एडवोकेट, जयदेव राठी
15 अगस्त 2026 को भारत स्वतंत्रता के 79 वर्ष पूरे करेगा। अगले वर्ष आजादी के 80 वर्ष पूरे होंगे और 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी। इसलिए यह समय केवल तिरंगा फहराने, देशभक्ति के गीत गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने का नहीं, बल्कि अपने आप से एक असहज सवाल पूछने का है—जिस भारत को आजाद कराने के लिए लाखों लोगों ने संघर्ष किया, क्या हमने उस भारत को उसकी पूरी क्षमता तक पहुंचाया है?
भारत ने गुलामी के लंबे दौर में बहुत कुछ खोया। सत्ता गई, संपदा गई, उद्योग कमजोर हुए, शिक्षा व्यवस्था पर विदेशी नियंत्रण हुआ और आर्थिक ढांचा इस तरह बनाया गया कि भारत कच्चा माल उपलब्ध कराए और विदेशी उद्योगों के लिए बाजार बना रहे। मुगलकाल से लेकर ब्रिटिश शासन तक भारत ने अनेक राजनीतिक और आर्थिक झटके झेले। लेकिन स्वतंत्रता के बाद पहली बार देश के पास अपने भविष्य की दिशा स्वयं तय करने का अवसर था।
यह कहना गलत होगा कि आजादी के बाद भारत ने प्रगति नहीं की। हमने लोकतंत्र को बचाया, संविधान को मजबूत किया, खाद्यान्न संकट से निकलकर आत्मनिर्भरता हासिल की, परमाणु शक्ति बने, अंतरिक्ष में अपनी पहचान बनाई, सूचना प्रौद्योगिकी में दुनिया को अपनी क्षमता दिखाई और आज वैश्विक अर्थव्यवस्था की प्रमुख शक्तियों में शामिल हैं। लेकिन समस्या यह है कि भारत की उपलब्धियां जितनी बड़ी हैं, उसकी संभावनाएं उससे कहीं बड़ी हैं।
भारत और चीन लगभग एक ही दौर में आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की यात्रा पर आगे बढ़े। दोनों देशों ने गरीबी देखी, विशाल आबादी की चुनौती देखी और विकास की कठिन राह पकड़ी। लेकिन चीन ने विनिर्माण, निर्यात, बुनियादी ढांचे और बड़े पैमाने के औद्योगिक निवेश को अपनी ताकत बनाया। भारत ने लंबे समय तक कृषि और सेवा क्षेत्र पर अधिक निर्भरता बनाए रखी। परिणाम सामने है। आज चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी है।
यह तुलना भारत को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी कमियों को पहचानने के लिए जरूरी है।
सवाल यह नहीं कि चीन ने क्या किया। सवाल यह है कि भारत ने वह सब समय पर क्यों नहीं किया, जो उसे करना चाहिए था?
इसका जवाब केवल किसी एक सरकार में नहीं मिलता। आजादी के बाद लंबे समय तक चली नियंत्रणवादी आर्थिक सोच, लाइसेंस और अनुमति की जटिल व्यवस्था, धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया, कमजोर औद्योगिक आधार और सुधारों की असमान गति ने भारत की रफ्तार को प्रभावित किया। 1991 के आर्थिक सुधारों ने दिशा बदली, लेकिन सुधारों की गति हमेशा उस स्तर की नहीं रही जिसकी भारत को आवश्यकता थी।
भारत की एक बड़ी समस्या रही है—हम निर्णय लेने से अधिक निर्णय पर बहस करने में समय लगा देते हैं। लोकतंत्र में बहस जरूरी है, लेकिन बहस का उद्देश्य निर्णय तक पहुंचना होना चाहिए, निर्णय को रोकना नहीं। संसद लोकतंत्र का मंदिर है तो वहां हंगामा नहीं, विमर्श होना चाहिए। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है, उसकी नीतियों में कमियां बताना है और बेहतर विकल्प देना है। लेकिन यदि विरोध का अर्थ हर नीति का विरोध और संसद का अर्थ हर मुद्दे पर गतिरोध बन जाए, तो नुकसान किसी एक सरकार का नहीं, देश का होता है।
