पेट्रोल बचा, पर कीमत कौन चुका रहा है?

Petrol was saved, but who is paying the price?

एथेनॉल से विदेशी मुद्रा की बचत के साथ मक्का, पानी, खाद्य सुरक्षा, कृषि अनुदान के साथ ही किसान और पर्यावरण पर बढ़ते दबाव का भी होना चाहिए वास्तविक राष्ट्रीय आकलन।

डॉ. राजाराम त्रिपाठी

  • शुद्ध विदेशी मुद्रा बचत: एथेनॉल से वास्तविक पेट्रोलियम प्रतिस्थापन और सभी संबंधित लागतों के बाद हुई शुद्ध बचत का आकलन हो।
  • खाद्य सुरक्षा बनाम ईंधन: मक्का, गन्ना और चावल के भूमि-जल उपयोग तथा दालों और खाद्य तेलों पर पड़ने वाले प्रभाव की गणना हो।
  • किसान, पानी और पर्यावरण: किसान की वास्तविक शुद्ध आय के साथ जल, सब्सिडी और पर्यावरणीय क्षति की लागत भी जोड़ी जाए।
  • राष्ट्रीय लागत-लाभ श्वेतपत्र: सरकार एथेनॉल नीति की पूरी सामाजिक, कृषि, आर्थिक और पर्यावरणीय लागत का स्वतंत्र ‘National Cost-Benefit White Paper’ जारी करे।

भारत ने निर्धारित समय से पहले पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E20 का लक्ष्य हासिल कर लिया है। सरकार के अनुसार, इससे लगभग ₹1.67 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत हुई, किसानों को ₹1.45 लाख करोड़ से अधिक का भुगतान मिला और देश की पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम हुई। निस्संदेह, ये उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं और इनका स्वागत किया जाना चाहिए।
लेकिन किसी भी राष्ट्रीय नीति का मूल्यांकन केवल उसके सकल लाभ से नहीं हो सकता। असली प्रश्न यह है कि उस लाभ को प्राप्त करने में देश ने कुल कितनी कीमत चुकाई?
यही वह प्रश्न है जिस पर अब गंभीर और निष्पक्ष राष्ट्रीय बहस आवश्यक है। यह लेख एथेनॉल के विरोध में नहीं है और न किसी सरकार की आलोचना मात्र इसका उद्देश्य है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम एथेनॉल नीति की सकल बचत (Gross Saving) गिन रहे हैं, या उसके सामने खड़ी कुल राष्ट्रीय लागत (Total National Cost) को भी जोड़ रहे हैं?

अर्थशास्त्र का एक सामान्य सिद्धांत है कि किसी उत्पाद की वास्तविक लागत फैक्ट्री के गेट से नहीं, उसके स्रोत से शुरू होती है। यदि एथेनॉल गन्ने, मक्का या चावल से बन रहा है, तो केवल डिस्टिलरी में उसकी उत्पादन लागत को देखना पर्याप्त नहीं है। उस फसल पर मिलने वाली उर्वरक सब्सिडी, सिंचाई, कृषि बिजली, रियायती ऋण, समर्थन मूल्य व्यवस्था, परिवहन, भंडारण, जल उपयोग, भूमि उपयोग और पर्यावरणीय क्षति भी उसकी वास्तविक राष्ट्रीय लागत का हिस्सा हैं। भारत में दुर्भाग्य से एक विचित्र आर्थिक परंपरा विकसित हो गई है। उपलब्धियों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिना और गिनाया जाता है और उनकी छिपी हुई लागत बजट की अलग-अलग मदों में बिखर जाती है। फिर कोई यह नहीं जोड़ता कि एक क्षेत्र में हुई बचत के लिए दूसरे क्षेत्र ने कितना भुगतान किया।

