अंतर्विरोधों से घिरा ‘वचन भागवत’

'Vachan Bhagwat': Beset by Contradictions

तनवीर जाफ़री

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सरसंघचालक मोहन भागवत ने पिछले दिनों अमेरिका,कनाडा व ब्रिटेन की 17 दिवसीय यात्रा की। इस त्रिदेशीय यात्रा में जहाँ एक तरफ़ बड़ी संख्या में स्थानीय हिंदू और प्रवासी भारतीय संगठनों द्वारा उनका स्वागत किया गया वहीं दूसरी तरफ़ कई संगठनों द्वारा उनका कड़ा विरोध भी किया गया। विरोध करने वाले समूहों व प्रदर्शनकारी संगठनों का आरोप है कि आरएसएस एक अति-दक्षिणपंथी और बहुसंख्यकवादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाला संग्ठन है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। कई सिविल सोसाइटी समूहों ने संघ के ढांचे को “तानाशाही और सैन्यवादी” क़रार देते हुए इसके वैश्विक प्रभाव पर चिंता जताई। मोहन भागवत का विरोध मुख्य रूप से मानवाधिकार संगठनों, प्रवासी भारतीय अल्पसंख्यक समुहों और कुछ विदेशी राजनेताओं द्वारा किया गया। ‘हिंदूज़ फ़ॉर ह्यूमन राइट्स’, ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप और कई अन्य मानवाधिकार संगठनों ने इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया। इसके अतिरिक्त न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी, अमेरिकी सांसद रशीदा तालेब व जिम मैकगवर्न, और ब्रिटिश लेबर पार्टी की सांसद नादिया व्हिटोम ने सार्वजनिक रूप से इस यात्रा का विरोध व आलोचना की। इस विरोध के बीच संघ समर्थकों का कहना है कि मोहन भागवत की यात्रा का उद्देश्य वैश्विक कल्याण, सामाजिक सद्भाव और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संदेशों का प्रसार करना है।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में बीबीसी द्वारा आयोजित ‘फ़ेथ लीडर्स कॉन्फ्रेंस’ के दौरान यह कहा कि “जो हिंदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से बाहर निकाल देना चाहिए, वह हिंदू नहीं रह सकता।”उन्होंने कहा कि ‘मुसलमानों को देश से बाहर करने की सोच रखना पूरी तरह से हिंदुत्व के ख़िलाफ़ है’। उन्होंने कहा कि’ हिंदू होने का मतलब सभी धार्मिक रास्तों को एक ही लक्ष्य की ओर जाने वाला मानना और हर इंसान की गरिमा को स्वीकार करना है’। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ” One world-One Humanity” का नारा देते हुए कहा कि विविधता से हमारी साझा पहचान को कोई ख़तरा नहीं होना चाहिए। परन्तु भारत में मोहन भागवत के इस बयान के बाद राजनीतिक बहस छिड़ गई है। जहाँ भाजपा ने इसे हिंदू धर्म की सहिष्णुता और वास्तविक संदेश के रूप में सराहा, वहीं कांग्रेस, और अन्य विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि आरएसएस प्रमुख ऐसा ही कड़ा संदेश भारत में अपने कार्यकर्ताओं को क्यों नहीं देते। एक सवाल यह भी है कि आख़िर भागवत को अमेरिका में जाकर यह बात कहनी ही क्यों पड़ी ?

दरअसल आलोचकों द्वारा भागवत के बयान को मूल रूप से दो सन्दर्भों में देखा जा रहा है। पहला संघ के मुस्लिम विरोधी वह सिद्धांत जो और किसी के द्वारा नहीं बल्कि स्वयं आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर (गुरुजी) द्वारा लिखित किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में मुसलमानों,ईसाईयों और कम्युनिस्टों को लेकर व्यक्त किये गए हैं। उन्होंने इस पुस्तक के एक विशेष अध्याय, जिसका शीर्षक “आंतरिक ख़तरे” है, में मुसलमानों को लेकर गोलवलकर ने लिखा कि भारत में रहने वाले कई मुसलमानों की निष्ठा भारत के बजाय उन मुस्लिम देशों के प्रति अधिक है जिन्हें वे पवित्र मानते हैं। उन्होंने दावा किया कि देश के कई हिस्सों में मुस्लिम आबादी भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक गतिविधियों में शामिल रहती है। उनका मानना था कि मुस्लिम समुदाय ख़ुद को भारत की मुख्य सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धारा से अलग रखता है, जो देश की अखंडता के लिए चुनौती है। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत की संस्कृति और मंदिरों को नष्ट किया, और वह मानसिकता आज भी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है।” गोलवलकर के इन विचारों की वजह से ही ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ की हमेशा तीखी आलोचना होती रही है। सवाल यह है कि इन साहित्यों व संस्कारों के मध्य पला बढ़ा कोई भी स्वयं सेवक और गोलवलकर की विचारधारा का अनुसरण करने वाले लोग उनके इस साम्प्रदायिकतावादी नफ़रती विचारों से स्वयं को दूर कैसे कर सकते हैं ?

