एलएनजी संचालित पहली ट्रेन, 12 हजार हॉर्सपावर का डब्ल्यूएजी-12, कवच और आधुनिक सिग्नलिंग से सुरक्षित, स्वच्छ और आत्मनिर्भर रेल की नई दिशा
विनोद सिंह ‘तकियावाला’
भारतीय रेल की पटरियों पर बदलते भारत की तस्वीर लगातार अधिक स्पष्ट होती जा रही है। भाप के इंजन से शुरू हुई रेल यात्रा आज स्वदेशी तकनीक, विद्युत शक्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आधुनिक सिग्नलिंग और नई ऊर्जा के दौर में प्रवेश कर चुकी है। विकाश की श्रंखला में आज गुजरात का साबरमती इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण साक्षी बन रहा है।27 सितंबर 2026 को साबरमती में एक साथ जिन रेल परियोजनाओं का लोकार्पण,शिलान्यास और शुभारंभ हुआ,उनमें भारतीय रेल के वर्तमान और भविष्य दोनों की झलक दिखाई देती है। भारत की पहली एलएनजी संचालित ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के साथ 700 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित डब्ल्यूएजी-12 लोकोमोटिव अनुरक्षण शेड का लोकार्पण, 122.57 किलोमीटर रेलखंड पर स्वचालित सिग्नलिंग, 404 किलोमीटर रेलखंड पर स्वदेशी कवच प्रणाली और साबरमती – सरखेज रेल लाइन के दोहरीकरण की शुरुआत इस बदलाव की अलग-अलग कड़ियाँ हैं।केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने साबरमती में आयोजित कार्यक्रम में इन परियोजनाओं का शुभारंभ करते हुए भारतीय रेल में हो रहे तकनीकी और संरचनात्मक बदलावों को रेखांकित किया। इस अवसर की सबसे विशेष उपलब्धि भारत की पहली एलएनजी संचालित ट्रेन का शुभारंभ रही। रेलवे में स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों को बढ़ावा देने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। एलएनजी आधारित रेल परिवहन ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने की संभावनाएँ प्रस्तुत करता है।भारतीय रेल में पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा संक्रमण की दिशा में लगातार नई तकनीकों को अपनाया जा रहा है और एलएनजी ट्रेन उसी यात्रा का एक नया अध्याय है।भारतीय रेल में पर्यावरण-अनुकूल परिवहन की दिशा में बदलाव केवल एलएनजी तक सीमित नहीं है। रेलवे के बड़े हिस्से का विद्युतीकरण पूरा हो चुका है और डीजल की खपत में लगातार कमी आई है। सन 2010-11 में एक वर्ष में लगभग 75 किलोमीटर रेलमार्ग का विद्युतीकरण होता था,जबकि वर्ष 2023-24 में लगभग 7,188 किलोमीटर रेलमार्ग का विद्युतीकरण किया गया।भारतीय रेल नेटवर्क का लगभग 99.6 प्रतिशत हिस्सा विद्युतीकृत हो चुका है। वर्ष 2015-16 में रेलवे में लगभग 293 करोड़ लीटर डीजल की खपत होती थी, जो वर्ष 2024-25 में घटकर लगभग 108 करोड़ लीटर रह गई। वर्ष 2030 तक रेलवे में डीजल की खपत को शून्य करने का लक्ष्य इस ऊर्जा परिवर्तन की दिशा को और स्पष्ट करता है।साबरमती की परियोजनाओं का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष माल परिवहन की क्षमता बढ़ाना है। 700 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित डब्ल्यूएजी-12 लोकोमोटिव मेंटेनेंस शेड इसी दिशा में महत्वपूर्ण है।डब्ल्यूएजी-12 उच्च क्षमता वाला विद्युत माल लोकोमोटिव है,जिसकी ट्विन- सेक्शन क्षमता 12,000 हॉर्सपावर है।इसकी उच्च क्षमता के कारण भारी और लंबी मालगाड़ियों का संचालन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।जहाँ पहले भारी मालगाड़ियों के संचालन के लिए दो लोकोमोटिव लगाने की आवश्यकता पड़ती थी,वहीं उच्च क्षमता वाले डब्ल्यूएजी-12 से माल ढुलाई की दक्षता बढ़ाने में सहायता मिलेगी।गुजरात जैसे औद्योगिक और व्यापारिक राज्य में इसका महत्व और बढ़ जाता है। देश के औद्योगिक उत्पादन केंद्रों को बंदरगाहों और अन्य बाजारों से जोड़ने में रेल माल परिवहन की भूमिका निर्णायक है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेनें इसी बदलाव का हिस्सा हैं। जेएनपीटी मुंबई से वडोदरा तक लंबी दूरी की डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेन के सफल संचालन ने भी यह दिखाया है कि मौजूदा रेल नेटवर्क की क्षमता का अधिक प्रभावी उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है। उच्च क्षमता वाले विद्युत लोकोमोटिव इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।रेलवे का आधुनिकीकरण केवल गति और क्षमता का विषय नहीं है। रेल नेटवर्क जितना व्यस्त होगा, सुरक्षा और सिग्नलिंग की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण होती जाएगी।