सियासी चौराहे पर अखिलेश का ‘PDA’ प्रयोग

Akhilesh's 'PDA' experiment at the political crossroads

अशोक भाटिया

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से नए नारों, अनूठे सामाजिक गठबंधनों और चौंकाने वाले वैचारिक मोड़ों के लिए जानी जाती रही है। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक बार फिर अपने चर्चित राजनीतिक सूत्र ‘PDA’ की एक नई और भावनात्मक व्याख्या पेश की है। अगस्त 2026 के इस सियासी माहौल में, जब सभी दल भविष्य की रणनीतियों को धार देने में जुटे हैं, अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से घोषणा की कि PDA का असली और मूल भावनात्मक सिद्धांत दरअसल “प्रेम, दया और अपनापन” है। भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए उन्होंने तर्क दिया कि सत्ताधारी दल में पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को स्थान तो मिल सकता है, लेकिन सच्चा सम्मान नहीं मिल सकता, क्योंकि वहाँ इस भावनात्मक जुड़ाव की कमी है।

यह पहली बार नहीं है जब अखिलेश यादव ने अपने इस प्रिय नारे की री-ब्रांडिंग की है。 अभी कुछ ही दिनों पहले, समाजवादी विचारक जनेश्वर मिश्र की जयंती के अवसर पर उन्होंने राजनीति के पंडितों को चौंकाते हुए कहा था कि PDA में ‘PD’ का एक अर्थ ‘पंडित’ भी है। उस समय उन्होंने ‘P’ से पीड़ित और पंडित, ‘D’ से दलित और ‘A’ से आधी आबादी (महिलाएं) तथा ‘अच्छे अगड़े’ को जोड़कर एक नया ‘पंडित फॉर्मूला’ या ‘ब्राह्मण कार्ड’ खेलने का प्रयास किया था। राजनीति के एक बेहद सधे हुए और आक्रामक नारे को अचानक इस तरह के भावनात्मक और सर्ववर्ण-समावेशी आवरण में लपेटने की यह कोशिश सहज नहीं दिखती। यह बदलाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के भीतर चल रहे गहरे वैचारिक मंथन और साथ ही एक बड़ी रणनीतिक बेचैनी को भी रेखांकित करता है।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें उस मूल राजनीतिक संदर्भ को याद करना होगा जहाँ से PDA का जन्म हुआ था। साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान अखिलेश यादव ने ‘पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक’ के तौर पर PDA का नारा उछाला था। यह नारा विशुद्ध रूप से जातिगत और धार्मिक पहचान पर आधारित एक ठोस सामाजिक ब्लॉक बनाने की कोशिश थी। इसने सपा के पारंपरिक यादव-मुस्लिम (Y-M) समीकरण का दायरा बढ़ाकर गैर-यादव पिछड़ी जातियों को एक मंच पर लाने का काम किया था। लेकिन राजनीति कभी एक जगह ठहरती नहीं है। 2024 की सफलता के बाद जैसे ही पार्टी आगामी राजनीतिक चुनौतियों की ओर बढ़ी, अखिलेश यादव को शायद इस बात का अहसास हुआ कि सिर्फ जातिगत ध्रुवीकरण के सहारे सत्ता तक नहीं पहुँचा जा सकता।

इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति हमेशा से जातियों के विभाजन से ऊपर उठकर ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के मूल मंत्र पर आधारित रही है। भाजपा ने बिना किसी भेदभाव के हर जाति, वर्ग और संप्रदाय को मुख्यधारा से जोड़ा है। उज्ज्वला योजना, राशन वितरण, पीएम आवास योजना और आयुष्मान भारत जैसे लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ बिना किसी जातिगत चश्मे के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचा है। यही कारण है कि अखिलेश यादव को अब अपनी केवल ‘पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक’ वाली संकीर्ण छवि से बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है और वे भाजपा की इसी सर्वसमावेशी विकास नीति की नकल करने का प्रयास कर रहे हैं।

राजनीतिक नजरिए से देखें तो अखिलेश यादव का यह नया प्रयोग एक गंभीर वैचारिक अंतर्विरोध और राजनीतिक अवसरवाद को जन्म देता है। समाजवादी पार्टी पिछले लंबे समय से उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक ‘जाति जनगणना’ और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के मुद्दे पर सबसे मुखर रही है। जाति जनगणना की मांग पूरी तरह से समाज को टुकड़ों में बांटने और सामाजिक विद्वेष फैलाने की राजनीति पर टिकी है। यह मांग मानती है कि समाज में संसाधनों और सत्ता का बंटवारा जातियों की आबादी के अनुपात में होना चाहिए, जो सीधे तौर पर समाज के एक बड़े वर्ग को अलग-थलग करने की कोशिश है।

लेकिन, जब अखिलेश यादव अचानक इसी नारे को ‘प्रेम, दया और अपनापन’ जैसे बेहद भावुक शब्दों से परिभाषित करने लगते हैं, तो उनकी वैचारिक दुविधा साफ उजागर हो जाती है। सवाल यह उठता है कि जो पार्टी हर मंच पर खड़े होकर समाज को जातियों में बांटने और आंकड़ों की बात करती है, वह अचानक ‘दया और अपनत्व’ का स्वांग कैसे रच सकती है? क्या शोषित और पिछड़े वर्गों को केवल चुनाव के समय याद किया जाता है और बाद में सवर्णों को रिझाने के लिए परिभाषा बदल दी जाती है? यह विरोधाभास इसलिए भी गहरा है क्योंकि ‘दया’ हमेशा मजबूत व्यक्ति कमजोर पर दिखाता है। जब अखिलेश यादव ‘D’ का मतलब ‘दया’ बताते हैं, तो वे अनजाने में ही दलितों और पिछड़ों को हकदार के बजाय ‘दया का पात्र’ बना देते हैं। एक तरफ जाति जनगणना के जरिए समाज में लकीर खींचना और दूसरी तरफ ‘प्रेम और अपनत्व’ के जरिए उसी लकीर को मिटाने का नाटक करना—सपा की रणनीति की इसी खोखली वैचारिक बुनियाद को दिखाता है।

