जिनके घर शीशे के हों वह दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते

Those who live in glass houses do not throw stones at others' houses

तनवीर जाफ़री

देश में इन दिनों छात्रों और युवा पीढ़ी अर्थात Gen Z के छिड़े घमासान के बीच Gen Z को ही केंद्र में रखकर कुछ ऐसे बयान सुनने में आ रहे हैं जिनकी न तो भाषा शालीन है न ही बयान देने वालों का व्यक्तित्व ही ऐसा है जिसे देश में शिक्षा,रोज़गार,पारदर्शिता,जवाबदेही,भ्रष्टाचार,लोकतंत्र तथा संवैधानिक मूल्यों को लेकर संघर्षरत युवा पीढ़ी व छात्रों से जोड़ा जा सके। इस संबंध में सबसे दिलचस्प वाकयुद्ध बाबा रामदेव व फ़िल्म अभिनेत्री व भारतीय जनता पार्टी सांसद कंगना रनौत के बीच छिड़ा । इस वाक्युद्ध ने एक दूसरे की पोल पट्टी खोलकर रख दी। ग़ौरतलब है कि बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक मामले के विरोध में प्रदर्शन कर रही युवा पीढ़ी पर तीखी टिप्पणियां की थीं। कंगना ने प्रदर्शनकारी युवाओं को ‘गटर जनरेशन’ कहकर संबोधित किया था। उन्होंने इंस्टाग्राम पर लिखा था कि “Gen Z के आंदोलनों के वीडियो देखकर मुझे झटका लगा। मैंने अपनी ज़िंदिगी में इतना अजीब और इतना बुरा कुछ नहीं देखा है। इन्हें (युवा पीढ़ी को) किसने जन्म दिया है? कौन इनका पालन-पोषण कर रहा है? यह गटर की पीढ़ी है।” कंगना ने प्रदर्शन के दौरान युवाओं द्वारा इस्तेमाल की जा रही भाषा को बेहद असभ्य और अमर्यादित बताया था। उन्होंने इसे “उल्टी आने जैसा” व्यवहार क़रार दिया था। प्रदर्शनकारी छात्राओं और युवतियों पर निशाना साधते हुए कंगना ने कहा था कि इन लड़कियों का आचरण बेहद निराशाजनक है। उन्होंने कहा कि “यह लड़कियां भविष्य में अच्छी गृहिणी भी नहीं बन सकतीं।” कंगना ने केवल छात्रों को ही नहीं बल्कि उनके माता-पिता को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने सवाल उठाया कि माता-पिता अपने बच्चों को ऐसे संस्कार कैसे दे सकते हैं, जो उन्हें सार्वजनिक रूप से इस तरह के अभद्र व्यवहार की अनुमति देते हैं?

कंगना रनौत के इस बयान की ख़ासकर इसकी शब्दावली की चारों ओर घोर आलोचना की गयी। परन्तु सबसे तीखी प्रतिक्रिया योग गुरु एवं व्यवसायी बाबा रामदेव द्वारा एक टी वी चैनल पर इसी संबंध में पूछे गये एक सवाल पर दी गयी। जब बाबा रामदेव से कंगना के ‘गटर जेनरेशन’ वाले बयान पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कंगना की मानसिक स्थिति, उनकी योग्यता और उनके अतीत पर ही गंभीर सवाल उठा दिये । रामदेव ने कहा कि “उनकी क्वालिफ़िकेशन (शिक्षा )क्या है? उनका बचपन कैसा रहा है? उनकी जवानी कैसी रही है? उनके पहले के कारनामे कैसे रहे हैं? मैं ऐसे लोगों के बारे में बात नहीं करना चाहता। किसी भी देश के जवानों को और जेन-ज़ी को ‘गटर’ बोलना यह बिगड़े हुए दिमाग़ की निशानी है। यह ग़लत बात है और उनकी पार्टी (बीजेपी) को इस पर संज्ञान लेना चाहिए।” हमेशा भाजपा सरकार की पैरवी करने वाले बाबा रामदेव के इस बयान को लेकर वैसे भी लोग आश्चर्यचकित हैं कि आख़िर उन्होंने किस तरह सत्ता के विरोध में आवाज़ उठाने की हिम्मत जुटाई ? कुछ लोग तो उनके इस बयान की वजह से उन्हें राजनीति का ‘मौसम विज्ञानी ‘ भी कहने लगे हैं। बहरहाल सवाल यह है कि रामदेव ने कंगना रानौत को लेकर इतने सारे सवाल एक साथ कैसे और किस आधार पर खड़े किये ? और क्या वजह थी कि रामदेव के इन सवालों से तिलमिलाकर कंगना को भी रामदेव पर तीखे जवाबी बाण छोड़ने पड़े ?