साबरमती -साणंद -जखवाड़ा तथा साबरमती -कलोल -भांडू मोटीदाऊ रेलखंड पर 122.57 किलोमीटर में स्वचालित ब्लॉक सिग्नलिंग प्रणाली का लोकार्पण इसी आवश्यकता का उत्तर है। स्वचालित सिग्नलिंग से ट्रेनों के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखने के साथ रेलखंड की परिचालन क्षमता बढ़ाने में सहायता मिलती है। इसका अर्थ है कि मौजूदा बुनियादी ढाँचे का बेहतर उपयोग करते हुए अधिक ट्रेनों को सुरक्षित ढंग से संचालित किया जा सकेगा।इसी सुरक्षा श्रृंखला में अहमदाबाद–पालनपुर और अहमदाबाद–सामाखियाली रेलखंड पर कुल 404 किलोमीटर में कवच प्रणाली का कार्य विशेष महत्व रखता है। लगभग 411 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना में अहमदाबाद–पालनपुर का 157 किलोमीटर और अहमदाबाद– सामाखियाली का 247 किलोमीटर रेलखंड शामिल है। भारत में विकसित कवच स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली है। यह तकनीक रेल परिचालन के दौरान सुरक्षा की अतिरिक्त परत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित की गई है।भारतीय रेल में कवच का विस्तार इस बात का संकेत है कि रेलवे सुरक्षा के क्षेत्र में देश अपनी स्वदेशी तकनीकी क्षमता को व्यापक स्तर पर लागू कर रहा है।साबरमती–सरखेज रेल लाइन के दोहरीकरण का शिलान्यास भी अहमदाबाद क्षेत्र की बढ़ती यात्री और माल परिवहन आवश्यकताओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।रेल नेटवर्क पर यातायात बढ़ने के साथ अतिरिक्त लाइन उपलब्ध होना परिचालन में अधिक लचीलापन प्रदान करता है।इससे भविष्य में अधिक ट्रेनों के संचालन के लिए क्षमता बढ़ सकती है और यात्री तथा माल सेवाओं को गति देने में सहायता मिल सकती है।भारतीय रेल में हो रहा यह बदलाव केवल पटरियों, इंजनों और सिग्नलिंग तक सीमित नहीं है।यह आत्मनिर्भर भारत की व्यापक अवधारणा से भी जुड़ा है। वंदे भारत जैसी स्वदेशी ट्रेनें, नमो भारत जैसी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी सेवाएँ, हाइड्रोजन ट्रेन की दिशा में किए जा रहे प्रयास, आधुनिक एलएचबी कोच, जैव शौचालय और देश में निर्मित उच्च क्षमता वाले लोकोमोटिव भारतीय रेल की तकनीकी यात्रा का हिस्सा हैं। आधुनिक लोकोमोटिव की लागत में लगभग 94 प्रतिशत हिस्सा देश में निर्मित होने का उल्लेख इस बात को रेखांकित करता है कि रेल तकनीक में स्वदेशी उत्पादन क्षमता लगातार मजबूत हो रही है।इस परिवर्तन का आर्थिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। रेल माल परिवहन की क्षमता बढ़ने का सीधा संबंध उद्योग,कृषि और व्यापार की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता से है।यदि माल कम समय में,अधिक मात्रा में और अधिक दक्षता के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचता है तो उसका प्रभाव केवल रेलवे की आय तक सीमित नहीं रहता।इससे उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखला, बाजार और निर्यात तक पूरी आर्थिक श्रृंखला प्रभावित होती है। गुजरात जैसे औद्योगिक राज्य में आधुनिक रेल अवसंरचना इसी कारण विकास की आधारशिला बनती है।गुजरात में रेलवे निवेश के बढ़ते स्तर को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वर्ष 2014 से पहले के पाँच वर्षों में गुजरात के लिए रेलवे बजट लगभग 589 करोड़ रुपये था,जबकि वर्ष 2026-27 में यह बढ़कर 17,366 करोड़ रुपये हो गया है। नई रेल लाइन, दोहरीकरण, विद्युतीकरण, आधुनिक सिग्नलिंग,माल परिवहन और यात्री सुविधाओं से संबंधित परियोजनाओं का विस्तार राज्य की आर्थिक गतिविधियों के साथ रेल नेटवर्क को जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण है।साबरमती की इस पहल का व्यापक संदेश यही है कि भारतीय रेल अब केवल यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था नहीं रह गई है।यह ऊर्जा संक्रमण,पर्यावरण संरक्षण, औद्योगिक विकास, स्वदेशी तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक व्यापक बुनियादी ढाँचा बन रही है।एलएनजी संचालित ट्रेन स्वच्छ ऊर्जा की दिशा दिखाती है, डब्ल्यूएजी-12 माल परिवहन की नई शक्ति का परिचय देता है, स्वचालित सिग्नलिंग रेल परिचालन की क्षमता बढ़ाती है और कवच सुरक्षा की स्वदेशी तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है। साबरमती–सरखेज दोहरीकरण इस बदलते नेटवर्क की क्षमता को आगे बढ़ाने वाली एक और कड़ी है।साबरमती की पहचान इतिहास,स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक गुजरात की विकास यात्रा से जुड़ी रही है।अब यही साबरमती भारतीय रेल के उस नए दौर का भी साक्षी बन रहा है जिसमें गति के साथ सुरक्षा, क्षमता के साथ तकनीक,विकास के साथ पर्यावरण और आधुनिकीकरण के साथ आत्मनिर्भरता को जोड़ा जा रहा है। रेल की पटरियों पर दौड़ती नई ऊर्जा और नई तकनीक आने वाले भारत की उस तस्वीर का संकेत है, जहाँ परिवहन केवल दूरी कम नहीं करता,बल्कि विकास की गति को भी नई दिशा देता है।





