संजय सक्सेना
दुनिया भर में अपनी पत्रकारिता के कारण सुर्खियों में रहने वाला बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन) का विवादों से गहरा नाता रहा है। कई देश बीबीसी की खबरों को उसके ‘एजेंडे’ के रूप में देखते हैं। बीबीसी पर भारतीय राजनीति, समाज और नीति-निर्माण को प्रभावित करने के लिए एजेंडा-आधारित पत्रकारिता और नैरेटिव मैनिपुलेशन (कहानियों को तोड़ने-मरोड़ने) के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। आलोचकों, विचारकों और भारत सरकार के समर्थकों का मानना है कि बीबीसी अक्सर भारत की नकारात्मक छवि पेश करता है और संवेदनशील मुद्दों पर एकतरफा दृष्टिकोण अपनाकर असंतोष को भड़काता है। ऐसा ही कुछ कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान भी देखने को मिल रहा है।बीबीसी की रिपोर्टिंग पर नज़र डालने से कुछ विशेष पैटर्न सामने आते हैं, जिनके जरिए खबरों को एक खास दिशा दी जाती है। भारत से जुड़ी खबरों में ऐसे शीर्षकों का चयन किया जाता है, जो सीधे तौर पर देश की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। जटिल सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को सरलीकृत करके सीधे तौर पर बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के रूप में पेश किया जाना। बीबीसी का लोकल नैरेटिव को ग्लोबल एजेंडा बनाना भी अक्सर चिंताजनक नजर आता है। उसके द्वारा स्थानीय स्तर के आपराधिक मामलों को राष्ट्रीय राजनीति और सरकार की नीतियों से जोड़कर दिखाने के कई उदाहरण मौजूद हैं। बीबीसी द्वारा अपनी रिपोर्ट में केवल उन्हीं विचारकों, पत्रकारों या कार्यकर्ताओं को शामिल किया जाता है, जो सरकार विरोधी रुख रखते हैं। बीबीसी की दखलअंदाजी और मैनिपुलेशन के कई उदाहरण मौजूद हैं।बीबीसी द्वारा 2023 में दो भागों में जारी की गई ‘इंडिया: द मोदी क्वेश्चन’ डॉक्यूमेंट्री में 2002 के गुजरात दंगों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। इस डॉक्यूमेंट्री को ऐसे समय पर रिलीज किया गया, जब भारत जी-20 (जी-20) की अध्यक्षता संभाल रहा था और वैश्विक मंच पर अपनी छवि मजबूत कर रहा था। इसमें भारत की सर्वोच्च अदालत द्वारा गठित एसआईटी की उस जांच को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया, जिसने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी थी। दरअसल, बीबीसी का उद्देश्य कानूनी रूप से सुलझ चुके इस संवेदनशील और ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दे को दोबारा हवा देकर देश में राजनीतिक अस्थिरता और असंतोष पैदा करना था। साल 2020-2021 में भारत सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान बीबीसी की कवरेज को बेहद एकतरफा माना गया। बीबीसी की ग्राउंड रिपोर्ट्स और डिजिटल आर्टिकल्स में मुख्य रूप से आंदोलनकारियों के पक्ष को ही सही ठहराया गया। इसमें लाल किले पर हुई हिंसा और पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों को या तो बहुत कम दिखाया गया या उन्हें जायज ठहराने की कोशिश की गई। कानूनों के समर्थन में खड़े करोड़ों छोटे किसानों के दृष्टिकोण को बीबीसी ने अपनी मुख्यधारा की कहानियों में कोई जगह नहीं दी। इस कवरेज ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश दिया कि भारत सरकार किसानों का दमन कर रही है, जिससे भारत की लोकतांत्रिक साख को चोट पहुंची।
2020 में समान नागरिक संहिता यानी सीएए विरोधी प्रदर्शनों और उसके बाद फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के दौरान बीबीसी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। बीबीसी ने सीएए को एक मुस्लिम विरोधी कानून के रूप में प्रचारित किया, जबकि यह कानून केवल पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए था, न कि किसी की नागरिकता छीनने के लिए। दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग में बीबीसी ने हिंसा को एकतरफा मुस्लिम विरोधी दंगे के रूप में पेश किया, जबकि दंगों में दोनों पक्षों (हिंदू और मुस्लिम) के लोग मारे गए थे और खुफिया ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा व पुलिस हेड कांस्टेबल रतन लाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। बीबीसी की इस तरह की रिपोर्टिंग ने देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ाने और विदेशों में भारत की छवि को एक असहिष्णु देश के रूप में पेश करने का काम किया।1947 से लेकर अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने तक, बीबीसी की कश्मीर नीति को लेकर भारत में हमेशा आक्रोश रहा। बीबीसी अपनी रिपोर्टों में कश्मीर को भारत प्रशासित कश्मीर लिखता रहा। अनुच्छेद 370 हटने के बाद बीबीसी ने घाटी में केवल तालाबंदी, विरोध और सेना की कथित ज्यादतियों को ही दिखाया। वहां आतंकवाद के खात्मे, विकास कार्यों, स्कूलों के खुलने और कश्मीरी पंडितों के दर्द को उसकी रिपोर्टिंग में हमेशा हाशिए पर रखा गया। उसकी यह रिपोर्टिंग वैश्विक स्तर पर कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने और पाकिस्तान के रुख को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा गया।