लेकिन सत्ता पक्ष भी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। बहुमत सरकार को निर्णय लेने की शक्ति देता है, मनमानी का अधिकार नहीं। विपक्ष की आलोचना को देशविरोधी बताना उतना ही गलत है जितना हर सरकारी निर्णय को विफल बताना। लोकतंत्र में मजबूत सरकार और मजबूत विपक्ष दोनों चाहिए। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों को यह तय करना होगा कि उनकी राजनीति के केंद्र में सत्ता है या राष्ट्रहित।
देश पांच वर्ष के चुनावी चक्र से नहीं चलता। देश को 25 वर्ष और 50 वर्ष की सोच चाहिए। सरकारें बदलें, लेकिन राष्ट्रीय लक्ष्य न बदलें। बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, रक्षा उत्पादन, शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, जल सुरक्षा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में राजनीतिक दलों के बीच न्यूनतम राष्ट्रीय सहमति होनी चाहिए।
2047 का विकसित भारत किसी एक प्रधानमंत्री, किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल की उपलब्धि नहीं होगा। यह पूरे देश की सामूहिक सफलता होगी।
लेकिन इसके लिए सबसे पहले रोजगार की चुनौती का समाधान करना होगा। भारत की युवा आबादी हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यदि युवा को रोजगार और अवसर नहीं मिले तो यही शक्ति निराशा में बदल सकती है। भारत को ऐसी शिक्षा चाहिए जो डिग्री नहीं, दक्षता दे।
श्वविद्यालय ऐसे हों जहां रोजगार के साथ अनुसंधान और नवाचार पैदा हो। स्कूल ऐसे हों जहां रटने की जगह सोचने की क्षमता विकसित हो।
सरकारी नौकरी को ही सफलता का अंतिम प्रमाण मानने की मानसिकता भी बदलनी होगी। हर युवा सरकारी कर्मचारी नहीं बन सकता। भारत को नौकरी मांगने वालों के साथ-साथ नौकरी देने वालों की भी बड़ी पीढ़ी चाहिए। इसके लिए उद्योग, व्यापार, स्टार्टअप और उद्यमिता को अनुकूल वातावरण देना होगा।
यहीं सरकार की भूमिका निर्णायक है। सरकार का काम हर व्यक्ति को नौकरी देना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां उद्योग निवेश करे, उत्पादन बढ़े और करोड़ों रोजगार पैदा हों।
दूसरी बड़ी बाधा है प्रशासनिक जटिलता। यदि किसी परियोजना को मंजूरी लेने में वर्षों लगें, जमीन संबंधी विवाद दशकों तक चलें, न्याय मिलने में पीढ़ियां गुजर जाएं और छोटे कारोबारी को नियमों की भूलभुलैया में फंसा रहना पड़े तो विकास की रफ्तार कैसे बढ़ेगी?
विकसित भारत का मतलब केवल चमकते एक्सप्रेसवे, ऊंची इमारतें और तेज रफ्तार ट्रेनें नहीं हैं। विकसित भारत वह है जहां सामान्य नागरिक को अपना काम करवाने के लिए व्यवस्था के सामने झुकना न पड़े।
न्याय समय पर मिले, सरकारी सेवाएं समय पर मिलें, पुलिस पर भरोसा हो, शिक्षा गुणवत्तापूर्ण हो और रोजगार सम्मानजनक हो—तभी विकास का वास्तविक अर्थ सामने आएगा।
भारत को अब एक और मानसिकता बदलनी होगी। चुनाव जीतने के लिए समाज को बांटना आसान है; देश बनाने के लिए समाज को जोड़ना कठिन। जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा की पहचानें हमारी सामाजिक वास्तविकताएं हैं, लेकिन इन्हें राजनीतिक हथियार बनाकर विकास की प्राथमिकताओं को पीछे नहीं धकेला जा सकता। देश की राजनीति को अब गरीबी बांटने से आगे बढ़कर समृद्धि बांटने की राजनीति करनी होगी।