इसीलिए अखिलेश यादव जब PDA को ‘प्रेम, दया और अपनापन’ का नया आवरण देते हैं, तो उनका सामना उत्तर प्रदेश की जनता की यादों में दर्ज समाजवादी पार्टी के पुराने शासनकाल से होता है। राजनीतिक विश्लेषक और आम जनता इस बात को भूली नहीं है कि सपा सरकार के दौरान राज्य की कानून-व्यवस्था किस कदर चरमरा गई थी। उस दौर में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का मुहावरा चरितार्थ होता था, जहाँ संगठित अपराध, जमीनों पर कब्जे और दंगों का एक ऐसा माहौल था जिसने व्यापारियों, महिलाओं और आम नागरिकों को असुरक्षित महसूस कराया।

इसके विपरीत, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश को ‘दंगा मुक्त’ और सुरक्षित राज्य बनाकर एक नजीर पेश की है। भाजपा शासन ने अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई, जिसने राज्य में कानून का इकबाल बुलंद किया। आज उत्तर प्रदेश की महिलाएं रात में भी बेखौफ बाहर निकल सकती हैं, और उद्योगपति बिना किसी रंगदारी के डर के निवेश कर रहे हैं। ऐसे में, अखिलेश यादव का ‘प्रेम और अपनापन’ का यह नया नैरेटिव दरअसल सपा की उस पुरानी ‘दबंगई और तुष्टिकरण’ वाली छवि को धोने की एक हताश कोशिश नजर आता है। जनता यह बखूबी समझती है कि कानून-व्यवस्था केवल मीठे शब्दों से नहीं, बल्कि एक मजबूत और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली सरकार के प्रशासनिक हंटर से सुधरती है, जो फिलहाल भाजपा के पास है।

इस वैचारिक भटकाव के पीछे समाजवादी पार्टी की कुछ व्यावहारिक मजबूरियां भी साफ नजर आती हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी लगातार कमजोर हो रही है, जिससे दलित मतों का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक ठिकाने की तलाश में है। अखिलेश यादव इस बड़े वर्ग को यह संदेश देना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी अब केवल एक या दो जातियों की पार्टी नहीं है, बल्कि यहाँ उन्हें ‘अपनापन’ और सम्मान मिलेगा। इसके साथ ही, भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पुनरुत्थान (जैसे भव्य राम मंदिर और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण) और मजबूत कानून-व्यवस्था के एजेंडे की काट ढूंढना सपा के लिए असंभव साबित हो रहा है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश को ‘दंगा मुक्त’ और सुरक्षित राज्य बनाया है, जिससे व्यापारी, महिलाएं और युवा खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं।

इस मजबूत प्रशासनिक छवि की काट के लिए सपा को एक ऐसा नैरेटिव चाहिए था जो बहुसंख्यक समाज (जिसमें सवर्ण भी शामिल हैं) को डराए या दूर न करे। ‘प्रेम, दया और अपनापन’ के जरिए अखिलेश दरअसल भाजपा के उस विकासवादी और सांस्कृतिक नैरेटिव को कुंद करना चाहते हैं जो विपक्षी गठबंधन को जातिवादी या तुष्टिकरण करने वाला बताता है। वे कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर पर चल रही ‘मोहब्बत की दुकान’ वाली फ्लॉप राजनीति की तर्ज पर प्रादेशिक स्तर पर अपनी एक खोखली वैचारिक लाइन खींचना चाहते हैं।

अखिलेश यादव का यह ‘PDA रूपी प्रयोग’ राजनीति में कितना सफल होगा, यह तो समय ही बताएगा। भारतीय मतदाता बेहद समझदार है; वह नारों के पीछे छिपी असली मंशा और जमीन पर पार्टी के कार्यकर्ताओं के पुराने व्यवहार को बहुत बारीकी से देखता है। यदि समाजवादी पार्टी का जमीनी कैडर अब भी पुरानी सोच, जातिवाद और दबंगई की राजनीति से बाहर नहीं निकल पाया है, तो नेतृत्व द्वारा दी गई ‘प्रेम, दया और अपनापन’ की यह नई परिभाषा केवल कागजी और सोशल मीडिया की पोस्ट बनकर रह जाएगी।

इसके विपरीत, भाजपा का मजबूत संगठन, राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्धता और जमीन पर काम करने वाले अनुशासित कार्यकर्ता जनता के बीच अटूट विश्वास बनाए हुए हैं। इस तरह बार-बार अपनी ही मूल परिभाषा को बदलने से सपा के मुख्य कैडर—पिछड़ों और दलितों—के बीच भी एक अविश्वास का संदेश जा रहा है। उन्हें लग रहा है कि उनके अधिकारों की लड़ाई को केवल सत्ता पाने के लिए और अन्य वर्गों को साधने के लिए हल्का किया जा रहा है। राजनीति में अवसरवाद की एक सीमा होती है। अखिलेश यादव इस समय उसी अवसरवाद के जाल में उलझ चुके हैं, जहाँ एक तरफ समाज को बांटने वाली जाति जनगणना की मांग है और दूसरी तरफ भाजपा की तरह सर्वसमावेशी बनने का खोखला दिखावा। जनता इस अंतर को बहुत अच्छे से समझती है, और आगामी चुनावों में वह इस वैचारिक विरोधाभास का सटीक जवाब देगी।