कलयुग का क्रूर सच या बदलता सामाजिक यथार्थ? क्या माता-पिता अब केवल जिम्मेदारी रह गए हैं, संबंध नहीं?

The cruel truth of the *Kalyug* or a changing social reality? Have parents now become merely a responsibility rather than a relationship?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर आध्यात्मिकता संवेदन शीलता सहिष्णुता पारिवारिक विश्वास और अतिथि देवो भव का गढ़ माने जाने वाले भारत सहित करीब करीब दुनियाँ के हर देश में यह प्रश्न गूंज रहा है, क्या आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार ने मनुष्य की संवेदनशीलता को पीछे छोड़ दिया है? क्या आर्थिक सफ़लता की दौड़ में रिश्तों की ऊष्मा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है? यह केवल किसी एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक सामाजिक यथार्थ का दर्पण बनती दिखाई देती है।यह बात आज हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि एक घटना हरियाणा में हुई, 5 अगस्त 2026 को अंतिम संस्कार किए जाने के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।इसके बाद गुरुवार 6 अगस्त 2026 को शाम देशभर के अनेक मीडिया प्लेटफॉर्म आई खबरों ने पूरे देश को गहरे भावनात्मक मंथन के लिए विवश कर दिया। यह घटना एक ऐसे प्रश्न को अवश्य सामने लाती है,जो केवल भारत का नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ का सामाजिक संकट बनता जा रहा है, क्या आधुनिक विकास, वैश्वीकरण और डिजिटल जीवनशैली ने मनुष्य को आर्थिक रूप से समृद्ध लेकिन भावनात्मक रूप से निर्धन बना दिया है? क्या माता-पिता अब केवल जिम्मेदारी रह गए हैं, संबंध नहीं? क्या संवेदनशीलता की जगह सुविधा ने ले ली है?आज व्यक्ति के पास समय कम और साधन अधिक हैं।वह दुनियाँ के किसी भी कोने में बैठकर अपने माता-पिता से वीडियो कॉल पर बात कर सकता है, लेकिन उनके पास बैठकर कुछ पल बिताने का समय नहीं निकाल पा रहा। तकनीक ने दूरी घटाई है,पर कई मामलों में भावनात्मक निकटता भी कम कर दी है।सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किए गए वीडियो और दावों के अनुसार एक वृद्ध के अंतिम संस्कार के दौरान उनकी संतानों द्वारा जल्दबाजी और भोजन के लिए समय पूछने जैसी बातें कही गईं। इसी प्रकार कुछ अन्य वायरल दावों में अंतिम संस्कार को वीडियो कॉल पर देखने या विदेश एवं महानगरों में रहने वाले बच्चों के समयाभाव का उल्लेख भी सामने आया, इन घटनाओं ने समाज के सामने एक अत्यंत गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। मानव सभ्यता का सबसे बड़ा आधार केवल विज्ञान, अर्थव्यवस्था या तकनीक नहीं रहा, बल्कि रिश्तों की आत्मीयता करुणा,सहिष्णुता और पारिवारिक विश्वास रहा है। जब कोई पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए जीवनभर संघर्ष करता है,अपनी इच्छाओं का त्याग करता है और अपनी खुशियों को उनके सपनों में समाहित कर देता है,तब उसके जीवन की अंतिम यात्रा केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं होती; वह पूरे परिवार के प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता की अंतिम अभिव्यक्ति होती है।यदि वही अंतिम क्षण जल्दबाजी, औपचारिकता या समय-प्रबंधन का विषय बन जाएँ, तो यह केवल एक परिवार की संवेदनहीनता नहीं, बल्कि समाज के नैतिक चरित्र पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा होता है। बता दें क़ि मीडिया में आई घटना किसी स्वतंत्र आधिकारिक जांच या न्यायिक पुष्टि अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के बजाय रिपोर्टेड दावा मानकर ही उद्धृत करना उचित होगा।

