ललित गर्ग
जल केवल प्रकृति का उपहार नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का आधार है। पृथ्वी पर जीवन की कल्पना जल के बिना असंभव है, फिर भी विडंबना यह है कि जिस जल को हमारी संस्कृति ने देवत्व प्रदान किया, उसी जल के प्रति हमारा व्यवहार सबसे अधिक लापरवाह रहा है। आज देश और दुनिया की सबसे गंभीर चुनौतियों में जल संकट प्रमुख बन चुका है। बढ़ती आबादी, अनियोजित शहरीकरण, अंधाधुंध भूजल दोहन, जलवायु परिवर्तन और वर्षाजल के समुचित प्रबंधन के अभाव ने इस संकट को भयावह बना दिया है। यदि समय रहते चेतना नहीं जागी तो आने वाले वर्षों में पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक तनाव, आर्थिक अस्थिरता और मानवीय संघर्ष का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। हाल के शोध इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर के अध्ययन के अनुसार पिछले दो दशकों में उत्तर भारत का भूजल भंडार लगभग 450 घन किलोमीटर घट चुका है। यह मात्रा देश के सबसे बड़े जलाशयों में से एक इंदिरा सागर बांध की कुल जल संग्रहण क्षमता से लगभग 37 गुना अधिक है। यह आंकड़ा केवल वैज्ञानिक तथ्य नहीं, बल्कि भविष्य के संकट का स्पष्ट संकेत है। इसका अर्थ है कि जिस भूजल पर करोड़ों किसानों की खेती और करोड़ों लोगों का जीवन निर्भर है, वह तेजी से समाप्त हो रहा है।
इस भयावह स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। वर्ष 1951 से 2021 के बीच मानसूनी वर्षा में लगभग 8.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। दूसरी ओर, उत्तर भारत में सर्दियों का तापमान भी बढ़ा है। तापमान में यह मामूली प्रतीत होने वाली वृद्धि भी मिट्टी की नमी को तेजी से कम करती है। परिणामस्वरूप खेतों को पहले की अपेक्षा अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। जब वर्षा कम होती है और सिंचाई की मांग बढ़ती है, तब किसान भूजल पर अधिक निर्भर हो जाते हैं। यही कारण है कि भूजल का पुनर्भरण कम और दोहन अधिक हो रहा है। आज भारत के अनेक क्षेत्रों में भूजल का स्तर हर वर्ष नीचे जा रहा है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और मध्य भारत के कई हिस्से इस संकट की चपेट में हैं। अनेक स्थानों पर सैकड़ों फीट गहराई तक बोरवेल खोदने के बाद भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। कई गांवों में हैंडपंप सूख चुके हैं और शहरों में टैंकर संस्कृति तेजी से बढ़ रही है। यह स्थिति बताती है कि यदि हमने अपनी जल नीति नहीं बदली तो आने वाले समय में पानी का संकट भोजन के संकट में भी बदल सकता है।
भारत की कृषि व्यवस्था आज भी लगभग 80 प्रतिशत मीठे जल का उपयोग करती है। दुर्भाग्य से धान, गन्ना जैसी अधिक पानी वाली फसलें उन क्षेत्रों में भी उगाई जा रही हैं जहां जल संसाधन सीमित हैं। मुफ्त बिजली और सस्ते पानी की नीतियों ने कई क्षेत्रों में अनियंत्रित भूजल दोहन को बढ़ावा दिया है। जल का मूल्य शून्य समझे जाने के कारण उसका संरक्षण भी नहीं हो पा रहा। आवश्यकता इस बात की है कि कृषि नीति को जल उपलब्धता के अनुरूप बनाया जाए। जिन क्षेत्रों में पानी कम है, वहां मोटे अनाज, दालें, तिलहन तथा कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जल संकट केवल खेती तक सीमित नहीं है। उद्योगों, महानगरों और बढ़ते शहरी विस्तार ने भी भूजल पर अत्यधिक दबाव डाला है। बड़े-बड़े भवनों, कॉलोनियों और औद्योगिक क्षेत्रों में वर्षाजल सीधे नालों में बह जाता है। यदि प्रत्येक भवन में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से लागू हो जाए तो लाखों लीटर पानी हर वर्ष धरती के भीतर पहुंच सकता है। दुर्भाग्यवश अनेक राज्यों में कानून तो बने, लेकिन उनका प्रभावी पालन नहीं हो पाया।
जल संकट का एक और गंभीर पक्ष जल प्रदूषण है। देश की अधिकांश नदियां औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक कचरे और सीवेज के कारण प्रदूषित हो चुकी हैं। जब नदियों और तालाबों का जल उपयोग योग्य नहीं रहता तो भूजल पर दबाव और बढ़ जाता है। इसलिए जल संरक्षण के साथ-साथ जल स्रोतों की स्वच्छता भी समान रूप से आवश्यक है। नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी की जीवनरेखा है। यदि नदियां स्वस्थ रहेंगी तो भूजल भी समृद्ध होगा। आज आवश्यकता केवल नई परियोजनाओं की नहीं, बल्कि जल संस्कृति के पुनर्जागरण की है। भारत में कभी तालाब, बावड़ियां, जोहड़, कुंड और पारंपरिक जल संरचनाएं गांवों की पहचान होती थीं। वे वर्षा के जल को रोककर भूजल को समृद्ध बनाती थीं। आधुनिक विकास की दौड़ में इन जल स्रोतों को या तो नष्ट कर दिया गया या अतिक्रमण का शिकार बना दिया गया। यदि इन पारंपरिक जल प्रणालियों का पुनर्जीवन किया जाए तो जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
जल संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। घरों में पानी की अनावश्यक बर्बादी रोकना, वर्षाजल संचयन अपनाना, रिसाव ठीक कराना, कम पानी वाले उपकरणों का उपयोग करना और बच्चों में जल संरक्षण के संस्कार विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। यदि प्रत्येक परिवार प्रतिदिन कुछ लीटर पानी भी बचाए तो राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों लीटर जल की बचत संभव है। सरकार को भी जल प्रबंधन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। प्रत्येक जिले के लिए भूजल बजट तैयार किया जाए, भूजल दोहन पर वैज्ञानिक नियंत्रण हो, सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों-ड्रिप और स्प्रिंकलर-को व्यापक प्रोत्साहन मिले तथा ऐसे कृषि अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए जो कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली किस्में विकसित करे। साथ ही जल शिक्षा को विद्यालयों के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी जल के महत्व को केवल पुस्तकों में नहीं, व्यवहार में भी समझ सके।
भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हमारे पास आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्याप्त जल बचेगा? यदि आज भी हमने जल को केवल उपभोग की वस्तु समझा तो आने वाले वर्षों में जल के लिए संघर्ष, पलायन और सामाजिक असंतोष बढ़ना स्वाभाविक होगा। खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा, महंगाई बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट आएगा। इसलिए जल संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक शांति का भी प्रश्न है। आज समय की पुकार है कि ‘जल बचाना ही भविष्य बचाना है।’ हमें बदलती जलवायु के अनुरूप अपनी नीतियों, कृषि प्रणाली और जीवनशैली में व्यापक परिवर्तन लाने होंगे। वर्षा की प्रत्येक बूंद को धरती में उतारना, जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना और जल अनुशासन को जन-आंदोलन बनाना ही इस संकट का सबसे प्रभावी समाधान है। यदि सरकार, वैज्ञानिक, किसान, उद्योग, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर इस दिशा में संकल्पबद्ध प्रयास करें तो जल संकट को अवसर में बदला जा सकता है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करना मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विवशता बन जाएगा।