दूसरा यह कि आज प्रधानमंत्री से लेकर देश के अनेक भाजपाई मंत्रियों मुख्यमंत्रियों बड़े नेताओं व ज़िम्मेदार लोगों द्वारा देश की संसद से लेकर जनसभाओं तक में सरे आम अल्पसंख्यकों को अपमानित किया जा रहा हैं। उन्हें धमकाया जाता है,समुदाय विशेष के लोगों की मॉब लिंचिंग की जाती है,उनके घर मदरसे,चर्च।मस्जिद आदि गिराए जाते हैं या उनमें तोड़ फोड़ की जाती है। कभी मौलवियों कभी पादरियों तो कभी नन्स पर हमले होते हैं। दुनिया भर के अख़बारों में इस संबंध में ख़बरें व लेख प्रकाशित होते हैं। इससे निश्चित रूप से हमारे धर्मनिरपेक्ष देश की बदनामी होती है। सवाल यह है कि इस तरह के कृत्य में शामिल लोगों के लिये क्या आज तक संघ ने कोई सीधा कड़ा सन्देश दिया ? किसी को ऐसी ग़ैर ज़िम्मेदाराना बातों के लिये भाजपा या संघ से बाहर निकाला गया ? प्रधानमंत्री स्वयं शमशान व क़ब्रिस्तान में अंतर का सन्देश देते हैं। लोकसभा में एक भाजपाई सांसद एक मुस्लिम सांसद को धर्म सूचक गलियां देता है। विश्व हिन्दू परिषद की फ़ायरब्रांड नेता साध्वी प्राची यह कहती हैं कि “जिस दिन भारत में मस्जिदें और मदरसे बंद हो जाएंगे, उस दिन लव जिहाद ख़त्म हो जाएगा और पूरी दुनिया में शांति आ जाएगी।” उन्होंने हिंदुओं से अधिक बच्चे पैदा करने का आह्वान करते हुए नारा दिया, “हिंदू घटेंगे तो कटेंगे”, जिसमें उन्होंने मुस्लिम आबादी के बढ़ने को हिंदुओं के अस्तित्व के लिए ख़तरा बताया। संघ,परिषद,भाजपा व बजरंग दल के पदाधिकारी अक्सर रैलियों, ‘शौर्य यात्राओं’ और गो-रक्षण प्रदर्शनों के दौरान सीधे तौर पर मुसलमानों को चेतावनी देते हैं। ‘शौर्य सभाओं’ के दौरान बजरंग दल के वक्ताओं ने कथित तौर पर खुले मंचों से चेतावनी दी कि “यदि हमारी बेटियों या गायों को नुक़्सान पहुंचाया गया, तो 2002 के गुजरात जैसा जवाब दिया जाएगा। समय-समय पर धार्मिक जुलूसों और विरोध प्रदर्शनों में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं द्वारा मुस्लिम समुदाय और ‘इस्लामिक जिहाद’ के ख़िलाफ़ अत्यधिक भड़काऊ और हिंसक नारेबाज़ी की जाती है। भारत हेट लैब और सिटिज़ेंस फ़ॉर जस्टिस एंड पीस जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों के अनुसार, देश में होने वाली मुस्लिम विरोधी हेट स्पीच की घटनाओं में एक बड़ा हिस्सा संघ,विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल से जुड़े संगठनों या नेताओं का होता है। इन बयानों के कारण सुप्रीम कोर्ट को भी कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा है और नफ़रत भरे भाषणों को रोकने के लिए सख्त निर्देश जारी करने पड़े हैं। कई मामलों में इन नेताओं के ख़िलाफ़ विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकियां भी दर्ज की गई हैं। ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं। तो क्या कभी संघ प्रमुख ने कभी ऐसे नेताओं को चेतावनी दी ? या उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई की ? दरअसल भारत में भागवत की ख़ामोशी और विदेशों में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष ही यह साबित करता है कि ‘वचन भागवत’ पूरी तरह अंतर्विरोधों से घिरा हुआ है।