एडवोकेट, जयदेव राठी
लोकतंत्र में असहमति का प्रदर्शन और शांतिपूर्ण आंदोलन संविधान का वह हृदय है, जो राज्य को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखता है। लेकिन जब इसी हृदय की धड़कनें अराजकता के शोर में बदलने लगें, तो न केवल कानून-व्यवस्था की पोल खुलती है, बल्कि उस आंदोलन के पवित्र उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। हालिया घटनाक्रम, जिसमें छात्रों का एक शांतिपूर्ण मार्च संसद भवन की ओर अचानक हिंसा और अराजकता का शिकार हो गया, इस घटनाक्रम ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। बात शांतिपूर्ण विरोध की हुई थी, फिर संसद की गलियों में पत्थरबाजी और लाठीचार्ज की अराजकता कहां से उत्पन्न हुई? सबसे बड़ा और सबसे कटु सवाल यह है कि आंदोलन की अगुवाई करने वाले नेतृत्व ने इस निर्णायक क्षण पर स्वयं को गायब क्यों कर लिया?
अराजकता कभी भी अचानक या सहज रूप से जन्म नहीं लेती। जब हजारों छात्र शांति से नारे लगाते हुए, हाथों में तख्तियां लिए संसद भवन की ओर बढ़ रहे होते हैं, तो उस भीड़ का अचानक उग्र रूप ले लेना किसी गहरी साजिश की ओर इशारा करता है। अराजकता का बीज तब बोया जाता है जब भीड़ के मूल स्वरूप को बदलने का प्रयास किया जाता है। शांतिपूर्ण मार्च के दौरान अचानक पत्थर, और लाठी – डंडों का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि यह सामान्य छात्रों का आवेश नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित हिंसा थी। यह अराजकता उस बिंदु पर उत्पन्न हुई जहां लोकतांत्रिक संवाद के रास्ते बंद हो चुके थे और कुछ शक्तियों को राज्य को कमजोर दिखाने या किसी बड़े एजेंडे को अंजाम देने के लिए खून की जरूरत थी।
इस पूरी घटना का सबसे दर्दनाक और शर्मनाक पक्ष उस नेतृत्व की गैरमौजूदगी है, जिसने इस आंदोलन का आह्वान किया था। जब संसद भवन के बाहर स्थिति तनावपूर्ण हो रही थी, जब पुलिस बल और छात्रों के बीच की दूरी कम हो रही थी, तब वे कमान संभालने वाले चेहरे कहां थे?
आंदोलन की अगुवाई करने वालों का गायब हो जाना यह बताता है कि आज का एक वर्ग आंदोलन के नाम पर केवल ‘ट्रेंड’ चलाने और सुर्खियां बटोरने में विश्वास रखता है, लेकिन जब जवाबदेही या कठिन समय की बारी आती है, तो वे ‘नैतिक कायरता’ का परिचय देते हैं।
एक सक्षम नेतृत्व का प्राथमिक कर्तव्य होता है कि वह अपनी भीड़ को नियंत्रित रखे, उनके मार्ग को सुनिश्चित करे और बाहरी तत्वों को भीड़ में घुसने से रोके। लेकिन यहां नेतृत्व छात्रों को संसद की ओर जाने से रोकने वाली पुलिस बैरिकेड्स तक तो ले आया, लेकिन हिंसा भड़कते ही पीछे हट गया। यह असफलता केवल संगठनात्मक नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि या तो नेतृत्व में इतनी क्षमता ही नहीं थी कि वे अपने ही छात्रों और घुसपैठियों के बीच फर्क कर पाते, या फिर वे जानबूझकर इस अराजकता को पनपने दे रहे थे ताकि बाद में राज्य की ‘बर्बरता’ का रोना रोया जा सके।
सवाल यह उठता है कि आखिर वे शरारती तत्व कौन थे जिन्हें आंदोलन के नेता पहचान नहीं पाए, या पहचानकर भी अनदेखा कर दिया? भारत जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में ‘शरारती तत्वों’ की पहचान करना कोई कठिन काम नहीं है, बशर्ते नियत साफ हो। ये तत्व मुख्य रूप से विभिन्न श्रेणियों के होते हैं। ऐसे तत्व जो किसी विशेष विचारधारा या राजनीतिक दल के इशारे पर काम करते हैं। उनका काम छात्रों वास्तविक गुस्से को हिंसा में बदलना है ताकि सरकार की छवि खराब हो सके। अक्सर आंदोलनों में भीड़ का फायदा उठाकर स्थानीय अपराधी, बस्तियां तोड़ने वाले, और वाहनों में आग लगाने वाले पेशेवर उपद्रवी शामिल हो जाते हैं। छात्रों के एकसमान कपड़े और चेहरों की भीड़ में इनका मिल जाना आम बात है।
कुछ ऐसे संगठन होते हैं जो राज्य की किसी भी मौजूदा व्यवस्था को तोड़ने में विश्वास रखते हैं। उनके लिए संसद भवन, जो लोकतंत्र का प्रतीक है, एक ‘लक्ष्य’ होता है जिसे क्षतिग्रस्त करना उनकी जीत मानी जाती है।
