नरेंद्र तिवारी
भारत अपनी स्वतंत्रता की वर्षगाँठ बना रहा है। यह अवसर देश के गौरवगान के साथ यह याद रखने का भी है की आजादी अनगिनत बलिदानों, संघर्षो और लम्बी चली लड़ाई के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुई है। इसकी रक्षा हर भारतीय नागरिक का पहला दायित्व होना चाहिए। 15 अगस्त आजादी का वह पुनीत अवसर है, ज़ब हम भारतीय अंग्रेजों की 200 वर्ष की गुलामी से आजाद हुए। गोरे अंग्रेज जिन्होंने भारत की पूज्य धरा के संसाधनों का दोहन किया। जिन्होंने आम भारतीय नागरिकों की खाल उधेड़कर राजस्व उगाही की प्रक्रिया को बरसो तक जारी रखा, अंग्रेजो के अनाचार एवं अत्याचार के परिणाम स्वरूप भारतीय जनमानस आंदोलित होने लगा, अंग्रेजों के प्रति आक्रोश की यह ज्वाला सन 1857 में भड़की ज़ब एनफील्ड राइफल के कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी होने की अफवाह फैली 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में मंगल पांडे ने इसी मुद्दे पर विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। किन्तु इस विद्रोह को एक मात्र कारण तक सिमित नहीं किया जा सकता है। इस क्रांति के पीछे अनेकों तात्कालिक राजनितिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारण भी रहे है। इस क्रांति के बाद अंग्रेजों के खिलाफ छुटपुट आंदोलन चलते रहे किन्तु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद आजादी के आंदोलन में गति आई जिसमे दादा भाई नौरोजी और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेताओं ने शांतिपूर्ण और संवेधानिक तरीको से सुधार की मांग की इतिहास इसे नरमपंथी चरण 1905 से 1919 तक मानता है, इसके बाद अगला चरण लाल, बाल और पाल के रूप में जाना है जिसमे स्वराज्य की मांग को बढ़ावा दिया गया। मोहन दास करमचंद गांधी के पदार्पण के बाद याने 1919 दे 1947 तक के कालखंड को गांधीवादी युग की संज्ञा दी गयी है। इस दौरान असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और फिर भारत छोड़ो आंदोलन जैसे विशाल जन आंदोलनों ने अंग्रेजो को भारत छोड़ने पर मजबूर किया गया। आजादी की प्राप्ति के लिए सुभाष चंद्र बोस, भगत सिँह, चंद्र शेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। आजादी बेशकीमती और बहुमूल्य है, इसमें हजारों भारतीयों के बलिदान शामिल है।
अब ज़ब हम अंग्रेजों की 200 बरसो की गुलामी से आजाद हुए, अपने संविधान से शासित होने लगे, स्वतन्त्रता का सूरज अपने प्रकाश फैलाने लगा, 26 नवम्बर 1949 को अपनाए गए संविधान के प्रावधानों के तहत चुनाव कराए गए। अब देश में भारत की सरकार कार्यरत थी। शुरुवाती दौर में स्वतन्त्रता आंदोलन से निकले नेताओं ने भारत के निर्माण में पारदर्शिता रखी। भारत के नागरिकों के जीवन स्तर को उठाने की कोशिशे की गयी। देश के नागरिकों के जीवन स्तर को उठाने के प्रयास स्वतंत्रता के 8 दशक बीतने के बाद भी जारी है। यह आगे भी जारी रहेंगे, किन्तु देश की राजनीति में बीते 40-50 सालों में राजनितिक पारदर्शिता का आभाव देखा जा रहा है। सत्ता देश की भलाई से अधिक कमाई का साधन हो गयी है, मूल्य धाराशाही हो गए। जन प्रतिनिधियों और नौकरशाहों की जुगलबंदी के फ्लस्वरूप आर्थिक अनियमितता के किस्से