसे धन के उपयोग या संरक्षण में किसी प्रकार की अनियमितता की आशंका उत्पन्न होती है, तो उसका प्रभाव केवल सरकारी खातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शासन के प्रति जनता के विश्वास पर भी पड़ता है।

समाचारों के अनुसार इस मामले में सरकारी विभागों के बैंक खाते, निजी बैंक में धन जमा कराने की प्रक्रिया, प्रशासनिक स्वीकृतियाँ और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका जैसे अनेक प्रश्न जांच के दायरे में हैं। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि नियमों की अनदेखी हुई, तो जिम्मेदारी तय होना स्वाभाविक होगा। यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं, तब भी यह जानना आवश्यक होगा कि ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनीं जिनसे इतने बड़े स्तर पर संदेह उत्पन्न हुआ। दोनों ही स्थितियों में व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा देश की सर्वोच्च सिविल सेवाओं में मानी जाती है। आईएएस अधिकारी केवल शासन चलाने वाले अधिकारी नहीं होते, बल्कि वे संविधान के मूल्यों के संरक्षक भी माने जाते हैं। जनता उनकी निष्पक्षता, ईमानदारी और निर्णय क्षमता पर विश्वास करती है। इसलिए जब किसी वरिष्ठ अधिकारी का नाम किसी वित्तीय विवाद में सामने आता है, तो उसकी प्रतिध्वनि पूरे प्रशासनिक तंत्र में सुनाई देती है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता इसलिए भी आवश्यक हो जाती है ताकि ईमानदार अधिकारियों की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहे और दोषी व्यक्ति कानून से बच न सके।

यह मामला प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। किसी सरकारी खाते को किसी विशेष बैंक में खोलने या बड़ी राशि जमा कराने का निर्णय क्या केवल एक अधिकारी का होता है? सामान्यतः ऐसे निर्णयों में अनेक स्तरों पर स्वीकृतियाँ, वित्तीय नियम, विभागीय प्रक्रियाएँ और लेखा प्रणाली शामिल होती हैं। यदि इन सभी स्तरों के बावजूद कोई कथित अनियमितता संभव हुई, तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं संस्थागत नियंत्रण कमजोर रहा। इसलिए केवल व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा; पूरी प्रणाली की समीक्षा आवश्यक होगी।

आज भारत डिजिटल शासन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली (PFMS), ई-ऑफिस, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन लेखांकन और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य ही यह है कि वित्तीय अनियमितताओं की संभावना न्यूनतम हो। यदि इतने बड़े स्तर पर कथित गड़बड़ी की आशंका सामने आती है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या उपलब्ध तकनीकी प्रणालियों का सही उपयोग हुआ? क्या समय पर ऑडिट किया गया? क्या किसी ने असामान्य लेन-देन पर ध्यान नहीं दिया? क्या आंतरिक चेतावनी तंत्र प्रभावी नहीं था?

सरकारी विभागों में आंतरिक ऑडिट व्यवस्था का उद्देश्य केवल लेखा परीक्षण करना नहीं होता, बल्कि संभावित जोखिमों की समय रहते पहचान करना भी होता है। यदि करोड़ों रुपये का लेन-देन लंबे समय तक बिना किसी प्रभावी आपत्ति के चलता रहा, तो यह केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत विफलता भी मानी जाएगी। इसलिए इस प्रकरण से सीख लेकर ऑडिट व्यवस्था को अधिक सक्षम और तकनीक आधारित बनाने की आवश्यकता है।

लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जब किसी बड़े मामले की जांच होती है, तब जनता केवल परिणाम नहीं देखती बल्कि पूरी प्रक्रिया पर भी नजर रखती है। जांच निष्पक्ष हो, तथ्यों पर आधारित हो और किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से मुक्त दिखाई दे—यही उसकी सबसे बड़ी विश्वसनीयता है। यदि जांच एजेंसियों पर विश्वास कमजोर होता है, तो न्याय व्यवस्था की साख भी प्रभावित होती है।

