विपक्षी हुंकार शक्ति-प्रदर्शन नहीं, जनकल्याण का कारण बने

The opposition's noise should not be a show of power, it should be a cause for public welfare.

ललित गर्ग

लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनआकांक्षाओं, नागरिक अधिकारों, जवाबदेही और सार्थक राजनीतिक संवाद की जीवंत प्रणाली है। इसकी मजबूती केवल सत्तारूढ़ दल की कार्यक्षमता से नहीं, बल्कि विपक्ष की जिम्मेदारी, उसकी वैचारिक परिपक्वता और जनहित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से भी निर्धारित होती है। लेकिन जब विपक्ष की राजनीति का केंद्र जनता के बुनियादी सवालों के बजाय सत्ता का विरोध, नेतृत्व पर व्यक्तिगत हमले और आरोपों की पुनरावृत्ति बन जाए, तब लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती को लेकर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के नेतृत्व में लगभग बीस विपक्षी दलों का जुटना और वोट चोरी के मुद्दे पर हुंकार भरना इसी संदर्भ में राजनीतिक समीक्षा की अपेक्षा करता है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष को रैली करने का अधिकार है या नहीं, बल्कि यह है कि ऐसी रैलियों से लोकतंत्र और आम जनता को आखिर क्या हासिल हो रहा है?

रामलीला मैदान ऐतिहासिक रूप से जनआंदोलनों, राजनीतिक चेतना और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का साक्षी रहा है। यहां उमड़ने वाली भीड़ को केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि उससे जुड़े संदेश और उद्देश्य का मूल्यांकन भी आवश्यक है। कांग्रेस ने सहयोगी दलों को एक मंच पर लाकर अपनी राजनीतिक एकजुटता प्रदर्शित करने का प्रयास किया। दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया था, लेकिन उपलब्ध विवरणों के अनुसार वास्तविक उपस्थिति इस दावे से काफी कम रही। फिर भी इस आयोजन का महत्त्व केवल भीड़ के आकार से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक संदेश से तय होना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि इस रैली में भी विपक्ष की ओर से वही पुराने आरोप, वही राजनीतिक भाषण और वही सत्ता विरोधी तेवर अधिक दिखाई दिए, जिनकी पुनरावृत्ति लंबे समय से होती रही है।

वोट चोरी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का अधिकार ही नहीं, उसका दायित्व भी है। प्रत्येक वैध मतदाता का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहना चाहिए और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आरोपों के साथ प्रमाण और तथ्यों की विश्वसनीयता भी आवश्यक है। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का प्रश्न उठाया जा रहा है, उनमें मृतक, स्थायी रूप से अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत मतदाता भी शामिल बताए गए हैं। निर्वाचन आयोग ने भी एसआईआर से जुड़े निर्णयों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिया गया बताया है। इस प्रक्रिया को लेकर न्यायालय में विचार और निर्देश भी सामने आए हैं। इसलिए इस पूरे विषय पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, प्रमाणों और न्यायिक परीक्षण के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

विपक्ष का दायित्व है कि वह चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग करे, मतदाता सूची की त्रुटियों को उजागर करे और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस प्रयास करे। लेकिन केवल वोट चोरी का नारा बुलंद करने से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास मजबूत नहीं होगा। यदि विपक्ष वास्तव में मतदाता अधिकारों को लेकर गंभीर है तो उसे प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपने बूथ लेवल एजेंट नियुक्त करने, मतदाता सूची की जांच करने, वास्तविक विसंगतियों के प्रमाण जुटाने और प्रभावित नागरिकों को न्याय दिलाने की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा नारों से कम और धरातल पर किए गए कार्यों से अधिक होती है। इस रैली का एक दूसरा पहलू भी है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की राजनीतिक एकजुटता का आधार क्या है? क्या यह एकजुटता किसी साझा आर्थिक दृष्टि, रोजगार नीति, कृषि सुधार, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, युवाओं के भविष्य और सामाजिक न्याय के व्यापक कार्यक्रम पर आधारित है? अथवा इसका मुख्य उद्देश्य नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करना और सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक वातावरण तैयार करना है? यदि किसी गठबंधन की एकता का सबसे बड़ा आधार किसी एक नेता या सरकार का विरोध हो, तो उसकी वैचारिक स्थिरता और भविष्य की दिशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सत्ता विरोध अपने आप में कोई राजनीतिक दर्शन नहीं हो सकता।