पेट्रोल में 20 प्रतिशत मिश्रण, तो क्या पेट्रोलियम आयात भी 20 प्रतिशत कम हुआ?
यहीं एथेनॉल बहस का पहला महत्वपूर्ण आर्थिक प्रश्न सामने आता है।
20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का अर्थ यह नहीं है कि पेट्रोलियम की ऊर्जा आवश्यकता भी 20 प्रतिशत घट गई। एथेनॉल की ऊर्जा-सघनता पेट्रोल से कम होती है। इसलिए वॉल्यूम के आधार पर 20 प्रतिशत मिश्रण और ऊर्जा के आधार पर 20 प्रतिशत पेट्रोलियम प्रतिस्थापन एक ही बात नहीं है।

अर्थात हमें केवल यह नहीं बताना चाहिए कि पेट्रोल में कितना एथेनॉल मिलाया गया, बल्कि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कितनी पेट्रोलियम ऊर्जा प्रतिस्थापित हुई और उससे कितनी विदेशी मुद्रा की शुद्ध बचत हुई।

वाहनों की ईंधन दक्षता में होने वाले परिवर्तन को भी इस गणना में शामिल किया जाना चाहिए। यदि E20 के कारण वाहन को समान दूरी के लिए अधिक ईंधन की आवश्यकता होती है, तो उस अतिरिक्त खपत की आर्थिक कीमत भी राष्ट्रीय लागत-लाभ गणना का हिस्सा होनी चाहिए।
ऊर्जा सुरक्षा का सही पैमाना प्रतिशत मिश्रण नहीं, बल्कि नेट पेट्रोलियम प्रतिस्थापन होना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि एक आयात घटाकर दूसरे आयात बढ़ा रहे हैं?

अब इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण तथा चिंताजनक कृषि पक्ष सामने आता है। मक्का केवल एथेनॉल का कच्चा माल नहीं है। वह पशु आहार, पोल्ट्री उद्योग, स्टार्च उद्योग और खाद्य श्रृंखला का भी महत्वपूर्ण आधार है। यदि मक्का का बड़ा हिस्सा डिस्टिलरियों की ओर चला जाता है, तो बाजार में उसकी उपलब्धता और कीमत पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। उत्पादन बढ़ने के बावजूद यदि कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा मक्का की ओर मोड़ दिया जाए, तो सवाल यह है कि उस भूमि पर पहले कौन सी फसलें पैदा होती थीं?

यही वह बिंदु है जिसे राष्ट्रीय एथेनॉल नीति में अधिक गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।

यदि एथेनॉल के लिए मक्का की मांग बढ़ती है और उसके परिणामस्वरूप दालों, तिलहनों या अन्य खाद्य फसलों का क्षेत्र घटता है, तो एक ओर हम पेट्रोलियम आयात कम कर रहे होंगे और दूसरी ओर खाद्य तेल तथा दालों का आयात बढ़ा रहे होंगे।

यह कैसी आत्मनिर्भरता होगी जिसमें पेट्रोलियम का एक हिस्सा बचाने के लिए खाद्य पदार्थों के आयात पर विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़े?
हाल के वर्षों में भारत के दाल और खाद्य तेल आयात के आंकड़े इस प्रश्न को और गंभीर बनाते हैं। यदि एथेनॉल नीति के कारण कृषि भूमि का उपयोग बदल रहा है, तो नीति मूल्यांकन में इसका पूरा Opportunity Cost जोड़ा जाना चाहिए।

एक हेक्टेयर भूमि पर मक्का उगाने से जो आर्थिक लाभ मिलता है, उसकी तुलना उस भूमि पर दाल, तिलहन अथवा अन्य फसल उगाने से मिलने वाले राष्ट्रीय लाभ से भी होनी चाहिए।

मक्का केवल खेत की फसल नहीं, खाद्य और पशु आहार की अर्थव्यवस्था भी है
मक्का को एथेनॉल उद्योग में भेजने के बाद डिस्टिलरी से DDGS यानी Distillers Dried Grains with Solubles जैसे उप-उत्पाद प्राप्त होते हैं, जिन्हें पशु आहार में इस्तेमाल किया जा सकता है।