साथियों, वर्तमान समय में रोजगार,शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से महानगरों तथा विदेशों की ओर प्रवासन तेजी से बढ़ा है। यह परिवर्तन आर्थिक दृष्टि से आवश्यक भी है और विकास का संकेत भी। लाखों युवाओं ने अपने परिवारों के जीवन स्तर को बेहतर बनाया है। किंतु इस विकास का एक मौन और पीड़ादायक पक्ष भी सामने आया है। माता-पिता वृद्धावस्था में अपने ही घरों में अकेले रह जाते हैं। बैंक खाते में नियमित धनराशि पहुँच जाती है, महंगे इलाज की व्यवस्था भी हो जाती है, लेकिन वह हाथ नहीं पहुँच पाता जो उनके कंधे पर स्नेह से रखा जाए। आर्थिक सहयोग जीवन को सुरक्षित बना सकता है, किंतु भावनात्मक उपस्थिति का कोई विकल्प आज तक दुनिया नहीं खोज सकी है।यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है। जापान में कोडोकुशी अर्थात अकेले मृत्यु हो जाना एक गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बन चुका है। यूरोप के अनेक देशों में लाखों बुजुर्ग अकेले रहते हैं।अमेरिका,ब्रिटेन, जर्मनी दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। सरकारें वृद्धजन कल्याण योजनाएँ चला रही हैं, आधुनिक देखभाल केंद्र विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन कोई भी सरकारी व्यवस्था परिवार के स्नेह, संतान के स्पर्श और अपनत्व की जगह नहीं ले सकती। यही कारण है कि विकसित देशों में भी अकेलेपन को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट माना जाने लगा है। इससे स्पष्ट होता है कि यह केवल भारतीय समाज की समस्या नहीं, बल्कि आधुनिक वैश्विक सभ्यता के सामने खड़ी एक साझा मानवीय चुनौती है।

साथियों, भारतीय संस्कृति ने सदैव माता-पिता को देवतुल्य स्थान दिया है।मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का मूल दर्शन रहा है। संयुक्त परिवारों में तीन-तीन पीढ़ियाँ एक साथ रहती थीं। बच्चे अपने दादा-दादी और माता-पिता के बीच जीवन के संस्कार सीखते थे।वृद्ध व्यक्ति परिवार का अनुभव,धैर्य और नैतिक दिशा होते थे। किंतु शहरीकरण,उपभोक्तावाद,व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नई अवधारणाएँ और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी जीवनशैली ने इस संरचना को बदल दिया है। आज सफलता का मूल्यांकन वेतन, पद, विदेशी नौकरी और भौतिक उपलब्धियों से किया जाता है,जबकि सेवा, त्याग, सहिष्णुता और पारिवारिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्य धीरे-धीरे सामाजिक विमर्श से पीछे हटते दिखाई देते हैं। आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तकनीक ने संवाद के साधन तो बढ़ा दिए हैं,परंतु संवाद की आत्मीयता कम कर दी है। वीडियो कॉल, सोशल मीडिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल संचार ने दूरियों को भौगोलिक रूप से समाप्त कर दिया, लेकिन कई बार भावनात्मक दूरी पहले से अधिक बढ़ गई। माता-पिता से प्रतिदिन कुछ मिनट वीडियो कॉल पर बात करना आसान हो गया है, किंतु उनके साथ बैठकर चाय पीने, उनके अनुभव सुनने या उनके अकेलेपन को समझने का समय कम होता जा रहा है। रिश्ते कभी-कभी स्क्रीन तक सीमित होकर रह गए हैं। आधुनिक तकनीक दोषी नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब सुविधा, संवेदना का स्थान लेने लगती है।

साथियों, फिर भी इस पूरे विमर्श में संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। प्रत्येक प्रवासी बेटा या बेटी संवेदनहीन नहीं होता। अनेक युवाओं की परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि उन्हें अचानक छुट्टी नहीं मिलती, अंतरराष्ट्रीय यात्रा तुरंत संभव नहीं होती या रोजगार की बाध्यताएँ अत्यधिक कठोर होती हैं। कई माता-पिता स्वयं अपने बच्चों को आगे बढ़ने के लिए विदेश भेजते हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य पर गर्व करते हैं। इसलिए किसी एक वायरल घटना के आधार पर पूरी पीढ़ी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना का है जिसमें समय, सफलता और प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों पर अभूतपूर्व दबाव बना दिया है।समस्या केवल अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं है।समाज में संवेदनहीनता के अनेक रूप दिखाई देते हैं। सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति की सहायता करने के बजाय उसका वीडियो बनाना, किसी आपदा को मानवीय त्रासदी के बजाय सोशल मीडिया सामग्री के रूप में प्रस्तुत करना,या बुजुर्गों के अकेलेपन को सामान्य मान लेना,ये सभी संकेत बताते हैं कि हमारी सामूहिक संवेदना कहीं न कहीं कमजोर हुई है। सहिष्णुता धैर्य और करुणा किसी भी सभ्य समाज की पहचान होते हैं। यदि ये मूल्य क्षीण होने लगें, तो तकनीकी प्रगति भी समाज को भीतर से सटीकता से मजबूत नहीं बना सकती।

