अधर्म के विनाश के लिए भगवान लेते हैं अवतार, गृहस्थ जीवन जीना सीखें भगवान शिव से — कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज महाराज

God incarnates to destroy unrighteousness; learn how to lead a householder's life from Lord Shiva — Narrator Atul Krishna Bhardwaj Maharaj

रविवार दिल्ली नेटवर्क

मोदीनगर : श्री राम कथा आयोजन समिति के तत्वाधान में चल रही श्री भागवत कथा में कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान चतुर्थ दिन ज्ञान की महिमा के विषय में श्रद्धालुओं को बताया कि मनुष्य को गृहस्थ जीवन जीने के लिए भगवान शिव के आदर्शों पर चलना चाहिए। भगवान शिव अपने विवाह के श्रृंगार से समाज को यह सन्देश देना चाहते हैं कि उनके सिर पर नाग विराजमान है, जिसका तात्पर्य है कि संसार के प्रत्येक प्राणी के सिर पर कालरूपी नाग बैठा है, जो प्रतिदिन उसकी आयु को ग्रस रहा है। भगवान शेर की खाल धारण कर यह सन्देश देते हैं कि मनुष्य को गृहस्थ जीवन संयमित रूप से, सिंह के समान, जीना चाहिए; क्योंकि सिंह अपने जीवन में एक ही नारी का पालन करता है।

सामान्य विवाह में दूल्हा घोड़े पर बैठता है, परन्तु भगवान शिव नन्दी पर आरूढ़ हुए। इसका तात्पर्य है कि नन्दी धर्म का प्रतीक है, जबकि घोड़ा काम का प्रतीक है। भगवान शिव ने अपने शरीर पर चिता की राख लपेटी है, जो यह दर्शाती है कि सभी प्राणियों को अंततः चिता में जाना है।

पूज्य व्यास जी ने भगवान श्रीराम एवं भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का सुन्दर वर्णन करते हुए कहा कि जब-जब धरती पर अधर्म का प्रकोप बढ़ता है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर असुरों का नाश करते हैं, जिससे अधर्म पर धर्म की विजय होती है। भगवान को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को फ्रीज़र की भाँति होना चाहिए — अर्थात् काम, क्रोध, मोह, लोभ एवं ईर्ष्या का त्याग कर, भक्ति एवं निर्मल हृदय से ही भगवान की प्राप्ति सम्भव है।

“निर्मल मन जन सो मोहि पावा,
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।”

त्रेतायुग में जब असुरों की शक्ति बढ़ने लगी और धर्म लुप्त होने लगा, तब माता कौशल्या की कोख से भगवान श्रीराम ने जन्म लिया। द्वापरयुग में माता देवकी की कोख से भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। पूज्य व्यास जी ने कहा कि भगवान कण-कण में विराजमान हैं, सर्वत्र विद्यमान हैं, और प्रेम से पुकारने पर कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। भगवान तो केवल निर्मल मन एवं सच्ची भक्ति को देखते हैं। इसीलिए कहा गया है —

“हरि व्यापक सर्वत्र समाना,
प्रेम से प्रकट होहि मैं जाना।”
कथा व्यास ने धर्म और सम्प्रदाय में अन्तर स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म मनुष्य के भीतर एकता का भाव उत्पन्न करता है, जबकि सम्प्रदाय मनुष्य को केवल बाहरी रूप में जोड़ता है। धर्म और सम्प्रदाय की व्याख्या करते हुए व्यास जी ने कहा — एक पुस्तक, एक पूजा-स्थल, एक पैग़म्बर और एक पूजा-पद्धति मनुष्य को सीमित एवं संकुचित बनाती है; जबकि ईश्वर का विभिन्न रूपों में स्मरण और दर्शन कर पाना केवल सनातन धर्म ही सिखाता है।

आज हमारे देश की संस्कृति, सभ्यता एवं खान-पान पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव दिखने लगा है। व्यास जी ने माताओं और बहनों से आग्रह किया कि गर्भवती माताओं का चिन्तन-मनन, खान-पान, पठन-पाठन एवं रहन-सहन होने वाले शिशु पर गहरा प्रभाव डालते हैं। अतः गर्भावस्था के समय माताओं को भगवन्नाम का स्मरण करना चाहिए तथा सात्त्विक भोजन एवं आध्यात्मिक चिन्तन-मनन करना चाहिए।

आज कथा के यजमान अनिल गर्ग, ललित गर्ग, आलोक सिंघल, राम किशोर अग्रवाल, संजय गर्ग, राहुल गुप्ता, अनिल गुप्ता, राजीव अग्रवाल, राम अवतार बूरा वाले, दीपक गर्ग, सुशील कुमार गुप्ता रहे। इनके अतिरिक्त कथा में मुख्य रूप से डॉक्टर देवेंद्र सिवाच, योगेश नंदवानी, दीपक वत्स सीकरी, मुकेश कालका दिल्ली, चेतन पिलखुआ, सुशील मुरादनगर, अरविंद भारतीय, अमरीश गोयल, राजेंद्र अग्रवाल, अनिल आर्य, अधिनियम महेश्वरी आदि उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त दशमेश खालसा के सदस्यों ने महाराज जी का पगड़ी पहनकर सम्मान किया।