रामलला के पैसे की चोरीः आस्था पर घात, डगमगाया विश्वास

Theft of Ram Lalla's funds: A blow to faith, trust shaken

अजय कुमार

अयोध्या में प्रभु श्री रामलला के भव्य मंदिर से दान पात्र में चोरी की घटना ने एक साथ कई मोर्चों पर हलचल मचा दी है। करोड़ों रामभक्तों की आस्था को इस घटना ने गहरी ठेस पहुँचाई है तो उनका यह विश्वास भी टूट गया कि रामलला के मंदिर में ऐसा कुछ कभी हो ही नहीं सकता है, लेकिन इससे भी बड़ी चोट तब लगी, जब इस धार्मिक मसले को राजनीति की चाशनी में लपेटकर परोसा जाने लगा। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लपक लिया और भारतीय जनता पार्टी की हिन्दूवादी राजनीति पर निशाना साधने में ज़रा भी देर नहीं की। यह सवाल अपनी जगह वाजिब है कि जिस मंदिर के दर्शन के लिये अखिलेश यादव आज तक नहीं गये, उस मंदिर के दान पात्र से हुई चोरी पर उनकी तड़प और चिंता कितनी वास्तविक है और कितनी दिखावटी। जो नेता रामलला के दर्शन से परहेज़ करते रहे, वे अचानक मंदिर की सुरक्षा और प्रबंधन के पहरेदार बन बैठे हैं। इसमें सच्चाई कम, सियासी गणित ज़्यादा दिखता है। सपा की इस सियासत से हुए नुकसान की भरपाई करने के लिये 19 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या रामलला के मंदिर पहुँच रहे हैं, जहाँ वह पूरे घटनाक्रम को बारीकी से समझेंगे।

उधर, अखिलेश यादव की मंशा साफ है। वे भाजपा की हिन्दुत्व की छवि को खंड-खंड करना चाहते हैं। भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया था। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं, बल्कि भाजपा की राजनीतिक पहचान का आधार-स्तंभ है। जब उसी मंदिर में चोरी होती है, तो यह भाजपा के लिये केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उसकी हिन्दुत्व की साख पर सीधा प्रहार बन जाता है। अखिलेश यादव इस कमजोर कड़ी को पकड़कर हिन्दू मतदाताओं के मन में यह संदेश डालना चाहते हैं कि भाजपा का हिन्दुत्व केवल चुनावी नारा है, व्यवहार में नहीं। इसके पीछे एक और सोचा-समझा राजनीतिक लक्ष्य है। उत्तर प्रदेश में हिन्दू मतदाता कभी एकजुट नहीं रहे। उच्च जातियों, पिछड़े वर्गों और दलितों के बीच की खाई को समाजवादी पार्टी हमेशा अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करती रही है। यदि अखिलेश इस घटना के माध्यम से हिन्दुओं के किसी तबके में यह धारणा बनाने में सफल हो जाते हैं कि भाजपा की सरकार में राम के घर में भी सुरक्षा नहीं, तो यह उनके लिये 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक फायदा होगा।

लेकिन इस पूरे प्रसंग में असली सवाल यह है कि यह नौबत आई क्यों? श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय की भूमिका यहाँ बेहद अहम है। यदि वे इस घटना की जानकारी मिलते ही इसका खुलासा सार्वजनिक रूप से कर देते और पारदर्शिता के साथ कार्रवाई की बात करते, तो विपक्ष के पास आरोप लगाने की गुंजाइश ही नहीं बचती। जो घटना खुद उजागर की जाये, उस पर राजनीति करना कठिन होता है। लेकिन जब घटना को दबाने की कोशिश होती है और बाद में वह बाहर आती है, तो वह कहीं अधिक विस्फोटक बन जाती है। चंपत राय की यह अदूरदर्शिता महँगी पड़ी। इसी चूक ने अखिलेश को एक ऐसा हथियार थमा दिया, जिसे वे बार-बार भाँज सकते हैं। सपा की मंशा को भाँपकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए विशेष जांच दल का गठन किया है। यह कदम ज़रूरी था, लेकिन राजनीतिक नुकसान तो हो चुका था। जब तक जांच का आदेश आया, तब तक यह मुद्दा सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर आग की तरह फैल चुका था। मोदी और योगी दोनों की सरकारें इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में दिखीं, जो आमतौर पर सत्ता पक्ष के लिये ठीक संकेत नहीं माना जाता।

उधर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव की बयानबाज़ी में भी अतिरंजना है। वे ऐसी बातें भी इस घटना से जोड़ रहे हैं, जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में यह स्वाभाविक भी है, लेकिन इससे उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं। जो नेता कभी मंदिर के दर्शन नहीं करते, उनका मंदिर प्रेम अचानक चुनावी मौसम में जागता दिखे, तो जनता उसे पहचानती है। लाख टके का सवाल यह भी है कि यह मुद्दा क्या 2027 तक जीवित रह सकता है? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और राम जन्मभूमि न्यास इसे किस तरह संभालते हैं। यदि जांच में देरी हुई, दोषी पकड़ में नहीं आये, या मंदिर प्रशासन में कोई बड़ी खामी सामने आई, तो अखिलेश इसे ज़िंदा रखने में सफल होंगे। लेकिन यदि शीघ्र कार्रवाई हुई, दोषियों को सजा मिली और मंदिर प्रशासन में सुधार दिखा, तो यह मसला अपने आप ठंडा पड़ जायेगा। राजनीति में वही मुद्दे टिकते हैं, जिन्हें सत्ता पक्ष की लापरवाही ताज़ा रखती है।

लब्बोलुआब यह है कि रामलला का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था का केन्द्र है। इस मंदिर से जुड़ी हर घटना, चाहे वह चोरी हो या कोई और विवाद, स्वाभाविक रूप से राजनीतिक रंग ले लेती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस मंदिर के निर्माण से लाखों लोगों की भावनाएँ जुड़ी हैं, वह अब राजनीतिक शतरंज की बिसात बन रहा है। अखिलेश यादव इस बिसात पर चाल चल रहे हैं और भाजपा खुद की भूलों के कारण मुश्किल स्थिति में है। ऐसे में बड़ी बात यह है कि राम मंदिर प्रबंधन को पारदर्शी और चुस्त-दुरुस्त बनाया जाये। चोरी की घटना से जो सबक मिला है, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिये। मंदिर की सुरक्षा और प्रशासन में खामियाँ न केवल आस्था को आहत करती हैं, बल्कि विरोधियों को राजनीति करने का अवसर भी देती हैं। आस्था की रक्षा और प्रशासन की पारदर्शिता ही वह ढाल है, जो सियासत के तीरों को बेअसर कर सकती है।