परीक्षा प्रणाली का संकट और राजनीतिक अखाड़ा

The Crisis of the Examination System and the Political Arena

अशोक भाटिया

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा को लेकर उठा बवंडर अब महज एक परीक्षा की शुचिता, पेपर लीक के दावों या नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की प्रशासनिक विफलताओं तक सीमित नहीं रह गया है। यह विवाद अब देश की दिशा तय करने वाले एक गहरे राजनीतिक भंवर में तब्दील हो चुका है। देश के लाखों युवाओं और उनके परिवारों का भविष्य दांव पर है, लेकिन सत्ता पक्ष को घेरने के नाम पर विपक्षी खेमे में जो नया ‘खेल’ शुरू हुआ है, उसने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे को आपसी प्रतिद्वंद्विता के अखाड़े में बदल दिया है। संसद से लेकर सड़क तक, विपक्षी एकता की जिस ‘इंडिया’ दीवार को दिखाने की कोशिश की जा रही थी, उसमें दरारें अब साफ नजर आने लगी हैं। विशेष रूप से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच NEET के मुद्दे पर शुरू हुआ ‘क्रेडिट वार’ यह साबित करता है कि राजनीति के लिए छात्रों का दर्द कई बार सिर्फ एक चुनावी हथियार बनकर रह जाता है।

हालिया घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि विपक्षी एकजुटता केवल एक तात्कालिक चुनावी गणित थी, न कि किसी दीर्घकालिक विचारधारा का नतीजा। NEET पेपर लीक मामले में जब देश के छात्र जंतर-मंतर पर एक महीने से अधिक समय से तपती धूप में इंसाफ की गुहार लगा रहे थे, तब विपक्ष के दोनों प्रमुख घटक दल अपनी अलग-अलग रोटियां सेकने में व्यस्त थे। इस विवाद ने तब नया मोड़ ले लिया जब आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस पर भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर ‘फिक्स्ड मैच’ खेलने का सीधा और गंभीर आरोप लगा दिया। आप का यह दावा कि केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच पर्दे के पीछे कोई ‘जुगलबंदी’ चल रही है, राजनीति के गिरते स्तर और विपक्षी दलों के बीच गहरे अविश्वास को दर्शाता है।

आप का यह तर्क कि जंतर-मंतर पर आंदोलनरत छात्रों की आवाज को दबाने के लिए कांग्रेस ने जानबूझकर प्रधानमंत्री आवास के घेराव का ‘इवेंट’ रचा, राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जहां हर दल खुद को मुख्य नायक साबित करना चाहता है। आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का यह आरोप कि कांग्रेस के प्रदर्शन करते ही सरकार के मंत्रियों का बातचीत के लिए आगे आना एक पूर्व-नियोजित नाटक था, कांग्रेस के उस आक्रामक तेवर पर पानी फेरने की कोशिश है जिसे राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे स्थापित करना चाह रहे थे।

2024 के लोकसभा चुनावों में सीटों की संख्या में सुधार के बाद कांग्रेस खुद को विपक्ष के स्वाभाविक और एकमात्र नेता के रूप में पेश करने की पुरजोर कोशिश कर रही है। NEET विवाद में कांग्रेस का रवैया इसी रणनीति का हिस्सा नजर आता है। पार्टी ने न केवल संसद के भीतर स्थगन प्रस्तावों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश की, बल्कि ‘छात्रों की गूंज’ जैसे 40 दिनों के लंबे देशव्यापी अभियान की घोषणा कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि छात्रों के मुद्दों पर केवल वही सबसे बड़ी लड़ाई लड़ सकती है।

21 जुलाई को दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास की तरफ कांग्रेस का मार्च और प्रमुख नेताओं की हिरासत, इस मुद्दे पर एकाधिकार जमाने की एक सोची-समझी कोशिश थी। कांग्रेस यह भली-भांति जानती है कि शिक्षा और बेरोजगारी ऐसे मुद्दे हैं जो देश के मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग को सीधे प्रभावित करते हैं। इसलिए, वह इस आंदोलन की कमान किसी क्षेत्रीय दल या छात्र संगठन के हाथ में नहीं जाने देना चाहती। लेकिन इसी आक्रामकता ने उसके अपने ही सहयोगियों, जैसे आम आदमी पार्टी, को असहज कर दिया है।

दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी की छटपटाहट भी समझ में आती है। दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में सत्तासीन AAP खुद को एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही है। दिल्ली की जमीन पर होने वाले किसी भी बड़े आंदोलन (चाहे वह किसानों का हो या छात्रों का) पर AAP अपना दावा ठोकती रही है। जब जंतर-मंतर पर छात्र इकट्ठा हुए, तो AAP को लगा कि वह इस जन-आंदोलन का चेहरा बन सकती है। लेकिन कांग्रेस के अचानक एंट्री मारने और पूरे मीडिया स्पेस को अपनी तरफ खींच लेने से AAP को लगा कि उसका राजनीतिक मैदान खिसक रहा है।

