दिलीप कुमार पाठक
राजनीति में समय का पहिया कब घूम जाए, कोई नहीं कह सकता। अभी कुछ महीनों पहले की तो बात है जब बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का खाता तक नहीं खुला था। उनके लगभग सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी और आलोचकों ने मान लिया था कि पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने वाले पीके जमीन पर फेल हो गए हैं। लेकिन बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने पूरी कहानी बदल दी है। प्रशांत किशोर ने किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के बजाय सीधे दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के गढ़ में सेंध लगा दी। बांकीपुर सीट पर पिछले तीन दशकों से भाजपा का एकछत्र राज था, जिसे ढहाकर प्रशांत किशोर ने 19 हजार से ज्यादा वोटों से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस इकलौती जीत ने बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू कर दिया है। पीके की इस जीत पर अब सियासी कड़वाहट भी पिघलती दिख रही है। राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और बेटी रोहिणी आचार्य ने खुले दिल से प्रशांत किशोर को इस शानदार जीत की शुभकामनाएं दी हैं। इस कदम ने बिहार की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा छेड़ दी है।
राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा तबका हमेशा यह नैरेटिव चलाता रहा है कि प्रशांत किशोर पर्दे के पीछे से भाजपा के लिए काम करते हैं और वे भगवा दल की ‘बी-टीम’ या उनके आदमी हैं। आलोचक कहते थे कि पीके केवल विपक्षी वोटों को काटने के लिए मैदान में उतरे हैं। लेकिन बांकीपुर के नतीजों ने इन सभी कयासों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। भाजपा के सबसे मजबूत और पारंपरिक गढ़ को सीधे चुनौती देकर ध्वस्त करना यह साबित करता है कि पीके किसी की कठपुतली नहीं हैं। लोकतंत्र में जनता बहुत समझदार होती है; वह अफवाहों पर नहीं, बल्कि धरातल पर दिख रहे प्रयासों पर मुहर लगाती है। यह जीत साफ संदेश देती है कि जब जनता पारंपरिक चेहरों से ऊब जाती है, तो वह नए और तार्किक विकल्प को सिर-आंखों पर बिठाने में देर नहीं करती। प्रशांत किशोर का विधानसभा में पहुंचना केवल जन सुराज के लिए एक सीट का फायदा नहीं है, बल्कि सदन के भीतर एक बेहद धारदार और सशक्त विपक्ष की एंट्री है। पीके की राजनीति पारंपरिक नेताओं जैसी नहीं है; वे जब बोलते हैं तो उनके पास आंकड़ों का पुलिंदा और जमीनी तथ्यों की मजबूत ढाल होती है। ऐसे में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए सरकार चलाना और सदन में अपनी नीतियों का बचाव करना अब पहले जैसा आसान नहीं रहने वाला है। इसके साथ ही, विपक्ष के प्रमुख चेहरे तेजस्वी यादव के लिए भी यह एक नई चुनौती होगी। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर तेजस्वी अब तक विपक्ष की इकलौती बड़ी आवाज थे, लेकिन अब सदन के भीतर प्रशांत किशोर अपनी तार्किक और आक्रामक शैली से एक बड़ा स्पेस तैयार करेंगे, जिससे सूबे की राजनीति का त्रिकोणीय होना तय है।
बिहार के इस सियासी भूचाल के बीच, मध्य प्रदेश से आई खबर भी भाजपा के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने अपनी पूरी सरकारी ताकत झोंक दी थी। मुख्यमंत्री से लेकर पूरी कैबिनेट जमीन पर उतरी हुई थी, लेकिन जनता ने कांग्रेस के घनश्याम सिंह पर भरोसा जताते हुए उन्हें छह हजार से अधिक वोटों से विजयी बना दिया। दतिया की इस जीत ने ठंडे पड़े कांग्रेस कार्यकर्ताओं में मानों नए पंख लगा दिए हैं।
इस चुनाव में भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का पक्ष बेहद दिलचस्प रहा। टिकट कटने के बावजूद उन्होंने पार्टी के फैसले को स्वीकार किया और चुनाव प्रचार में भी जुटे रहे। हालांकि, चुनावी नतीजों के बाद दतिया की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई। खुद नरोत्तम मिश्रा के पोलिंग बूथ नंबर 121 पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। हार के बाद नरोत्तम मिश्रा के बंगले पर ताला लटका दिखा, वहीं दूसरी तरफ भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी ने हार का ठीकरा भीतरघातियों पर फोड़ा। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि जो लोग भाजपा को अपनी मां कहते हैं और फिर पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें अपने इस कृत्य पर गंभीरता से सोचना चाहिए। इस बयान ने साफ कर दिया कि भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था और गुटबाजी ने पार्टी को ले डूबी। दतिया की इस ऐतिहासिक जीत के सबसे बड़े नायक बनकर उभरे हैं एमपी कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी। विपरीत परिस्थितियों में भी सूझबूझ और आक्रामक चुनाव प्रबंधन के दम पर उन्होंने भाजपा के इस मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया, जिससे राज्य की राजनीति में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ अचानक बहुत ऊपर चला गया है। जीतू पटवारी ने इसे सीधे तौर पर भाजपा के अहंकार और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का जनादेश बताया है। दूसरी तरफ, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के बावजूद मोहन यादव इस चुनाव में कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाए। पूरी सत्ता और मशीनरी का साथ होने के बाद भी दतिया को न बचा पाना मुख्यमंत्री की नेतृत्व क्षमता और जमीनी पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि उन्होंने यह कहकर हार को संभालने की कोशिश की कि कांग्रेस की सीट कांग्रेस के पास ही रही है, लेकिन अंदरूनी तौर पर यह पराजय उनकी साख को कमजोर करती है। बिहार से लेकर मध्य प्रदेश तक के ये चुनावी नतीजे साफ इशारा कर रहे हैं कि जनता अब केवल बड़े नामों या सत्ता के रसूख को देखकर वोट नहीं दे रही। लोकतंत्र में मतदाता अब जागरूक हो चुका है; वह जमीन पर ठोस विकल्प, आंतरिक गुटबाजी से परे मजबूत नेतृत्व और अपनी बुनियादी जरूरतों की बात करने वाले नेताओं को चुन रहा है। चाहे वे प्रशांत किशोर हों या जीतू पटवारी, आने वाला वक्त इन नए सियासी चेहरों के इर्द-गिर्द ही घूमने वाला है।