नेतृत्व की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि उन्होंने छात्रों को ‘मानव ढाल’ के रूप में इस्तेमाल किया। जब पत्थरबाजी शुरू हुई, तो ये शरारती तत्व छात्रों के पीछे छिप गए, जिससे पुलिस को मजबूरन आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा, और इस चक्रव्यूह में मासूम छात्र और कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मी दोनों ही बुरी तरह घायल हो गए।
संसद भवन की सीमाओं पर जिस तरह से खून बहा, उसने हर उस भारतीय का सिर शर्म से झुका दिया जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है। छात्र, जो देश का भविष्य हैं, अपनी मांगों को संसद तक पहुंचाने के लिए निकले थे, लेकिन वे एक ऐसी चालबाजी का शिकार हो गए जिसे वे समझ ही नहीं पाए। दूसरी ओर, पुलिस के जवान हैं, जो न तो किसी राजनीतिक दल के एजेंट हैं और न ही उनके पास कोई व्यक्तिगत दुश्मनी है; वे केवल अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन कर रहे थे। संसद भवन की सुरक्षा उनके लिए सर्वोपरि है। जब भीड़ ने बैरिकेडिंग तोड़ने का प्रयास किया, तो पुलिस को बल प्रयोग करना ही पड़ा।
लेकिन क्या यह बल प्रयोग अनुपात से अधिक था? यह एक जांच का विषय है। लेकिन यह भी सच है कि यदि नेतृत्व अपनी भीड़ को काबू में रखता, और उन शरारती तत्वों को भीड़ से बाहर निकालता जो पत्थर चला रहे थे, तो पुलिस को इतनी सख्ती नहीं करनी पड़ती। इस हिंसा में पुलिस के जवानों के घायल होने का जिम्मेदार भी वही गायब नेतृत्व है, जिसने अपने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के बजाय भीड़ के भावनात्मक आवेश को हवा दे दी।
इस घटना का गहरा विश्लेषण करने पर पता चलता है कि आज के आंदोलनों का स्वरूप बदल गया है। पहले आंदोलन एक ‘संवाद’ का माध्यम थे, आज वे ‘संघर्ष’ और ‘अस्तव्यस्तता’ का पर्याय बनते जा रहे हैं। जब आंदोलन के नेता ही अपनी भीड़ की जिम्मेदारी लेने से कतराते हैं, तो राज्य के लिए दमन के अलावा कोई चारा नहीं बचता। इससे क्या हासिल होता है? छात्रों की वास्तविक और जायज मांगें कचरे के डिब्बे में फेंक दी जाती हैं, और मीडिया की सुर्खियां केवल पत्थरबाजी और लाठीचार्ज तक सीमित रह जाती हैं।
सरकार और प्रशासन को भी इस बात की समीक्षा करनी होगी कि क्या संसद जैसे लोकतांत्रिक मंदिर के बाहर छात्रों की मांगों को सुनने का कोई संवैधानिक या प्रशासनिक तंत्र मौजूद है? यदि छात्रों को यह महसूस होता है कि उनके संसद जाने से उनकी आवाज सुनी जाएगी, तो वे पत्थर क्यों उठाते? लेकिन जब प्रशासन केवल ‘लाठी’ को ही भाषा मानता है, और नेता केवल ‘नारा’ लगाने को, तो टकराव अनिवार्य हो जाता है।
अंततः, इस अराजकता के लिए न तो केवल पुलिस प्रशासन दोषी है और न ही केवल वे पत्थरबाज तत्व। इसके लिए सबसे बड़े अपराधी वे ‘गायब नेता’ हैं, जिन्होंने छात्रों के जुनून का सौदा कर दिया। समय की मांग है कि इस पूरी घटना की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच हो। उस भीड़ में शामिल शरारती तत्वों की पहचान सीसीटीवी फुटेज और खुफिया इनपुट के माध्यम से की जानी चाहिए, और उनके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही, उन नेताओं और संगठनों को भी कटघरे में लाया जाना चाहिए जिन्होंने आंदोलन का नाम लेकर हिंसा को पनाह दिया। छात्रों को भी यह समझना होगा कि वे किसी राजनीतिक शतरंज की मोहरे नहीं हैं। संसद भवन की ओर जाने का उनका अधिकार सुरक्षित होना चाहिए, लेकिन उस अधिकार का उपयोग करने के लिए अनुशासन और दूरदर्शिता की भी आवश्यकता होती है। जब तक आंदोलन का नेतृत्व नैतिक साहस का प्रदर्शन नहीं करेगा, और राज्य संवाद के दरवाजे नहीं खोलेगा, तब तक लोकतंत्र के इन गलियारों में अराजकता का यह सिलसिला चलता रहेगा, और छात्रों का खून बहता रहेगा।





