अजय कुमार
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल भाजपा नहीं, अपनी राजनीतिक हैसियत का भ्रम है। पार्टी अभी संगठन खड़ा करने की स्थिति में है, लेकिन चर्चा सीटों की ऐसी दावेदारी की हो रही है, जैसे प्रदेश की राजनीति में उसका स्वतंत्र जनाधार निर्णायक हो। प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनावी तैयारी और समाजवादी पार्टी से तालमेल की जिम्मेदारी देना इसी विरोधाभास को उजागर करता है। सवाल सीधा है, प्रियंका कांग्रेस को अपने पैरों पर खड़ा करेंगी या अखिलेश यादव के सामने पार्टी की कमजोरियों का हिसाब लेकर जाएंगी? तीन नवंबर को प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर संगठन, चुनावी समितियों, प्रचार और सपा के साथ सीट बंटवारे पर चर्चा की। दिवाली के बाद बातचीत आगे बढ़ाने की बात कही गई है। बीस नवंबर के बाद ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर प्रदेश में रैलियां करने की तैयारी भी है। लेकिन अभी सीटों का कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है और रैलियों के स्थान-तारीख भी तय नहीं हैं। यानी कांग्रेस के पास फिलहाल तैयारी की घोषणा है, चुनावी ताकत का प्रमाण नहीं। प्रियंका की वापसी को कांग्रेस का तुरुप का इक्का बताने वाले 2019 और 2022 का हिसाब क्यों भूल जाते हैं? 2019 में उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई थी। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस राज्य की 80 लोकसभा सीटों में सिर्फ रायबरेली बचा पाई और अमेठी में राहुल गांधी तक हार गए। 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका ने महिला-केंद्रित अभियान चलाया, ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का नारा दिया और लगातार प्रचार किया। फिर भी कांग्रेस 403 में से केवल दो सीटें जीत सकी। उसका वोट हिस्सा 2.33 प्रतिशत पर सिमट गया।
कांग्रेस के समर्थक 2024 के लोकसभा चुनाव को अपनी वापसी का प्रमाण बताते हैं। उत्तर प्रदेश में पार्टी ने सपा के साथ 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और छह जीतीं। सपा ने 62 सीटों पर लड़कर 37 सीटें हासिल कीं। कांग्रेस का वोट हिस्सा करीब 9.5 प्रतिशत रहा। लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे और गठबंधन की लहर काम करती है; विधानसभा में हर सीट पर स्थानीय चेहरा, जातीय समीकरण, बूथ प्रबंधन और वर्षों का संपर्क निर्णायक होता है। अखिलेश यादव की राजनीतिक स्थिति कांग्रेस से कहीं मजबूत है। 2022 में सपा ने 111 सीटें जीती थीं और 32.06 प्रतिशत वोट पाए थे। कांग्रेस दो सीटों पर सिमटी थी। 2024 में सपा 37 लोकसभा सीटें जीतकर प्रदेश में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी। ऐसे में अखिलेश कांग्रेस को साथ रख सकते हैं, लेकिन उसे अपनी शर्तों पर जगह देंगे, यह मानकर चलना ज्यादा यथार्थवादी है। कांग्रेस की कथित 175 सीटों की सूची और 125 सीटों की शुरुआती महत्वाकांक्षा पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जीतने की क्षमता का पैमाना क्या है? 