लोकतंत्र में विपक्ष केवल आलोचक नहीं होता, वह वैकल्पिक नीतियों का निर्माता भी होता है। संसद में विधेयकों पर गंभीर चर्चा, सरकार की नीतियों का तथ्यात्मक परीक्षण, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर वैकल्पिक सुझाव तथा जनता की आवाज को संस्थागत मंचों तक पहुंचाना उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत कटाक्ष और विरोध प्रदर्शनों तक सीमित होने लगता है, तब जनता के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। विपक्ष को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री की आलोचना करना और प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में अपनी योग्यता प्रमाणित करना दो अलग-अलग बातें हैं। पहली बात राजनीतिक विरोध है, जबकि दूसरी लोकतांत्रिक नेतृत्व की कसौटी है। आज भारत अनेक बुनियादी चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार, किसानों की आय और कृषि की उत्पादकता, छोटे व्यापारियों की आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, पर्यावरण संरक्षण, शहरी अव्यवस्था, बढ़ती आर्थिक विषमता और महिलाओं की सुरक्षा जैसे प्रश्न किसी एक दल के नहीं, पूरे राष्ट्र के प्रश्न हैं। क्या रामलीला मैदान की हुंकार इन विषयों पर कोई ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकी? क्या विपक्ष ने यह बताया कि वह इन समस्याओं के समाधान के लिए कौन-सी नीतियां अपनाएगा? क्या उसने देश के सामने कोई साझा विकास दृष्टि रखी? इन सवालों का उत्तर ही इस रैली की राजनीतिक सार्थकता का वास्तविक मूल्यांकन करेगा।

यह भी समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में भीड़ जुटाना और जनमत अर्जित करना अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक राजनीतिक उत्तेजना, संगठनात्मक शक्ति अथवा विरोध की भावना से जुट सकती है, लेकिन स्थायी जनविश्वास विचारों, नीतियों, आचरण और परिणामों से अर्जित होता है। राजनीतिक दलों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि विशाल मंच, बड़े भाषण और एकजुटता के प्रदर्शन से जनता का विश्वास स्वतः प्राप्त हो जाएगा। आज का मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। वह केवल यह नहीं सुनना चाहता कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी जानना चाहता है कि विपक्ष उस स्थिति को सुधारने के लिए क्या करेगा। कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के नाते उससे केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्व और रचनात्मक विपक्ष की अपेक्षा भी की जाती है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को अपनी राजनीतिक ऊर्जा का उपयोग ऐसे मुद्दों पर करना चाहिए, जो समाज के व्यापक वर्गों को प्रभावित करते हैं। विपक्षी एकता तभी सार्थक होगी, जब वह साझा नकारात्मकता के बजाय साझा सकारात्मक एजेंडे पर आधारित होगी। विभिन्न दलों के बीच नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के प्रश्नों पर सहमति बनाना आवश्यक है।

वस्तुतः लोकतंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा केवल चुनावों, रैलियों, नारों और राजनीतिक हुंकारों से नहीं होती। इसके लिए संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा, राजनीतिक दलों की जवाबदेही, विचारों की स्वतंत्रता और जनहित के प्रति संवेदनशील शासन व्यवस्था आवश्यक है। सत्तापक्ष को भी आलोचना सुनने और अपनी कमियों को सुधारने का साहस दिखाना चाहिए, जबकि विपक्ष को प्रमाणों के साथ सवाल उठाने और समाधान प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। लोकतंत्र किसी एक दल की बपौती नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की साझी विरासत है। रामलीला मैदान की यह रैली विपक्ष के लिए केवल शक्ति प्रदर्शन का अवसर बनकर न रह जाए, बल्कि आत्ममंथन का कारण बने, यही समय की मांग है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष मोदी सरकार के विरुद्ध कितनी बार एकजुट हो सकता है, बल्कि यह है कि वह देश के भविष्य के लिए कितनी बार एक सार्थक और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत कर सकता है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सत्ता का विरोध जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है जनहित का समर्थन। लोकतंत्र को हुंकार से नहीं, विचार से; भीड़ से नहीं, विश्वास से और सत्ता की आलोचना से नहीं, जनकल्याण के ठोस संकल्प से मजबूती मिलती है। यही रामलीला मैदान की राजनीतिक गूंज से निकलने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश होना चाहिए।