मौत की इमारतें: कब थमेगा भ्रष्टाचार और लापरवाही का यह जानलेवा खेल?

Buildings of Death: When will this deadly game of corruption and negligence end?

अशोक भाटिया

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक पांच मंजिला इमारत का ताश के पत्तों की तरह ढह जाना और मलबे में दबकर छह बेगुनाह जिंदगियों का असमय खत्म हो जाना महज़ एक आकस्मिक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के महानगरीय विकास के खोखलेपन और प्रशासनिक तंत्र के सड़ चुके ढांचे की एक और खौफनाक बानगी है। हर ऐसे हादसे के बाद सरकारी अमला कुंभकर्णी नींद से जागता है, कुछ मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, एक जांच समिति का गठन कर दिया जाता है, और कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य मानकर फिर से उसी ढर्रे पर लौट आता है। लेकिन बुनियादी सवाल वहीं का वहीं खड़ा है कि आखिर कब तक देश के नागरिक चंद पैसों के भूखे बिल्डरों और भ्रष्ट अधिकारियों के इस जानलेवा गठजोड़ की वेदी पर अपनी जान की आहुति देते रहेंगे? आखिर कब तक हमारे शहरों में खड़ी अवैध और जर्जर इमारतें ‘मौत की इमारतें’ बनकर मासूमों को निगलती रहेंगी? सत्य निकेतन की वह इमारत, जिसे नगर निगम के दस्तावेजों में केवल दो मंजिलों की अनुमति मिली थी, वह कैसे अधिकारियों की नाक के नीचे पांच मंजिला कंक्रीट का टावर बन गई और कैसे उसमें सैकड़ों छात्रों को भेड़-बकरियों की तरह पीजी के रूप में रहने के लिए झोंक दिया गया, यह अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक अपराध है।

यह त्रासदी किसी एक शहर या एक खास इलाके की बानगी नहीं है, बल्कि आज पूरे भारत के महानगरों और तेजी से विकसित हो रहे शहरों की यही कड़वी और डरावनी हकीकत है। यदि हम देश के अन्य हिस्सों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि ‘मौत की इमारतों’ का यह जाल कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और उससे सटे ठाणे, कल्याण तथा मुंब्रा जैसे इलाकों का उदाहरण हमारे सामने है, जहां हर साल मॉनसून की पहली बारिश के साथ ही इमारतों के गिरने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मुंबई की पुरानी चालें और संकरी गलियों में खड़ी अवैध बहुमंजिला इमारतें दशकों से मौत का इंतजार कर रही हैं। वहां कानूनी पचड़ों, मकान मालिक और किराएदारों के विवादों और नगर निगम की ढीली कार्यप्रणाली के कारण सैकड़ों ऐसी इमारतें आज भी वैसी ही खड़ी हैं, जिन्हें बहुत पहले ही रहने के लिए असुरक्षित घोषित किया जा चुका है। लोग अपनी जान हथेली पर रखकर वहां रहने को मजबूर हैं क्योंकि महानगर की बेतहाशा महंगाई ने उन्हें विकल्पहीन बना दिया है।

इसी तरह, देश के सबसे आधुनिक और हाई-टेक शहरों में शुमार किए जाने वाले दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम और नोएडा जैसे इलाकों की स्थिति भी कोई बहुत बेहतर नहीं है। जहां एक तरफ गगनचुंबी सोसायटियां और शीशे की चमचमाती दीवारें प्रगति का ढोल पीटती हैं, वहीं दूसरी तरफ इनके भीतर का सच बेहद भयावह है। हाल के वर्षों में गुरुग्राम और नोएडा की कई पॉश सोसायटियों में निर्माण की बेहद घटिया गुणवत्ता के कारण कभी छतों के प्लास्टर गिर रहे हैं, तो कभी लिफ्ट शाफ्ट ढह रहे हैं, और कभी पूरी की पूरी बालकनी नीचे आ गिरती है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों से घिरे इन हाई-टेक शहरों में भी बिल्डर माफिया ने मुनाफाखोरी के चक्कर में इंसानी जान की कीमत को शून्य बना दिया है। रेरा जैसे कानूनों के आने के बावजूद, कागजी औपचारिकताओं को तो पूरा कर लिया जाता है, लेकिन धरातल पर जो कंक्रीट और लोहा इस्तेमाल हो रहा है, उसकी मजबूती पर हमेशा एक बड़ा सवालिया निशान लगा रहता है।

यदि हम दक्षिण भारत के प्रमुख तकनीकी केंद्र बेंगलुरु की बात करें, तो वहां का परिदृश्य और भी चिंताजनक है। बेंगलुरु जो कभी अपने बगीचों और शांत वातावरण के लिए जाना जाता था, आज अनियंत्रित कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुका है। वहां के कतिपय रिहायशी इलाकों में बिना किसी सॉयल टेस्टिंग (मिट्टी की जांच) के और बिना पर्याप्त पिलर या बेस फाउंडेशन के, रातों-रात चार से पांच मंजिला इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं। दलदली जमीनों और सूखे तालाबों के कैचमेंट एरिया पर बनी ये अवैध इमारतें अक्सर जरा सी बारिश या मामूली भू-धंसाव के कारण एक तरफ झुक जाती हैं, जिन्हें बाद में प्रशासन को आनन-फानन में ढहाना पड़ता है। आईटी हब की इस चकाचौंध के पीछे छिपा यह अंधाधुंध और गैर-कानूनी निर्माण किसी भी दिन एक बहुत बड़ी त्रासदी को आमंत्रण दे रहा है।