मीडिया की भूमिका भी ऐसे मामलों में अत्यंत संवेदनशील होती है। लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व सूचना देना और प्रश्न पूछना है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को न्यायालय से पहले दोषी घोषित करना उचित नहीं है। मीडिया ट्रायल कई बार न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है और समाज में पूर्वाग्रह उत्पन्न करता है। इसलिए समाचारों की प्रस्तुति तथ्यों और जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए।

इस प्रकरण ने सरकारी बैंकिंग व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाए हैं। क्या सरकारी विभागों के बैंक खातों के संचालन के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय नीति है? किन परिस्थितियों में सरकारी राशि निजी बैंक में रखी जा सकती है? क्या इसके लिए विशेष अनुमति आवश्यक होती है? क्या संबंधित विभागों ने सभी वित्तीय नियमों का पालन किया? यदि किया, तो वे दस्तावेज सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध होने चाहिए। यदि नहीं किया गया, तो जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है।

प्रशासनिक नैतिकता केवल कानून का पालन करने तक सीमित नहीं होती। नैतिक प्रशासन का अर्थ है कि प्रत्येक निर्णय में सार्वजनिक हित सर्वोपरि रहे। संविधान के प्रति निष्ठा, ईमानदारी, निष्पक्षता और जवाबदेही प्रशासनिक सेवा की आधारशिला हैं। यदि इन मूल्यों से समझौता होता है, तो केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी कमजोर होती है।

इस मामले का एक सकारात्मक पक्ष भी है। यदि इसकी निष्पक्ष जांच होती है और उसके आधार पर संस्थागत सुधार किए जाते हैं, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की संभावना कम की जा सकती है। कई बार बड़े विवाद प्रशासनिक सुधारों का कारण भी बनते हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस मामले को केवल कानूनी विवाद न मानकर एक सुधारात्मक अवसर के रूप में भी देखा जाए।

सरकार को चाहिए कि वह सरकारी खातों के संचालन की नीति को और अधिक पारदर्शी बनाए। सभी बड़े वित्तीय लेन-देन की स्वतः डिजिटल निगरानी हो। स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट की व्यवस्था हो। विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारियाँ स्पष्ट रूप से निर्धारित हों। यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन होता है, तो समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक उत्पीड़न से भी बचाया जाए।

व्हिसलब्लोअर संरक्षण प्रणाली को भी मजबूत करना समय की आवश्यकता है। अनेक बार विभागों के भीतर कार्यरत कर्मचारी अनियमितताओं की जानकारी रखते हैं, लेकिन सुरक्षा के अभाव में सामने नहीं आते। यदि उन्हें कानूनी संरक्षण और गोपनीयता मिले, तो अनेक वित्तीय अनियमितताओं को प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जा सकता है।

भारत आज वैश्विक निवेश का प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन केवल आंतरिक आवश्यकता नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। निवेशक उन देशों पर अधिक विश्वास करते हैं जहाँ कानून का शासन मजबूत हो, सार्वजनिक धन सुरक्षित हो और संस्थाएँ उत्तरदायी हों।

अंततः यह मामला केवल 661 करोड़ रुपये का नहीं है। यह उस विश्वास का प्रश्न है जो जनता शासन व्यवस्था पर करती है। यदि दोषी बच जाते हैं तो व्यवस्था पर प्रश्न उठते हैं, और यदि निर्दोषों को बिना पर्याप्त आधार के दोषी ठहराया जाता है तो न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसलिए इस पूरे प्रकरण में संतुलन, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा का पालन सबसे अधिक आवश्यक है।

लोकतंत्र की असली शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। यह विश्वास पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय से ही अर्जित होता है। इसलिए आवश्यक है कि इस प्रकरण की जांच पूरी निष्पक्षता के साथ हो, दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के अनुसार दंड मिले और यदि कोई निर्दोष है तो उसकी प्रतिष्ठा भी पूर्ण रूप से बहाल हो। यही सुशासन की पहचान है और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी भी। तभी 661 करोड़ रुपये का यह चर्चित प्रकरण केवल एक विवाद बनकर नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक सुधार और बेहतर शासन व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण सबक सिद्ध होगा।