लेकिन यहां भी अर्थशास्त्र को थोड़ा और गहराई से देखने की आवश्यकता है।

यदि DDGS का उपयोग पशु आहार में बढ़ता है, तो वह घरेलू मक्का, सोयाबीन और अन्य पारंपरिक फीड संसाधनों के बाजार को प्रभावित करेगा। यदि एक ओर एथेनॉल उद्योग मक्का खरीदकर कीमत बढ़ाता है और दूसरी ओर पशुपालक तथा पोल्ट्री उद्योग महंगे आहार का सामना करते हैं, तो एथेनॉल नीति का प्रभाव केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता।

उसका असर दूध, अंडे, मांस और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों तक पहुंच सकता है।

इसलिए एथेनॉल की वास्तविक आर्थिक सफलता का मूल्यांकन करते समय किसान से लेकर उपभोक्ता और वाहन से लेकर पशुपालक तक पूरी मूल्य श्रृंखला को देखना होगा।

एक और विचित्र स्थिति: ईंधन एथेनॉल बढ़ा, औद्योगिक एथेनॉल घटा। एथेनॉल नीति का एक कम चर्चित पक्ष औद्योगिक एथेनॉल की उपलब्धता है।

फार्मास्यूटिकल, रासायनिक तथा अन्य औद्योगिक क्षेत्रों को भी एथेनॉल की आवश्यकता होती है। यदि डिस्टिलरियां बेहतर कीमत और सुनिश्चित खरीद के कारण अपना उत्पादन मुख्यतः पेट्रोल मिश्रण के लिए भेजती हैं, तो औद्योगिक उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

ऐसी स्थिति में घरेलू औद्योगिक एथेनॉल उत्पादन घटे और उसकी जगह आयात बढ़े, तो यह एक विचित्र आर्थिक स्थिति होगी। एक तरफ हम पेट्रोल में मिलाने के लिए घरेलू एथेनॉल का उत्पादन बढ़ा रहे हों और दूसरी तरफ उद्योगों की आवश्यकता पूरी करने के लिए एथेनॉल आयात कर रहे हों।

इसलिए सरकार को यह भी बताना चाहिए कि E20 कार्यक्रम के बाद ईंधन एथेनॉल और औद्योगिक एथेनॉल के बीच संसाधनों का कितना पुनर्वितरण हुआ है और उसका औद्योगिक उत्पादन पर क्या प्रभाव पड़ा है।

एथेनॉल की असली कीमत केवल गन्ने या मक्के की कीमत नहीं है,,
जल संकट भारत की सबसे बड़ी भविष्य की चुनौतियों में से एक है। जबकि गन्ना अत्यधिक सिंचाई वाली फसल है और मक्का भी कई क्षेत्रों में पर्याप्त जल की मांग करता है। यदि एथेनॉल की बढ़ती मांग के कारण इन फसलों का विस्तार ऐसे क्षेत्रों में होता है जहां पहले से भूजल संकट है, तो एथेनॉल की कीमत केवल डिस्टिलरी की उत्पादन लागत तक सीमित नहीं रह सकती।

उसमें भूजल का गिरता स्तर, सिंचाई बिजली की सब्सिडी, जल संरक्षण की लागत और भविष्य की जल-सुरक्षा का नुकसान भी शामिल होना चाहिए।

इसी प्रकार डिस्टिलरी में जल का उपयोग और उसके अपशिष्ट के उपचार की लागत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यदि एक लीटर एथेनॉल के लिए हजारों लीटर पानी की पूरी कृषि-श्रृंखला आवश्यकता पड़ती है, तो उस पानी का आर्थिक मूल्य क्या है? यदि वही फसल ऐसे क्षेत्र में उग रही है जहां भूजल पहले से तेजी से नीचे जा रहा है, तो उस जल-क्षति का मूल्य कौन चुकाएगा?

हम एथेनॉल की प्रति लीटर कीमत निकाल लेते हैं, लेकिन क्या हमने उसके पीछे खर्च हुए पानी की प्रति लीटर कीमत निकाली है?
किसान को लाभ हुआ है, लेकिन किस कीमत पर?