कल्याणकारी योजनाएं आवश्यक हैं, लेकिन कल्याण और स्थायी निर्भरता में अंतर समझना होगा। गरीब को सहायता देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन गरीबी को स्थायी राजनीतिक पूंजी बना देना राष्ट्र के हित में नहीं हो सकता। असली लक्ष्य होना चाहिए कि सहायता लेने वाला व्यक्ति एक दिन अपने पैरों पर खड़ा हो।
दुनिया तेजी से बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और स्वच्छ ऊर्जा आने वाले दशकों की अर्थव्यवस्था तय करेंगे। भारत के पास प्रतिभा है, बाजार है, युवा शक्ति है और महत्वाकांक्षा भी है। कमी यदि कहीं है तो वह गति और पैमाने की है।
अब भारत को छोटे लक्ष्य रखने की आदत छोड़नी होगी। हमें दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जीवन की गुणवत्ता में भी दुनिया के अग्रणी देशों की बराबरी करनी होगी। केवल जीडीपी बढ़ना पर्याप्त नहीं है। विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न इसलिए चीन नहीं है। सबसे बड़ा प्रश्न स्वयं भारत है।
हमारे सामने कोई विदेशी शासक खड़ा नहीं है। हमारी गति रोकने वाली सबसे बड़ी बाधाएं अब हमारी अपनी व्यवस्था, हमारी राजनीतिक प्राथमिकताएं, हमारी प्रशासनिक सुस्ती और कई बार हमारी सामाजिक मानसिकता हैं।
इसलिए आजादी की 79वीं वर्षगांठ पर हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि अंग्रेजों ने भारत को क्या दिया और क्या छीना। हमें यह पूछना चाहिए कि आजाद भारत ने अपने लिए उपलब्ध अवसरों का कितना उपयोग किया और आने वाले अवसरों के लिए कितना तैयार है।
2047 दूर नहीं है। इतिहास में 21 वर्ष बहुत लंबा समय नहीं होता। यदि अगले दो दशकों में भारत लगातार उच्च आर्थिक वृद्धि, रोजगार, विनिर्माण, शिक्षा, तकनीक और संस्थागत सुधारों पर काम करता है तो दुनिया की शक्ति-समीकरण में भारत की भूमिका पूरी तरह बदल सकती है। लेकिन इसके लिए भाषणों से अधिक नीति चाहिए, नारों से अधिक काम चाहिए और राजनीति से अधिक राष्ट्रीय दृष्टि चाहिए।
आजादी हमें हमारे पूर्वजों ने संघर्ष करके दी थी। अब समृद्धि, अवसर और सम्मान की आजादी हमारी पीढ़ी को अपने फैसलों से हासिल करनी होगी। सरकार को तेज फैसले लेने होंगे। विपक्ष को जिम्मेदार विकल्प देना होगा। राज्यों को प्रतिस्पर्धी विकास की राह पकड़नी होगी। उद्योग को जोखिम लेने होंगे। युवाओं को कौशल और उद्यमिता की ओर बढ़ना होगा और नागरिकों को अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझना होगा।
क्योंकि 2047 का विकसित भारत किसी भाषण से नहीं बनेगा। वह बनेगा तब, जब संसद में शोर से ज्यादा काम होगा, राजनीति में आरोप से ज्यादा नीति होगी, सरकारी दफ्तरों में फाइल से ज्यादा गति होगी, विश्वविद्यालयों में डिग्री से ज्यादा ज्ञान होगा और युवाओं के हाथ में नौकरी मांगने की पर्ची के बजाय अवसर पैदा करने की क्षमता होगी।
आजादी की अगली मंजिल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, पिछड़ेपन से मुक्ति है।
अब भारत को यह तय करना होगा कि वह अपनी समस्याओं के लिए इतिहास को दोष देता रहेगा या इतिहास से सीख लेकर भविष्य लिखेगा।
79 वर्ष बाद भारत के सामने यही सबसे बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न है—क्या हम अपनी ही बनाई बाधाओं को हटाकर उस भारत का निर्माण कर सकते हैं, जिसकी कल्पना स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी?
समय अब बहाने सुनने का नहीं है।
अब भारत को बहानों से नहीं, फैसलों से आगे बढ़ना होगा।





