संसद का मानसून सत्र: हंगामे की भेंट चढ़ी कार्यवाही, टकराव के बीच समाधान की तलाश

Parliament's monsoon session: proceedings marred by uproar, a search for a solution amid confrontation

एन जी भट्ट

नई दिल्ली : संसद का मानसून सत्र एक बार फिर सत्ता पक्ष और विपक्ष के तीखे टकराव का मंच बन गया। बुधवार को लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों की कार्यवाही विपक्ष के लगातार हंगामे के कारण सुचारु रूप से नहीं चल सकी और बार-बार स्थगन के बाद पूरे दिन के लिए स्थगित करनी पड़ी। इससे एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया कि लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच पर जनहित के मुद्दों पर सार्थक बहस कब होगी।

इस बार विपक्ष विभिन्न मुद्दों, विशेष रूप से छात्र आंदोलनों, प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों और कानून-व्यवस्था के प्रश्नों पर सरकार से जवाब मांग रहा है। विपक्ष का कहना है कि इन विषयों पर प्रधानमंत्री या संबंधित मंत्री की ओर से विस्तृत चर्चा कराई जानी चाहिए। दूसरी ओर सरकार का पक्ष है कि वह संसद के नियमों के तहत हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन सदन की कार्यवाही बाधित कर चर्चा का वातावरण नहीं बनाया जा सकता।

लोकसभा में प्रश्नकाल और शून्यकाल लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इन्हीं के माध्यम से सांसद अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को सरकार के समक्ष रखते हैं। लेकिन लगातार हंगामे के कारण प्रश्नकाल प्रभावित हुआ और अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों पर चर्चा नहीं हो सकी। राज्यसभा की स्थिति भी इससे अलग नहीं रही। सभापति द्वारा बार-बार सदस्यों से अपनी-अपनी सीटों पर लौटने और नियमों के अनुसार चर्चा में भाग लेने की अपील की गई, लेकिन गतिरोध समाप्त नहीं हो सका।

संसद केवल राजनीतिक दलों के बीच शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं है, बल्कि वह देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है। यहां कानून बनते हैं, नीतियों पर चर्चा होती है और सरकार की जवाबदेही तय होती है। जब कार्यवाही लगातार बाधित होती है तो उसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को उठाना पड़ता है। कई महत्वपूर्ण विधेयक, वित्तीय विषय और जनहित के मुद्दे चर्चा से वंचित रह जाते हैं।विपक्ष का दायित्व सरकार से जवाब मांगना और जनभावनाओं को सदन में उठाना है। उतना ही महत्वपूर्ण दायित्व सरकार का है कि वह विपक्ष की आशंकाओं का लोकतांत्रिक तरीके से उत्तर दे और चर्चा का पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए। स्वस्थ लोकतंत्र में बहस और संवाद ही समाधान का मार्ग है, न कि केवल आरोप-प्रत्यारोप और हंगामा।

संसदीय परंपराओं पर दृष्टि डालें तो अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष ने मतभेदों के बावजूद सार्थक बहस की है। विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक सुधार और सामाजिक कल्याण जैसे विषयों पर संसद ने कई बार लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचय दिया है। यही परंपरा लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। इसलिए वर्तमान गतिरोध का समाधान भी संवाद और सहमति से ही निकल सकता है।

जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में बहस करने, कानून बनाने और अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाने के लिए चुनकर भेजती है। ऐसे में बार-बार कार्यवाही बाधित होना स्वाभाविक रूप से जन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं माना जाता। संसद का प्रत्येक मिनट सार्वजनिक धन से संचालित होता है और उसका सदुपयोग लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का विषय है। आगे की राह यही है कि सरकार और विपक्ष दोनों संसदीय मर्यादाओं का पालन करते हुए संवाद का रास्ता अपनाएं। यदि विपक्ष के पास गंभीर मुद्दे हैं तो उन पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए और यदि सरकार के पास अपने निर्णयों का पक्ष है तो उसे भी पूरे तथ्य सदन के सामने रखने चाहिए। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन संवाद का विकल्प नहीं हो सकती।

बुधवार की कार्यवाही भले ही हंगामे की भेंट चढ़ गई हो, लेकिन मानसून सत्र अभी जारी है। देश की जनता की अपेक्षा है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक दल टकराव से ऊपर उठकर संसद को बहस, जवाबदेही और जनहित के प्रभावी मंच के रूप में स्थापित करेंगे। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति शोर में नहीं, बल्कि सार्थक संवाद और रचनात्मक विमर्श में निहित है।