सरकार का यह दावा महत्वपूर्ण है कि एथेनॉल कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को बड़ी राशि का भुगतान हुआ। इससे गन्ना और मक्का उत्पादकों को निश्चित बाजार तथा अपेक्षाकृत सुनिश्चित मांग मिली है।

लेकिन कृषि-अर्थशास्त्र का प्रश्न इससे आगे जाता है।

किसान को अधिक कीमत मिलना तभी वास्तविक लाभ है जब उसकी उत्पादन लागत, जल लागत, भूमि लागत, उर्वरक लागत और वैकल्पिक फसल से मिलने वाली आय को भी तुलना में शामिल किया जाए।

यदि एथेनॉल उद्योग किसी फसल का सबसे बड़ा खरीदार बन जाता है, तो भविष्य में उस फसल की कीमत निर्धारित करने की शक्ति किसके हाथ में होगी? बाजार के, सरकार के या बड़े औद्योगिक खरीदारों के?

और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि किसी वर्ष देश में सूखा पड़ जाए, मक्का या गन्ने का उत्पादन घट जाए और खाद्यान्न की उपलब्धता संकट में आ जाए, तब प्राथमिकता किसे मिलेगी?

भारत की जनता की थाली को या वाहनों के टैंक को?

इस प्रश्न का उत्तर संकट आने के बाद नहीं, नीति बनाते समय ही तय होना चाहिए।

एथेनॉल के लिए खेती का विस्तार, लेकिन किस भूमि पर?

यदि एथेनॉल की मांग लगातार बढ़ती है तो मक्का, गन्ना और अन्य फीडस्टॉक फसलों के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता होगी।
यहां एक और प्रश्न है। क्या हम ऐसी भूमि का उपयोग कर रहे हैं जो पहले से खाद्य उत्पादन के लिए इस्तेमाल हो रही थी?

यदि हां, तो इसका प्रभाव खाद्य सुरक्षा पर होगा।

यदि नई भूमि पर खेती होती है, तो क्या वह वन क्षेत्र, चारागाह, जैव विविधता वाले क्षेत्र या जल-संवेदनशील क्षेत्र तो नहीं हैं?
इसलिए एथेनॉल नीति को केवल ऊर्जा नीति मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह कृषि नीति, जल नीति, खाद्य नीति, पर्यावरण नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई नीति है।

अमेरिका और ब्राजील से हमें क्या सीखना चाहिए?

दुनिया के प्रमुख जैव-ईंधन उत्पादक देशों ने यह समझ लिया है कि प्रथम पीढ़ी के खाद्य-फसल आधारित जैव-ईंधन की अपनी सीमाएं हैं।
भारत को भी धीरे-धीरे खाद्य फसलों पर निर्भरता कम करते हुए दूसरी पीढ़ी के जैव-ईंधन यानी 2G Ethanol की दिशा में अधिक तेजी से बढ़ना चाहिए।

धान का पुआल, गेहूं का भूसा, गन्ने की खोई, कृषि अवशेष, बांस और अन्य गैर-खाद्य जैव संसाधन भारत के लिए विशाल संभावनाएं रखते हैं।
हमारे खेतों में हर साल करोड़ों टन जैविक अवशेष पैदा होते हैं। इनमें से बड़ी मात्रा या तो जलाई जाती है या कम मूल्य पर नष्ट हो जाती है।
यदि उसी कृषि अवशेष को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाए, तो किसान को अतिरिक्त आय मिलेगी, प्रदूषण घटेगा और खाद्य फसलों को ईंधन के लिए मोड़ने की आवश्यकता भी कम होगी।

यही वास्तविक अर्थों में किसान हित, पर्यावरण हित और ऊर्जा सुरक्षा का त्रिकोण बन सकता है।

हमें एथेनॉल का नहीं, अधूरे हिसाब का विरोध करना चाहिए
एथेनॉल भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक उपयोगी साधन हो सकता है। लेकिन कोई भी साधन अपने आप में अंतिम समाधान नहीं होता।
यदि एथेनॉल के नाम पर पेट्रोलियम आयात का कुछ खर्च बचता है, लेकिन उसके बदले मक्का उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक भूमि और पानी लगता है, दालों और खाद्य तेलों का आयात बढ़ता है, औद्योगिक एथेनॉल की उपलब्धता प्रभावित होती है, किसानों को अधिक सब्सिडी देनी पड़ती है और पर्यावरणीय लागत बढ़ती है, तो इन सभी को एक ही आर्थिक गणना में रखना होगा।

हमें यह भी देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होने पर घरेलू एथेनॉल की लागत-प्रतिस्पर्धा कितनी रहती है। यदि किसी परिस्थिति में एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में महंगा पड़ता है, तो उस अंतर को कौन वहन करता है?

