राजस्थान विधानसभा के छठें सत्र के पहले दिन विपक्ष की अनुपस्थिति ने खड़े किए संसदीय परंपराओं से जुड़े सवाल

The absence of the opposition on the first day of the sixth session of the Rajasthan Legislative Assembly raised questions regarding parliamentary traditions

सचिन शर्मा

सौहलवीं राजस्थान विधानसभा के छठें सत्र का पहला दिन गुरुवार को असामान्य घटनाक्रम के साथ शुरू हुआ। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के सुबह ठीक ग्यारह बजे सदन में प्रवेश करते ही सदन की कार्यवाही राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ के साथ प्रारंभ हुई, लेकिन विपक्षी कांग्रेस विधायकों की इसमें अनुपस्थिति रहीं । स्थिति उस समय और अधिक गंभीर दिखाई दी, जब दिवंगत जनप्रतिनिधियों एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तित्वों की स्मृति में आयोजित शोकाभिव्यक्ति में भी विपक्ष की बेंचें खाली पड़ी रहीं।विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने इस स्थिति पर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए विपक्ष से सदन की कार्यवाही में भाग लेने की अपील की।

राजस्थान विधान के इतिहास में संभवत ऐसा पहली बार हुआ है, जब सत्र के प्रथम दिन शोकाभिव्यक्ति सदन में प्रतिपक्ष के सदस्य मौजूद नहीं थे जबकि ट्रेजरी बैंच में सत्ता पक्ष की और से मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, उनके मंत्रिपरिषद के सदस्य और विधायक गण उपस्थित थे ।

राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ के गायन के बाद विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाते हुए सौहलवीं विधान सभा के छठें सत्र की पहली बैठक में सदन में आए सभी सदस्यों का स्वागत और अभिनंदन करते हुए कहा कि प्रतिपक्ष की बैंचों को खाली देखकर मन में पीड़ा हो रही है। आज बिना किसी विषय के प्रतिपक्ष का सदन में न होने से उन्हें और भी गहरा दुःख हुआ है। देवनानी ने कहा कि ऐसा होना ठीक नहीं है।

विधानसभाध्यक्ष देवनानी ने सदन में बताया कि प्रारंभ में यह विषय था कि प्रतिपक्ष के विधायक गेट नंबर छह से मिलकर सदन में आएंगे। स्पीकर ने बताया कि व्यवस्था के अनुसार सभी सदस्यों को गेट नंबर सात से प्रवेश करना होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई विधायक पैदल आते हैं तो वे गेट नंबर छह से भी एक-एक करके आ सकते है। देवनानी ने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए एक-एक विधायक को प्रवेश करने का अनुरोध किया गया था। इसके बावजूद प्रतिपक्ष के सदस्यों का सदन में नहीं आना, यह स्थिति ठीक नहीं हैं। स्पीकर देवनानी ने कहा कि उन्हें मार्शल ने अवगत कराया कि गेट नंबर छह से प्रवेश के दौरान पिछली बार अन्य लोग भी बीच में सम्मिलित हो गए थे, जिससे विधानसभा की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रश्न खड़े हुए थे।

स्पीकर देवनानी ने कहा कि प्रतिपक्ष का पूरा सम्मान है। उन्हें अपने विषय सदन में रखने का पूरा अधिकार है। प्रतिपक्ष अपने मुद्दों को सदन में मर्यादापूर्ण तरीके से और निर्धारित नियमों के तहत रख सकते है। उन्होंने राज्य सरकार से भी यह अपेक्षा की है कि प्रतिपक्ष द्वारा उठाए गए विषयों पर संज्ञान लेकर उनका सकारात्मक उत्तर दे। उन्होंने कहा कि सदन की सार्थकता तभी है, जब सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों लोकतांत्रिक मर्यादाओं के साथ जनहित के विषयों पर चर्चा करें और प्रदेश की जनता से जुड़े मुद्दों का समाधान निकालने में अपनी भूमिका निभाएं।

राजस्थान विधान सभा में शोकाभिव्यक्ति जैसी कार्यवाही सामान्य राजनीतिक बहस से अलग होती है। इसमें दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर दिवंगत जनप्रतिनिधियों और सार्वजनिक जीवन की विभूतियों के प्रति सामूहिक संवेदना व्यक्त की जाती है। इसलिए ऐसी कार्यवाही में विपक्ष की अनुपस्थिति ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि संसदीय परंपराओं को लेकर भी एक बहस खड़ी कर दी है। हालाँकि प्रतिपक्ष के बेंचों पर कांग्रेस को छोड़ कर राष्ट्रीय लोक दल के डॉ सुभाष गर्ग, भारत आदिवासी पार्टी , बहुजन समाज पार्टी के विधायक गण मौजूद थे । भारत आदिवासी पार्टी के विधायक आदिवासी वेशभूषा में सज धज दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देने और पृथक भील प्रदेश बनाने की माँग के समर्थन में प्रदर्शन करने के बाद विधान सभा में शोकाभिव्यक्ति के समय सदन में उपस्थित हो गए थे। इसी प्रकार कई निर्दलीय विधायक भी सदन में मौजूद रहे ।

संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल और सरकारी मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने भी प्रतिपक्ष विशेष कर कांग्रेस की सदन में अनुपस्थिति को दुर्भाग्य पूर्ण बताते हुए कांग्रेस पर हमला बोला । सत्ता पक्ष के सदस्यों ने इसे राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् पर कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं द्वारा लिए गए स्टेंड की चर्चा करते हुए कहा कि अपने हाई कमान के इशारे पर कांग्रेसी विधायक राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् को पूरा गाना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अन्य मुद्दों को विधानसभा से अनुपस्थित रहने का बहाना बनाया है । यह संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् के कानूनी दर्जे का भी अपमान है ।

सत्ता पक्ष के सदस्यों ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जुली और मुख्य सचेतक रफीक खान ने कांग्रेस की ओर से सदन के संचालन में पूर्ण सहयोग का वादा किया था लेकिन पहले ही दिन कांग्रेस विधायकों की अनुपस्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है ।

संसदीय लोकतंत्र का यही मूल संतुलन है कि सरकार का दायित्व है कि वह विपक्ष को सुने और विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार को जवाबदेह बनाए। दोनों में से किसी एक की भूमिका कमजोर पड़ती है तो विधानसभा की कार्यक्षमता और लोकतांत्रिक संवाद दोनों प्रभावित होते हैं।विपक्ष का सदन से बाहर रहकर विरोध करना लोकतांत्रिक राजनीति में असहमति का एक माध्यम हो सकता है। किसी राजनीतिक दल को अपने मुद्दों पर विरोध दर्ज कराने का अधिकार है। लेकिन सवाल विरोध के अधिकार का नहीं, बल्कि उसके स्थान और तरीके का है। विधानसभा वह सर्वोच्च मंच है जहां जनता से जुड़े प्रश्नों पर सरकार से जवाब मांगा जा सकता है, नीतियों की समीक्षा की जा सकती है और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकता है।दोनों पक्षों के बीच यह मतभेद स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आवश्यकता इस बात की है कि यह मतभेद सदन के भीतर सार्थक बहस में परिवर्तित हों, न कि सदन की कार्यवाही से दूरी का कारण बनें।राजस्थान की जनता विधानसभा को केवल राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं के समाधान के सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच के रूप में देखती है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, कानून-व्यवस्था, विकास, स्थानीय निकायों और प्रदेश के आर्थिक हितों जैसे अनेक विषय सदन में गंभीर चर्चा की अपेक्षा कर रहे हैं।

इधर कांग्रेस विधायकों ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधायक गोविंद सिंह डोटासरा और विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जुली के नेतृत्व में सरकारी स्कूलों में प्रवेश पर मीडिया और अन्य लोगों पर पाबंदी लगाने के विरोध में राज्य के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और अन्य कतिपय मुद्दों पर विधान सभा के बाहर प्रदर्शन किया और विधान सभा के गेट नंबर छह की ओर कूच कर उसे खोलने की माँग की। कुछ विधायक गेट पर भी चढ़ गए । कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट भी विधान सभा के बाहर कांग्रेस के धरने में शामिल हुए और उन्होंने भी प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और प्रदेश के स्कूलों की हालत को ख़राब बताते हुए राज्य के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग की।

राजस्थान विधान सभा के मानसून सत्र के पहले ही दिन पैदा हुए इस टकराव को देखते हुए सभी का मानना है कि विधान सभा की आगे की कार्यवाही की दिशा निर्धारित करने के लिए कोई सम्माजनक हल निकालने की जरूरत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। यही लोकतंत्र और संसदीय परंपराओं के हित में होगा। सत्ता पक्ष को संवाद का वातावरण तैयार करना होगा और विपक्ष को भी सदन में उपस्थित रहकर अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभानी होगी।

लोकतंत्र में विरोध, असहमति और बहस होती है; लेकिन इन सबका सबसे प्रभावी मंच सदन ही है। राजस्थान विधानसभा की गरिमा तभी और मजबूत होगी, जब सत्ता पक्ष अपनी संख्या के साथ विनम्रता और विपक्ष अपनी असहमति के साथ जिम्मेदारी का परिचय देगा। अंततः सदन किसी एक दल का नहीं, बल्कि राजस्थान की जनता का है और जनता यही चाहती है कि उसके प्रतिनिधि सदन में उपस्थित होकर उसकी आवाज को मजबूती से उठाएं।