2021 में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान बीबीसी की कवरेज मानवीय संकट से ज्यादा राजनीतिक प्रहार पर केंद्रित थी। बीबीसी ने श्मशान घाटों और जलती हुई चिताओं की तस्वीरों को अत्यधिक ड्रोन कैमरों के जरिए ज़ूम करके दिखाया। जबकि पश्चिमी देशों (जैसे अमेरिका और यूके) में महामारी से भीषण मौतें होने के बावजूद वहां के मीडिया ने लाशों और कब्रिस्तानों की ऐसी डरावनी तस्वीरें नहीं दिखाईं। आपदा के समय इस तरह के दृश्य बार-बार दिखाकर बीबीसी ने देश के भीतर जनता में पैनिक (डर का माहौल) पैदा किया और सरकार की व्यवस्था को पूरी तरह से विफल दिखाने का प्रयास किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि बीबीसी का यह रवैया महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरे निहित स्वार्थ थे। संवेदनशील मुद्दों को भड़काना, तथ्यों को आधा-अधूरा पेश करना और भारत की नकारात्मक छवि को दुनिया के सामने बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना इसकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।
बीबीसी की रिपोर्टिंग पर नज़र डालने से कुछ विशेष पैटर्न सामने आते हैं, जिनके जरिए खबरों को एक खास दिशा दी जाती है। उसके द्वारा भारत से जुड़ी खबरों में ऐसे शीर्षकों का चयन किया जाता है, जो सीधे तौर पर देश की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। बीबीसी बेहद आसानी से जटिल सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को सरलीकृत करके सीधे तौर पर बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के रूप में पेश करके देश में टकराव की स्थिति पैदा करने से चूकता नहीं है। इसी तरह से स्थानीय स्तर के आपराधिक मामलों को राष्ट्रीय राजनीति और सरकार की नीतियों से जोड़कर दिखाया जाता है। बीबीसी के ताजा एजेंडे की बात की जाए तो अबकी उसने भारत के कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन को शुरुआत से ही एक बड़े और सुनियोजित तरीके से कवर किया है। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक डिजिटल मजाक या सैटायर (व्यंग्य) के रूप में शुरू हुए इस अभियान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी विरोधी नैरेटिव में बदलने के पीछे बीबीसी की रिपोर्टिंग का बड़ा हाथ रहा है। बीबीसी ने जिस तरह से इस आंदोलन को हवा दी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा उनकी सरकार के खिलाफ नैरेटिव तैयार किया, उसके मुख्य बिंदु और तरीके की बात की जाए तो उसके द्वारा कॉकरोच जनता पार्टी के डिजिटल व्यंग्य को वैश्विक जन-विद्रोह के रूप में प्रोजेक्ट करना बीबीसी की बड़ी चाल थी। शुरुआत में अभिजीत दिपके द्वारा बनाई गई कॉकरोच जनता पार्टी केवल एक मजाकिया सोशल मीडिया पेज था, जिसके सदस्यता मानदंडों में बेरोजगार होना, आलसी होना और प्रोफेशनल तरीके से भड़ास निकालना शामिल था। बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट्स में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि सीजेपी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की संख्या भाजपा से भी आगे निकल गई है, जिससे वैश्विक स्तर पर यह संदेश गया कि मोदी सरकार अपनी लोकप्रियता पूरी तरह खो चुकी है। यह आंदोलन मूल रूप से नीट मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पेपर लीक और उसमें सुधार की जायज मांगों को लेकर जमीन पर उतरा था, लेकिन बीबीसी ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट्स और वीडियो पैकेज में इसे केवल एक परीक्षा प्रणाली या प्रशासनिक विफलता के रूप में नहीं दिखाया। बीबीसी की रिपोर्टिंग ने इसे सीधे पीएम मोदी की नीतियों और 12 साल के शासनकाल के खिलाफ एक सीधे राजनीतिक खतरे के रूप में पेश किया। बीबीसी के संवाददाताओं ने बार-बार यह नैरेटिव गढ़ा कि मोदी सरकार युवाओं की आवाज को दबा रही है और देश में प्रेस स्वतंत्रता व नागरिक स्वतंत्रता लगातार गिर रही है। 20 जुलाई 2026 को जब संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया। इसे बीबीसी ने अपनी हेडलाइंस और वीडियो में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई को क्रूर और बर्बर क्रैकडाउन के रूप में बार-बार उछाला। बीबीसी ने इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया या बहुत कम महत्व दिया कि इस हिंसा में 100 से अधिक पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। जलते हुए तंबू और आंसू गैस के दृश्यों को इस तरह दिखाया गया, जैसे कि भारत में कोई अलोकतांत्रिक शासन चल रहा हो। जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दल इस आंदोलन के समर्थन में आए और प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन किया, तो बीबीसी ने इसे सरकार के लिए बढ़ते दबाव और संकट के रूप में प्रचारित किया।