सरकार, तेल कंपनियां, उपभोक्ता या अंततः करदाता?
इसका उत्तर सार्वजनिक होना चाहिए।

अब समय है ‘राष्ट्रीय लागत-लाभ श्वेतपत्र’ का।

भारत सरकार को एथेनॉल कार्यक्रम पर एक स्वतंत्र और विस्तृत National Cost-Benefit White Paper जारी करना चाहिए।

इसमें केवल यह नहीं बताया जाना चाहिए कि कितनी विदेशी मुद्रा बची और किसानों को कितना भुगतान मिला। इसमें कम से कम निम्नलिखित बिंदुओं का स्पष्ट आर्थिक मूल्यांकन होना चाहिए:

1-वास्तविक पेट्रोलियम प्रतिस्थापन और शुद्ध विदेशी मुद्रा बचत।
2-एथेनॉल उत्पादन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सरकारी सहायता।
3-उर्वरक, सिंचाई, कृषि बिजली और रियायती ऋण की लागत।
4-मक्का, गन्ना और चावल की भूमि का वैकल्पिक उपयोग और उसका Opportunity Cost।
5-दालों और खाद्य तेलों के बढ़ते आयात पर एथेनॉल नीति का संभावित प्रभाव।
6-भूजल और सिंचाई जल की वास्तविक आर्थिक लागत।
7-डिस्टिलरी के अपशिष्ट और पर्यावरणीय प्रबंधन की लागत।
8-ईंधन एथेनॉल के कारण औद्योगिक एथेनॉल की उपलब्धता और आयात पर प्रभाव।
9-DDGS तथा अन्य उप-उत्पादों का पशुपालन और खाद्य महंगाई पर प्रभाव।
10-किसानों की वास्तविक शुद्ध आय, केवल सकल बिक्री नहीं।
11- 1G से 2G और कृषि-अवशेष आधारित जैव-ईंधन की ओर संक्रमण की समयबद्ध रणनीति।

यही वह पारदर्शिता है जिसकी आवश्यकता आज भारत को है।

क्योंकि किसी राष्ट्रीय नीति की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसने कितना कमाया या कितना बचाया। असली सफलता यह है कि उस बचत के लिए देश ने कुल कितना खर्च किया और उस खर्च का सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय परिणाम क्या रहा।
लोकतंत्र में नीति की सबसे बड़ी मित्र प्रशंसा नहीं, बल्कि पारदर्शी समीक्षा होती है। नीतियां तालियों से नहीं, तथ्यों से मजबूत होती हैं और प्रचार से नहीं, पारदर्शिता से विश्वसनीय बनती हैं।

भारत को एथेनॉल अवश्य चाहिए। लेकिन उससे भी अधिक चाहिए उसका पूरा हिसाब।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता तभी स्थायी होगी, जब उसके साथ खाद्य सुरक्षा, किसान का हित, जल संरक्षण, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और आर्थिक पारदर्शिता भी समान गति से आगे बढ़ें।

आखिरकार राष्ट्र का भविष्य किसी एक ईंधन से तय नहीं होता। वह उन नीतियों से तय होता है जिनका पूरा लेखा-जोखा सरकार जनता के सामने निस्संकोच रख सके।

एथेनॉल की सफलता का उत्सव मनाइए, लेकिन उसका पूरा हिसाब भी मांगिए। क्योंकि राष्ट्रीय बचत वही है, जिसके पीछे छिपी राष्ट्रीय लागत भी देश को मालूम हो।