गाँव-गाँव, शहर-शहर देश प्रदेश की राजधानीयों में देखें सुने जाने लगे। चुनावी सफलता सबसे बड़ी ताकत हो गयी, संघर्षो का हवाला देकर चुनावी रण में विजय हुए माननीय का जीवन कुछ बरसो में ही परिवर्तित हो जाता है। चुनाव जन सेवा से अधिक व्यापार हो गयी, जिसमे चुनाव के समय खर्च की गयी पूंजी को वसूला जाता है, नेता चुनाव लड़ने के लिए भी कर्ज लेते है, जिसकी भरपाई के लिए बेईमानी का सहारा लिया जाता है। बड़े सियासी दल उद्योग घरानो से चुनावी चंदा लेकर उन्हें फायदा पहुंचाने के कार्य में लगे हुए है। अचम्भा इस बात का है की राजनितिक दल वर्तमान में सीधे तौर पर सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में नहीं आते है, इसलिए उनके चुनावी चंदे की जानकारी आरटीआई के तहत नहीं मांगी जा सकती। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में चुनावी चंदे में पारदर्शिता को लेकर कई याचिकाए लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोरल बांड योजना को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया था। क्योंकि वह नागरिको के जानने के अधिकार का हनन करती है।
व्यवस्था में व्याप्त बेईमानी भारत के सुपर पावर बनने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा शाबित हो रही है। ग्रामीण विकास की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत के विकास की राशि मे अनियमितता सम्पूर्ण भारत में एक सी है। यहाँ जिला स्तर के अधिकारी के जेब गरम करने के बाद प्राप्त हुई राशि जनपद के अधिकारी के हिस्से में बटती हुई ग्राम पंचायत तक आते-आते आधी हो जाती है, नगरपालिका, नगरनिगम, विधानसभा और लोकसभा के विकास की राशि भी तो पंचायत की तरह कमीशन का हिस्सा बन रही है। एक नारा किसी दल ने दिया जिस पर अमल तो लम्बे से हो रहा था, वह है डबल इंजिन की सरकार यह क्या है? मतलब मतदाताओं को भरमानें का तरीका की ऐसा नहीं किया तो विकास की गति रुक जाएगी। मतलब सत्ता होंगी तो विकास होगा यह भेद मतदाताओं के साथ किया जाना प्रजातंत्र का मखौल उड़ाना है। देश हो प्रदेश विधायक हो या सांसद सत्ता पक्ष पर अपने क्षेत्र की उपेक्षा के आरोप लगाता ही है। सरकार द्वारा इस प्रकार की उपेक्षा नहीं की जाना चाहिए। देश में मुफ्त की सुविधाओं से भी नागरिक समाज में अकर्मन्यता व्याप्त हो गयी है। देश का निर्माण सक्रिय मानव शक्ति से ही सम्भव है। देश के नागरिको के जीवन में बदलाव लाना सरकार का लक्ष्य होना चाहिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार नागरिक समाज की बड़ी समस्याओ में से है। ऐसा नहीं है की आजादी के 8 दशकों में देश न बदला हो, देश ने विकास के नवीन आयामों को तय किया है। किन्तु जिस गति से हमें बढ़ना था, उस चाल से हम नहीं बढ़ पा रहे है। राजनीति में व्याप्त अनियमितता, देश को दीमक की तरह चाट रही है। भारत को सुपर पावर, महाशक्ति बनने का जो सपना राष्ट्रप्रेमी देखते है। राजनितिक भष्ट्र आचरण इन सपनों पार कुठाराघात करता है। राजनितिक पारदर्शिता से ही भारत महाशक्ति बन सकता Baki। इस हेतु यह जरुरी है की सरकारी भष्ट्र आचरण को रोकने वाली एजेंसियो का उपयोग दल हित में करने के बजाए राष्ट्र हित में किया जाए। दल बदल पर कठोर कानून बनाया जाए।