पूरब की ओर रुख करें, तो कोलकाता और चेन्नई जैसे ऐतिहासिक महानगरों में समस्या का एक दूसरा पहलू सामने आता है। यहां ‘विरासत’ और ‘पुराने कानूनी विवादों’ के नाम पर दशकों, बल्कि सदियों पुरानी जर्जर इमारतें खड़ी हैं, जिनके मालिक या तो देश छोड़कर जा चुके हैं या फिर किराएदारों के साथ दशकों से कोर्ट कचहरी के चक्कर काट रहे हैं। इन इमारतों की मरम्मत कराने वाला कोई नहीं है, और नगर निगम इन्हें केवल ‘खतरनाक’ का एक नोटिस चपकाकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेता है। जब ये इमारतें ढहती हैं और इनके मलबे में दबकर गरीब मजदूर या फुटपाथ पर सोने वाले लोग मरते हैं, तो फाइलें बंद कर दी जाती हैं।

इस पूरे संकट के मूल में जो सबसे बड़ी समस्या है, वह है बिल्डर-माफिया, स्थानीय प्रशासन और पुलिस का वह अपवित्र और अटूट त्रिकोण, जो हर अवैध निर्माण को संरक्षण देता है। कोई भी अवैध इमारत रातों-रात या छिपकर नहीं बनती। कंक्रीट के मिक्सर ट्रक, लोहे की छड़ें और दर्जनों मजदूर दिन-दहाड़े सड़क पर काम करते हैं। स्थानीय बीट कांस्टेबल से लेकर नगर निगम के जूनियर इंजीनियर और क्षेत्रीय अधिकारियों तक, सबको इस बात की पूरी जानकारी होती है कि कहां और किस नियम को तोड़ा जा रहा है। लेकिन रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार की जो व्यवस्था हमारे सिस्टम में नीचे से ऊपर तक पैठी हुई है, वह इन अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बांध देती है। जब तक इमारत बनकर खड़ी नहीं हो जाती और बिल्डर अपना मुनाफा कमाकर गायब नहीं हो जाता, तब तक प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है। और जब कोई सत्य निकेतन जैसा हादसा होता है, तो सारा ठीकरा प्राकृतिक आपदा या केवल मकान मालिक के सिर फोड़कर असली गुनाहगार अधिकारी साफ बच निकलते हैं।

इस जानलेवा सिलसिले को रोकने के लिए अब केवल कागजी कार्रवाई या निलंबन के नाटक से काम नहीं चलने वाला है। हमें एक बेहद कड़े, पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र की आवश्यकता है। सबसे पहले, देश के हर छोटे-बड़े शहर में तीस साल से अधिक पुरानी सभी इमारतों का एक अनिवार्य ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट’ होना चाहिए, और यह ऑडिट किसी स्वतंत्र और प्रतिष्ठित संस्था द्वारा किया जाना चाहिए न कि नगर निगम के भ्रष्ट इंजीनियरों द्वारा। जिन इमारतों का ढांचा कमजोर पाया जाए, उन्हें बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के तुरंत खाली कराया जाना चाहिए और उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए।

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह होना चाहिए कि भविष्य में जब भी कोई अवैध इमारत गिरे, तो केवल मकान मालिक या बिल्डर पर ही मुकदमा दर्ज न हो, बल्कि उस इलाके के नगर निगम अधिकारी, इंजीनियर और पुलिस अधिकारियों को भी सह-आरोपी बनाया जाना चाहिए। जब तक इन सफेदपोश और वर्दीधारी गुनहगारों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा और उनकी संपत्तियों को कुर्क नहीं किया जाएगा, तब तक कानून का खौफ पैदा नहीं होगा। भारतीय न्याय संहिता की गैर-इरादतन हत्या जैसी धाराओं का वास्तविक और कड़ा प्रयोग इन अधिकारियों पर होना चाहिए, जिन्होंने अपनी जेबें भरने के लिए सैकड़ों मासूमों की जिंदगी को खतरे में डाला।

इसके साथ ही, आज के इस आधुनिक युग में जब हमारे पास सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन तकनीक और जीआईएस मैपिंग जैसे उन्नत साधन मौजूद हैं, तो अवैध निर्माणों की निगरानी मानवीय भरोसे पर क्यों छोड़ी जाए? हर शहर के मास्टर प्लान को डिजिटल किया जाना चाहिए और किसी भी नए निर्माण या स्वीकृत नक्शे से इतर होने वाले बदलाव को ड्रोन कैमरों के जरिए ट्रैक किया जाना चाहिए। जैसे ही कोई अवैध मंजिल खड़ी हो, सिस्टम में ऑटोमैटिक अलर्ट जनरेट होना चाहिए ताकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म किया जा सके।

महानगरों की बढ़ती आबादी और जमीन की कमी निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इसका समाधान इंसानी जिंदगियों की कीमत पर कंक्रीट के अवैध डेथ-ट्रैप बनाना नहीं हो सकता। यदि हम अब भी नहीं संभले और सत्य निकेतन जैसी त्रासदियों से कोई सबक नहीं लिया, तो देश के कोने-कोने से ‘मौत की इमारतों’ के गिरने और चीख-पुकार उठने का यह सिलसिला कभी बंद नहीं होगा। विकास की ऊंची-ऊंची बातें तब तक बेमानी हैं, जब तक कि हम अपने नागरिकों को एक सुरक्षित छत और एक सुरक्षित जीवन देने की बुनियादी गारंटी नहीं दे सकते। यह समय खोखली संवेदनाओं का नहीं, बल्कि व्यवस्था की इस सड़न पर एक कड़ा और अंतिम प्रहार करने का है।