2024 के लोकसभा नतीजों के विधानसभा-खंडवार विश्लेषण में कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में आगे और कई में दूसरे स्थान पर रही। लेकिन दूसरे नंबर पर होना जीत की तैयारी नहीं है। हर सीट पर बूथवार आंकड़े, पिछले विधानसभा परिणाम, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और सपा के संगठन की मौजूदगी देखे बिना दावा करना राजनीतिक गणित नहीं, मोलभाव की ऊंची बोली है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान, जाट, मुस्लिम और स्थानीय नेतृत्व के समीकरण अलग हैं। अवध में सपा का पुराना नेटवर्क कांग्रेस की दावेदारी को चुनौती देगा। बुंदेलखंड में कांग्रेस को पहले कार्यकर्ता और प्रभावशाली उम्मीदवार खोजने होंगे। पूर्वांचल में जातीय गोलबंदी, स्थानीय क्षत्रप और भाजपा का संगठन चुनाव को कठिन बनाएंगे। पार्टी के पास चेहरे, मुद्दे, बूथ प्रभारी और चुनाव के दिन मतदाता को मतदान केंद्र तक लाने वाली मशीनरी होनी चाहिए। कांग्रेस की असली कमजोरी यही है। जिला इकाइयां कितनी सक्रिय हैं? कितने विधानसभा क्षेत्रों में उसके पास ऐसा नेता है, जो अपने दम पर मुकाबला कर सके? कितने बूथों पर प्रशिक्षित कार्यकर्ता मौजूद हैं? कितने पुराने नेता पार्टी के लिए जमीन पर काम कर रहे हैं और कितने केवल टिकट की प्रतीक्षा में हैं? इन सवालों का जवाब दिए बिना प्रियंका की बैठकें तस्वीरें तो बना सकती हैं, चुनावी ढांचा नहीं। गुटबाजी, निष्क्रियता और टिकट के लिए खींचतान पर लगाम लगाना किसी भी रैली से ज्यादा जरूरी है। 2017 का अनुभव भी चेतावनी देता है। सपा-कांग्रेस गठबंधन ने बड़े प्रचार और साझा नारे के साथ चुनाव लड़ा था, लेकिन सपा 47 और कांग्रेस सात सीटों पर सिमट गई। 2027 में भी अगर दोनों दलों के समर्थक एक-दूसरे के उम्मीदवार को अपना उम्मीदवार नहीं मानेंगे, तो भाजपा को विपक्ष की आपसी खींचतान का सीधा लाभ मिलेगा। भाजपा को केवल सत्ता-विरोधी नारों से नहीं हराया जा सकता। 2022 में उसने 255 सीटें और 41.29 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। उसके पास बूथ स्तर तक फैला संगठन, संसाधन, नेतृत्व और सत्ता का लाभ है। कांग्रेस और सपा को बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती परीक्षाओं, किसानों, महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ठोस विकल्प देना होगा। ‘वोट चोरी’ का आरोप राजनीतिक मुद्दा बन सकता है, लेकिन मतदाता यह भी पूछेगा कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव का रास्ता क्या है।
प्रियंका के सामने इसलिए दोहरी परीक्षा है। उन्हें कांग्रेस के भीतर अनुशासन और संगठन पैदा करना है, साथ ही अखिलेश के सामने ऐसी सीटों का दावा रखना है, जिन पर जीतने की वास्तविक संभावना हो। अगर कांग्रेस अपनी ताकत से ज्यादा सीटें मांगती है, तो बातचीत टकराव में बदल सकती है। अगर बिना लड़े पीछे हटती है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल और पार्टी की पहचान दोनों कमजोर होंगे। सही रास्ता है सीटों की संख्या नहीं, जीतने योग्य सीटों का ठोस और पारदर्शी हिसाब। यही सबसे कठिन राजनीतिक कसौटी है। प्रियंका गांधी को यह भी तय करना होगा कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाएगी या हर चुनाव में गठबंधन की छतरी तलाशेगी। 2024 ने दिखाया कि सपा के साथ आने से कांग्रेस को राहत मिली; लेकिन राहत और राजनीतिक पुनर्जीवन एक बात नहीं हैं। राहुल गांधी ने प्रियंका को जिम्मेदारी देकर कांग्रेस की उम्मीदें उनके कंधों पर रख दी हैं। अब उन्हें भाषणों और बैठकों से आगे बढ़कर बूथ, उम्मीदवार और संगठन की कठोर परीक्षा देनी होगी। अखिलेश यादव भी भावनाओं से नहीं, चुनावी लाभ से फैसला करेंगे। 2027 में कांग्रेस की असली हैसियत इस बात से तय नहीं होगी कि वह कितनी सीटें मांगती है, बल्कि इससे होगी कि कितनी सीटों पर भाजपा और सपा दोनों को चुनौती देने की ताकत रखती है। वरना प्रियंका की कमान के बावजूद कांग्रेस एक बार फिर अपनी राजनीति नहीं, अपनी मजबूरी का सौदा करती दिखाई देगी।