साथियों, आज के बुजुर्गों के मन में एक नया भय जन्म ले रहा है। वे सोचते हैं कि यदि उनका बेटा या बेटी हजारों किलोमीटर दूर होगा, यदि अंतिम समय में कोई अपना साथ नहीं होगा, यदि जीवन की अंतिम यात्रा भी डिजिटल माध्यमों से पूरी होगी, तो क्या यही आधुनिकता की अंतिम परिणति है? यह प्रश्न केवल भावुकता नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मनोविज्ञान का संकेत है। वृद्धावस्था में मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता सम्मान, संवाद और अपनेपन की होती है। दवाइयाँ शरीर को सहारा देती हैं, लेकिन आत्मा को जीवित रखने का कार्य परिवार का स्नेह ही करता है।शिक्षा व्यवस्था भी इस संदर्भ में आत्ममंथन की अपेक्षा करती है। आज विद्यालय और विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को उत्कृष्ट पेशेवर बनाने का प्रयास करते हैं, किंतु भावनात्मक बुद्धिमत्ता,नैतिक शिक्षा,पारिवारिकउत्तरदायित्व और बुजुर्गों के सम्मान जैसे विषय अपेक्षित महत्व नहीं पा रहे। यदि आने वाली पीढ़ियाँ केवल तकनीकी रूप से दक्ष होंगी और मानवीय रूप से संवेदनशील नहीं, तो समाज आर्थिक रूप से समृद्ध अवश्य होगा, परंतु नैतिक रूप से कमजोर होता जाएगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील मनुष्य तैयार करना भी होना चाहिए।

साथियों सरकारों, नियोक्ताओं और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। कार्यस्थलों पर परिवार-अनुकूल अवकाश नीति, आपातकालीन पारिवारिक परिस्थितियों में विशेष अवकाश,वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेहतर सामुदायिक देखभाल मानसिक स्वास्थ्य सहायता, कानूनी सुरक्षा और सामाजिक सहभागिता जैसी व्यवस्थाएँ इस संकट को कम कर सकती हैं। साथ ही, परिवारों को भी संवाद की परंपरा पुनर्जीवित करनी होगी। बच्चों को बचपन से यह सिखाना होगा कि माता-पिता केवल जिम्मेदारी नहीं,बल्कि जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और अस्तित्व का आधार हैं। मीडिया और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।यदि कोई घटना समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है, तो उसे सुधार और संवेदनशीलता के अवसर के रूप में अवश्य देखा जाना चाहिए।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह विमर्श केवल बेटों और बेटियों के कर्तव्यों का नहीं,बल्कि पूरी मानव सभ्यता के भविष्य का प्रश्न है। यदि आधुनिकता हमें अधिक शिक्षित,अधिक संपन्न और अधिक सफल बनाती है,तो उसे हमें अधिक मानवीय भी बनाना चाहिएविकास का वास्तविक अर्थ ऊँची इमारतें, विदेशी नौकरियाँ और बढ़ती आय भर नहीं है; विकास का अर्थ ऐसा समाज भी है जहाँ किसी बुजुर्ग को यह भय न हो कि उसकी अंतिम यात्रा में रिश्ते समय की कमी से हार जाएँगे। माता-पिता के लिए सबसे बड़ा उपहार महँगे उपहार नहीं, बल्कि अपना समय, सम्मान, संवाद और स्नेह है।आज आवश्यकता स्वयं से एक ईमानदार प्रश्न पूछने की है,क्या हम अपने माता-पिता के लिए उतना समय निकाल रहे हैं, जितना उन्होंने हमारे लिए जीवनभर निकाला था?यदि इस प्रश्न का उत्तर हमें असहज करता है,तो यही आत्ममंथन परिवर्तन की पहली सीढ़ी है।आने वाली पीढ़ियाँ हमारे उपदेशों से अधिक हमारे व्यवहार से सीखेंगी। इसलिए यदि हमें संवेदनशील, सहिष्णु और संस्कारित समाज का निर्माण करना है, तो उसकी शुरुआत अपने ही घर से करनी होगी। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की सबसे विश्वसनीय पहचान उसकी आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि उसके बुजुर्गों के चेहरे पर दिखाई देने वाला सम्मान, सुरक्षा और अपनापन होता है।