संसद के भीतर भी दोनों दलों की राहें जुदा दिखीं। जहां कांग्रेस पूरे विपक्ष को अपने झंडे तले लाकर एक संयुक्त मोर्चा दिखाना चाहती थी, वहीं AAP सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा में नियम 267 के तहत अलग से नोटिस देकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की कोशिश की। अरविंद केजरीवाल द्वारा सोशल मीडिया पर री-नीट की मांग को लेकर सीधे प्रधानमंत्री पर हमला करना भी इसी रणनीति का हिस्सा है कि जनता के बीच यह संदेश न जाए कि AAP, कांग्रेस की ‘बी-टीम’ बनकर रह गई है।

यह टकराव केवल NEET तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी राज्यों के विधानसभा चुनावों (जैसे दिल्ली) की आहट का नतीजा है। दिल्ली में AAP और कांग्रेस के बीच का गठबंधन लोकसभा चुनाव तक ही सीमित था, और दोनों दलों को पता है कि विधानसभा में वे एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकेंगे। ऐसे में, युवाओं के एक इतने बड़े मुद्दे पर कोई भी दल दूसरे को ‘क्रेडिट’ की मलाई खाने नहीं देना चाहता।

यह स्थिति देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चिंताजनक है। जब विपक्ष को एक सुर में सरकार से जवाबदेही मांगनी चाहिए थी, जब राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के ढांचे में सुधार के लिए एक ठोस नीतिगत विकल्प पेश करना चाहिए था, तब विपक्ष आपस में ही इस बात पर लड़ रहा है कि ‘सड़क पर पहले कौन उतरा’ या ‘किसने ज्यादा लाठियां खाईं’। इस नूराकुश्ती का सीधा फायदा सत्ता पक्ष को मिलता है, जिसे विपक्ष के इस बिखराव के कारण संसद में तीखे और नीतिगत सवालों से बचने का मौका मिल जाता है।

राजनीति के इस नए खेल में सबसे बड़ा नुकसान देश के उन 24 लाख से अधिक छात्रों का हो रहा है जिन्होंने सालों तक दिन-रात एक करके इस परीक्षा की तैयारी की थी। पेपर लीक, ग्रेस मार्क्स का विवाद, और फिर इस पर होने वाली राजनीति ने छात्रों को मानसिक अवसाद के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। छात्रों को किसी पार्टी के झंडे या किसी नेता के भाषण से सरोकार नहीं है; उन्हें एक पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, समय पर परिणाम और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई चाहिए।

जब राजनीतिक दल इन छात्रों के मंच का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को चमकाने या एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए करने लगते हैं, तो आंदोलन का मूल उद्देश्य ही भटक जाता है। आज जरूरत इस बात की थी कि संसद में एक कड़ा कानून बनाने पर आम सहमति बनती, परीक्षा प्रणालियों में तकनीकी सुधारों पर बहस होती, और भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने का रोडमैप तैयार किया जाता। इसके विपरीत, हमें अखबारों की सुर्खियां विपक्ष के आपसी कीचड़ उछालने से भरी हुई मिलती हैं।

NEET विवाद पर AAP और कांग्रेस के बीच शुरू हुआ यह नया खेल भारतीय राजनीति के उस कड़वे यथार्थ को बयां करता है जहां ‘जनहित’ अक्सर ‘दलहित’ के पीछे छूट जाता है। यदि विपक्ष को वास्तव में युवाओं की चिंता है, तो उसे अपनी इस श्रेय लेने की होड़ को छोड़कर एक जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी।देश की जनता और विशेषकर युवा वर्ग बहुत समझदार है। वह देख रहा है कि कौन वास्तव में उसके हक की लड़ाई लड़ रहा है और कौन इस त्रासदी में अपने लिए चुनावी अवसर तलाश रहा है। साख केवल बड़ी रैलियों या तीखे बयानों से नहीं बनती, बल्कि संकट के समय दिखाई गई परिपक्वता और एकजुटता से बनती है। अगर विपक्ष इस मोर्चे पर विफल रहता है, तो वह न केवल सरकार को घेरने का एक सुनहरा मौका गंवा देगा, बल्कि देश के युवाओं का भरोसा भी हमेशा के लिए खो देगा। समय आ गया है कि इस ‘खेल’ को बंद किया जाए और शिक्षा प्रणाली के इस गंभीर संकट का समाधान खोजने पर ध्यान केंद्रित किया जाए।