क्या ओवेसी उत्तर प्रदेश में पाटिर्यों का समीकरण बिगाडेंगे?

Will Owaisi upset the political equations in Uttar Pradesh?

सौरभ वार्ष्णेय

5 राज्यों के चुनाव के बाद अब उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की चौपाल लगने लगी है। सभी पार्टियां खासकर उत्तर प्रदेश को देश की राजनीति वाला प्रदेश माना जाता है। ऐसे में वोट का ध्रवीकरण न हो ऐसा हो नहीं सकता। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी मुस्लिम वोटों, सामाजिक समीकरणों और विपक्षी एकता की चर्चा होती है, तो असददुदीन ओवेसी का नाम स्वत सामने आ जाता है। 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के बीच ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और बहरेच से चुनावी अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इससे एक बार फिर यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि क्या ओवैसी वास्तव में प्रदेश की राजनीति का समीकरण बिगाड़ सकते हैं या उनका प्रभाव केवल राजनीतिक बहस तक सीमित रहेगा।

ओवैसी स्वयं को मुस्लिम समाज की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका तर्क है कि मुसलमान केवल वोट बैंक बनकर न रहें, बल्कि अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी और नेतृत्व भी विकसित करें। यही कारण है कि उनकी पार्टी उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देती है जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका निभाती है। यह भी सच है कि अब तक उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम कोई बड़ा चुनावी प्रदर्शन नहीं कर सकी है। 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत लगभग 0.43 प्रतिशत रहा और वह एक भी सीट नहीं जीत पाई। लेकिन राजनीति केवल सीट जीतने का खेल नहीं है। कई सीटों पर कुछ हजार वोट भी जीत-हार का अंतर तय कर देते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रोहिलखंड, पूर्वांचल और कुछ शहरी क्षेत्रों में एआईएमआईएम सीमित लेकिन प्रभावी वोट कटौती की क्षमता रखती है।

ओवैसी की सक्रियता से सबसे अधिक चिंता उन दलों को होती है जो मुस्लिम वोटों को अपने पारंपरिक समर्थन आधार के रूप में देखते हैं, विशेषकद्भ अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को। यदि मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी एआईएमआईएम की ओर जाता है, तो कई करीबी मुकाबलों में विपक्षी उम्मीदवारों को नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि ओवैसी को अक्सर वोट-कटर कहकर आलोचना की जाती है। हालाँकि एआईएमआईएम इस आरोप को खारिज करते हुए कहती है कि किसी समुदाय को अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार है और यदि अन्य दलों ने उस समुदाय की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया तो नए विकल्पों का उभरना स्वाभाविक है। बिहार और महाराष्ट्र में एआईएमआईएम ने कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई है तथा स्थानीय निकायों में भी सफलता प्राप्त की है। इससे पार्टी का मनोबल बढ़ा है और वह उत्तर प्रदेश में भी अपने विस्तार की संभावनाएँ तलाश रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना बिहार और महाराष्ट्र से अलग है। यहाँ जातीय समीकरण, क्षेत्रीय नेतृत्व और विशाल चुनावी भूगोल किसी भी नई पार्टी के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसलिए एआईएमआईएम के लिए राज्यव्यापी प्रभाव स्थापित करना आसान नहीं होगा।

ओवैसी फिलहाल उत्तर प्रदेश की सत्ता का सीधा विकल्प नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना भी राजनीतिक भूल होगी।एआईएमआईएम शायद सरकार बनाने की स्थिति में न पहुँचे, परन्तु कई सीटों पर जीत-हार का अंतर प्रभावित कर सकती है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ओवैसी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक समीकरण बदल नहीं रहे हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में उसे उलझाने और पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति को चुनौती देने की क्षमता अवश्य रखते हैं।आने वाले वर्षों में यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ओवैसी केवल मुस्लिम पहचान की राजनीति तक सीमित रहते हैं या पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों को साथ जोड़कर व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा कर पाते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव वर्तमान अनुमान से कहीं अधिक बड़ा हो सकता है।

अन्य चुनावों में अब तक ओवेसी का असर
यदि हम पिछले चुनावों का विश्लेषण करें तो असदुद्दीन ओवेसी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का प्रभाव अलग-अलग राज्यों में अलग रहा है। यह कहना कि ओवैसी हमेशा किसी एक दल का नुकसान करते हैं, राजनीतिक रूप से सरल निष्कर्ष होगा; वास्तविकता अधिक जटिल है।

बिहार के सीमांचल क्षेत्र में एआईएमआईएम ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की। 2020 और 2025 दोनों चुनावों में पार्टी ने कई सीटों पर जीत दर्ज की और मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से को अपने साथ जोड़ा। महागठबंधन की हार के बाद विपक्षी दलों ने एआईएमआईएम पर वोट विभाजन का आरोप लगाया, जबकि ओवैसी ने इसे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बताया।
महाराष्ट्र में एआईएमआईएम को अक्सर वोट-कटर कहा गया, लेकिन चुनावी आंकड़े बताते हैं कि उसका प्रभाव हर सीट पर एक जैसा नहीं रहा। 2019 विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत सीमित था, फिर भी कुछ करीबी मुकाबलों में उसके वोट निर्णायक साबित हुए। हाल के नगर निकाय चुनावों में एआईएमआईएम ने 100 से अधिक वार्ड जीतकर अपनी उपस्थिति मजबूत की है।

हैदराबाद और उसके आसपास एआईएमआईएम का मजबूत आधार है। यहां पार्टी केवल वोट काटने वाली शक्ति नहीं बल्कि प्रत्यक्ष राजनीतिक खिलाड़ी है। ओवैसी स्वयं लगातार सांसद चुने जाते रहे हैं और पार्टी का संगठनात्मक ढांचा मजबूत है।
पश्चिम बंगाल में एआईएमआईएम अभी बड़ी चुनावी सफलता नहीं पा सकी है, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उसकी सक्रियता बढ़ी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कुछ प्रतिशत वोट भी हासिल करती है तो उसका असर त्रिकोणीय मुकाबलों में दिखाई दे सकता है।

उत्तर प्रदेश में ओवैसी की चुनौती मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक पर है। हालांकि अब तक एआईएमआईएम कोई बड़ा चुनावी प्रदर्शन नहीं कर सकी है, लेकिन पूर्वांचल और कुछ पश्चिमी जिलों में वह अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश कर रही है। 2027 विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने अभियान भी शुरू कर दिया है।ओवैसी का प्रभाव सीटों की संख्या से अधिक वोटों के पुनर्वितरण में दिखाई देता है। जहां मुस्लिम आबादी 20-40 प्रतिशत के बीच है और मुकाबला कड़ा है, वहां एआईएमआईएम कुछ हजार वोट लेकर चुनावी समीकरण बदल सकती है। लेकिन जहां उसका मजबूत संगठन नहीं है, वहां उसका प्रभाव सीमित रहता है। इसलिए उत्तर प्रदेश में भी ओवैसी सरकार बनाने की स्थिति में भले न हों, लेकिन कई सीटों पर जीत-हार का अंतर प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें मुस्लिम प्रतिनिधित्व की स्वतंत्र आवाज़ मानते हैं, जबकि विरोधी दल उन्हें विपक्षी वोटों के विभाजन का कारक बताते हैं।