गोपेन्द्र नाथ भट्ट
राजस्थान की धरती ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में केवल रणभूमि के शौर्य की ही गाथा नहीं लिखी, बल्कि जनजागरण, सामाजिक सुधार और लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैसे इसकी नींव मेवाड़ में महाराणा प्रताप के मुगलो की अधीनता स्वीकार नहीं करने के जयघोष के साथ ही शुरू हो गई थी और कालांतर में महाराजा सूरजमल ने भी अंग्रेजी हकूमत को लोहे के चने चबाने को मजबूर कर दिया था।
राजस्थान और गुजरात की सीमा पर मानगढ़ धाम पर गोबिंद गुरु के अनुयायियों पर अंग्रेजी सेना द्वारा किए गए गोलीकांड में 1500 आदिवासियों के बलिदान की घटना भी कोई कम उल्लेखनीय नहीं है। इसीलिए मानगढ़ को राजस्थान का जलियावाला बाग कहा जाता है। मानगढ़ की घटना पंजाब के जलियांवाला बाग से भी बड़ी घटना मानी जाती है। 1857 की क्रांति से लेकर 1947 की आजादी तक राजस्थान की रियासतों में चले जनआंदोलनों ने ब्रिटिश सत्ता के साथ-साथ सामंती निरंकुशता को भी चुनौती दी थी। नसीराबाद और आऊवा की क्रांतिकारी घटनाएं इस संघर्ष के गौरवपूर्ण अध्याय हैं। आऊवा में ठाकुर कुशलसिंह चांपावत के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सत्ता को कड़ी चुनौती दी थी।
बीसवीं सदी में राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलनों ने स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक जनाधार दिया। मेवाड़, जयपुर, मारवाड़, बीकानेर, कोटा और अन्य रियासतों में प्रजामंडलों ने उत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की मांग उठाई। इन आंदोलनों का महत्व इसलिए भी बड़ा था क्योंकि इन्होंने देशी रियासतों की जनता को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा। राजस्थान सरकार के अभिलेखों के अनुसार प्रजामंडलों और राष्ट्रीय कांग्रेस के संयुक्त संघर्ष ने रियासतों के भारत संघ से अलग रहने की संभावनाओं को कमजोर किया।
इस संघर्ष में विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जमनालाल बजाज, अर्जुनलाल सेठी, हीरालाल शास्त्री, जयनारायण व्यास, भोगी लाल पंड्या, गौरी शंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी सहित अनेक सेनानियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजस्थान में स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं था; इसके साथ ही यहां किसान, मजदूर, वंचित और आमजन के अधिकारों की लड़ाई भी जुड़ी हुई थी। राजस्थान राज्य अभिलेखागार में आज भी स्वतंत्रता सेनानियों के आंदोलनों से जुड़े दस्तावेज और संस्मरण सुरक्षित हैं।
आजादी के साथ देश के विभाजन की त्रासदी सामने आई। पश्चिमी पंजाब और सिंध से लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर भारत आए। राजस्थान भौगोलिक निकटता के कारण विस्थापितों के पुनर्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बना। सिंध और पश्चिमी पंजाब से आए लोगों को राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में बसाया गया। उनके लिए आवास, रोजगार और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने में प्रशासन के साथ समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता सेनानी और बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने दौलतमल भंडारी ने भी सिंध और पश्चिमी पंजाब के शरणार्थियों के पुनर्वास में योगदान दिया।
विस्थापितों ने भी राजस्थान को केवल अपना आश्रय नहीं, बल्कि अपनी नई कर्मभूमि बनाया। व्यापार, उद्योग, शिक्षा और सेवा क्षेत्रों में उन्होंने अपनी मेहनत से नई आर्थिक ऊर्जा पैदा की। श्रीगंगानगर, जयपुर, अजमेर, जोधपुर और अन्य क्षेत्रों में बसे अनेक परिवारों ने राजस्थान की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को नई दिशा दी।
इस प्रकार राजस्थान का योगदान दोहरी विरासत का प्रतीक है एक ओर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और दूसरी ओर विभाजन की पीड़ा झेलकर आए लोगों को सम्मानजनक जीवन देने की मानवीय जिम्मेदारी। यही राजस्थान की उस संस्कृति का परिचायक है, जिसमें वीरता के साथ करुणा, संघर्ष के साथ सहयोग और राष्ट्रभक्ति के साथ मानवता भी समान रूप से प्रतिष्ठित रही है।





