अशोक भाटिया
देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक घमासान का केंद्र बन गया है। हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान जो कुछ भी देखने को मिला, उसने देश के जागरूक नागरिकों, सुरक्षा एजेंसियों और विचारकों को गहरे चिंता में डाल दिया है। किसी भी जीवंत लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असहमति और विरोध प्रदर्शन जनता का मौलिक अधिकार हैं। भारतीय संविधान ने नागरिकों को अपनी मांगों के लिए आवाज उठाने की स्वतंत्रता दी है, लेकिन जब इस स्वतंत्रता की आड़ में अराजकता का नग्न नृत्य होने लगे, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। CJP के हालिया आंदोलन में जिस तरह से सुरक्षा बलों पर पथराव हुआ, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और दो सहायक पुलिस आयुक्तों सहित छह पुलिसकर्मियों को लहूलुहान किया गया, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि प्रदर्शन अब अपनी मूल दिशा और वैचारिक मर्यादा से पूरी तरह भटक चुका है। इस घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू दिल्ली पुलिस और स्वयं आंदोलन के आयोजकों का यह साझा दावा है कि इस पूरे प्रदर्शन पर ‘बाहरी असामाजिक तत्वों’ ने कब्जा कर लिया है।
जब आयोजक खुद यह स्वीकार करने लगें कि उनका आंदोलन उनके नियंत्रण से बाहर हो चुका है और कुछ उपद्रवी तत्वों ने इसे हाईजैक कर लिया है, तो यह देश की आंतरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में यह एक बहुत ही खतरनाक और सोची-समझी परिपाटी बन चुकी है। कोई भी जायज या नाजायज मांग लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन अंततः देशविरोधी, अराजक या विशुद्ध रूप से उपद्रवी तत्वों का चारागाह बन जाता है। आंदोलन चाहे छात्रों का हो, किसानों का हो, या किसी राजनीतिक दल का, उसके मंचों और भीड़ में कुछ ऐसे चेहरे दाखिल हो जाते हैं जिनका आंदोलन के मूल एजेंडे से कोई सरोकार नहीं होता। उनका एकमात्र उद्देश्य भीड़ की आड़ लेकर हिंसा को भड़काना, कानून-व्यवस्था को पंगु बनाना और सरकार के खिलाफ एक हिंसक नैरेटिव तैयार करना होता है। CJP के प्रदर्शन में भी यही रणनीति साफ दिखाई दी, जहां शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने आए आम कार्यकर्ताओं को पीछे धकेलकर पथराव करने वाले चेहरों को आगे कर दिया गया।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पुलिस या सुरक्षा बल किसी दल विशेष के नहीं, बल्कि देश के कानून और व्यवस्था के रक्षक होते हैं। जंतर-मंतर पर तैनात पुलिसकर्मी वहां किसी का दमन करने नहीं, बल्कि राजधानी की सुरक्षा और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मुस्तैद थे। उन पर सोचे-समझे ढंग से पत्थरों और लाठियों से हमला करना केवल ड्यूटी पर तैनात जवानों पर हमला नहीं है, बल्कि यह देश के कानून के इकबाल को खुली चुनौती है। जब उपद्रवी तत्व कानून लागू करने वाली एजेंसियों के अधिकारियों को निशाना बनाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि उनका मकसद अपनी मांगें मनवाना नहीं, बल्कि अराजकता फैलाकर राज्य की व्यवस्था को पंगु बनाना है। दिल्ली पुलिस द्वारा इस मामले में 10 से अधिक एफआईआर दर्ज करना यह दिखाता है कि स्थिति कितनी गंभीर और अनियंत्रित हो चुकी थी। सुरक्षा बलों को आत्मरक्षा और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और लाठीचार्ज जैसे सख्त कदम उठाने पड़े, जिसे आयोजकों ने भले ही “अमानवीय” करार दिया हो, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यदि समय रहते बल प्रयोग न किया जाता तो राजधानी एक बड़ी त्रासदी का गवाह बन सकती थी।
इस पूरे घटनाक्रम में CJP और आंदोलन के शीर्ष नेतृत्व की भूमिका और जवाबदेही पर भी बड़े सवालिया निशान खड़े होते हैं। यह तर्क बेहद खोखला और गैर-जिम्मेदाराना है कि “उपद्रवी हमारे नियंत्रण से बाहर थे” या “वे हमारे लोग नहीं थे।” जब आप किसी बड़े प्रदर्शन का आह्वान करते हैं और हजारों की भीड़ को एक जगह इकट्ठा होने का आमंत्रण देते हैं, तो उस भीड़ के आचरण की प्राथमिक जिम्मेदारी आपकी होती है। आयोजक केवल तालियां बटोरने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए मंच पर नहीं बैठ सकते; उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बैनर तले कोई असामाजिक तत्व देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ न करे। यदि आंदोलन में कोई ‘बाहरी तत्व’ घुस आया था, तो आयोजकों ने स्वयं उन्हें पकड़कर पुलिस के हवाले क्यों नहीं किया? उन्होंने समय रहते मंच से ऐसे तत्वों की निंदा क्यों नहीं की और अपने शांतिप्रिय कार्यकर्ताओं को उनसे अलग क्यों नहीं किया? हिंसा भड़क जाने के बाद खुद को पीड़ित दिखाना और पुलिसिया कार्रवाई को अमानवीय बताना एक पुरानी और घिसी-पिटी राजनीतिक पटकथा का हिस्सा मात्र है, जिसे अब देश की जनता भली-भांति समझने लगी है।
आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के युग में कोई भी स्थानीय आंदोलन सिर्फ एक शहर या देश तक सीमित नहीं रहता। जंतर-मंतर जैसी संवेदनशील जगहों पर होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना को वैश्विक स्तर पर मॉनिटर किया जाता है। भारत की बढ़ती वैश्विक साख और मजबूत अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के लिए कई ऐसी ताकतें सक्रिय हैं जो देश के भीतर अशांति का माहौल देखना चाहती हैं। ऐसी विदेशी और देशविरोधी ताकतों के लिए स्थानीय राजनीतिक दलों के प्रदर्शन सबसे आसान माध्यम बनते हैं। इन प्रदर्शनों में घुसपैठ करने वाले असामाजिक तत्वों को अक्सर पीछे से फंडिंग और रणनीतिक समर्थन प्राप्त होता है। उनका लक्ष्य दिल्ली की सड़कों पर खून-खराबा, आगजनी और आंसू गैस के गोले चलते हुए दिखाना होता है ताकि दुनिया भर में भारत की छवि एक ‘अशांत और अस्थिर राष्ट्र’ के रूप में पेश की जा सके। CJP के आंदोलन में जिस तरह अचानक और संगठित रूप से पत्थरबाजी शुरू हुई, वह किसी तात्कालिक गुस्से का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और पहले से तैयार की गई स्क्रिप्ट का हिस्सा प्रतीत होती है।
भारतीय राजनीति का यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है कि राजनीतिक दल सत्ता में रहते हुए कानून-व्यवस्था की दुहाई देते हैं, लेकिन विपक्ष में आते ही वे हर तरह के उपद्रव और अराजकता को ‘जनता का आक्रोश’ बताकर जायज ठहराने लगते हैं। CJP के इस प्रदर्शन में भी विपक्ष के कई बड़े चेहरों की मौन सहमति या परोक्ष समर्थन की बू आती है। जब तक राजनीतिक दल अपने संकुचित चुनावी फायदों के लिए असामाजिक तत्वों को संरक्षण देना बंद नहीं करेंगे, तब तक देश की सड़कों पर ऐसी हिंसक घटनाएं होती रहेंगी। यदि आज CJP के प्रदर्शन को असामाजिक तत्वों ने हाईजैक किया है, तो कल किसी अन्य दल के आंदोलन के साथ भी यही होगा। इसलिए, सभी राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक सुर में यह तय करना होगा कि वे किसी भी हिंसक तत्व को अपने मंच का इस्तेमाल नहीं करने देंगे।
इस असाध्य बीमारी का इलाज केवल पुलिस की लाठियों या एफआईआर से संभव नहीं है। इसके लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जैसे भविष्य में ऐसे किसी भी बड़े प्रदर्शन की अनुमति देने से पहले आयोजकों से एक लिखित हलफनामा लिया जाना चाहिए। यदि आंदोलन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है या हिंसा होती है, तो उसका पूरा हर्जाना आयोजकों की संपत्ति जब्त करके वसूल किया जाना चाहिए।जंतर-मंतर और दिल्ली के अन्य प्रदर्शन स्थलों पर अत्याधुनिक फेशियल रिकग्निशन कैमरे और ड्रोन तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होना चाहिए, ताकि भीड़ में छिपे पेशेवर अपराधियों और उपद्रवियों की पहचान वास्तविक समय में की जा सके। किसी भी संगठन को प्रदर्शन की अनुमति तभी मिलनी चाहिए जब उनके पास भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अपने स्वयं के प्रशिक्षित वॉलेंटियर्स की एक मजबूत टीम हो, जो बाहरी तत्वों को तुरंत पहचान कर बाहर कर सके।
जंतर-मंतर की इस घटना ने एक बार फिर देश को आत्मचिंतन के मोड़ पर खड़ा कर दिया है। असहमति का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन अराजकता लोकतंत्र की हत्यारी है। CJP के प्रदर्शन पर बाहरी और असामाजिक तत्वों का यह कब्जा इस बात का प्रमाण है कि यदि हम अब भी नहीं संभले, तो देश के जायज आंदोलनों से जनता का विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। सरकार, न्यायपालिका, सुरक्षा एजेंसियों और देश के सभी जिम्मेदार राजनीतिक दलों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध प्रदर्शनों के नाम पर राजधानी की सड़कों को बंधक बनाने और सुरक्षा बलों के खून से होली खेलने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती। लोकतंत्र की गरिमा और देश की कानून-व्यवस्था की रक्षा हर राजनीतिक दल के एजेंडे से ऊपर और सर्वोपरि होनी चाहिए।