दरअसल कंगना रनौत ने स्वयं अपने अनेक इंटरव्यू में अपने शुरुआती जीवन, चरित्र, नशे और संघर्षों को लेकर बेहद चौंकाने वाले और बेबाक बयान दिए थे। उनके ये बयान समय-समय पर सोशल मीडिया और मीडिया गलियारों में बड़े विवाद की वजह बने हैं। कंगना रनौत ने साल 2020 में अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया था। इस वीडियो में उन्होंने खुलकर स्वीकार किया था कि वह एक समय पर ड्रग्स की लत का शिकार हो चुकी थीं। उन्होंने कहा था कि “जब मैं घर से भागी थी, उसके डेढ़-दो साल के अंदर ही मैं एक फ़िल्म स्टार भी थी और एक ‘ड्रग एडिक्ट’ भी थी।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि शुरुआती दिनों में उनके एक ‘मेंटॉर’ जो बाद में प्रताड़ित करने वाले बन गए, उनकी ड्रिंक्स में नशीली चीज़ें मिलाकर देते थे ताकि वह पुलिस के पास न जा सकें। बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे योग और स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं की मदद से नशे की इस लत से बाहर आ पाईं। उसी 2020 के वीडियो में अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कंगना ने खुद को ‘ख़तरनाक’ बताया था। उन्होंने कहा था कि जब वह कम उम्र में घर से भागकर मुंबई आई थीं, तो बहुत ग़लत लोगों के चंगुल में फंस गई थीं। उन्होंने कहा था कि “मेरी ज़िंदिगी में इतने स्कैंडल चल रहे थे और मैं ऐसे लोगों के हाथों में पड़ गई थी, जहां से सिर्फ़ मौत ही मुझे बचा सकती थी। यह सब मेरी ज़िंदिगी में तब हो रहा था जब मैं सिर्फ़ एक टीनेजर (किशोरी) थी। सोच लो, मैं कितनी ख़तरनाक हूँ! ” कंगना ने यह भी बताया था कि उनके पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन जब उन्होंने मना किया तो उनके पिता ने उन्हें थप्पड़ मारा था, जिसके बाद उन्होंने घर छोड़ दिया। वह महज़ 15-16 साल की उम्र में बिना पैसों के घर से भागकर दिल्ली और फिर मुंबई आ गई थीं।

वास्तव में कंगना की इस तरह की स्वीकारोक्ति को ही आधार बनाकर रामदेव ने उन्हें लेकर अनेक प्रश्न खड़े कर दिये। और प्रश्नों की उसी शब्दावली के अनुरूप ही कंगना ने भी रामदेव पर सीधा व्यक्तिगत प्रहार करते हुये कहा कि “बाबा जी, मेरी जवानी या बेडरूम के बारे में आप दिन में सपने मत देखिए। कोई सिर्फ़ अफ़वाहों और गॉसिप के आधार पर ही ऐसा अंदाज़ा लगा सकता है।” कंगना ने पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों वाले मामले की ओर इशारा करते हुये कहा कि “कम से कम मुझे कभी झूठे या फ़र्ज़ी मेडिकल दावों के लिए सुप्रीम कोर्ट से फटकार नहीं लगी है। मेरे दावे हमेशा ठोस तथ्यों पर आधारित होते हैं, न कि किसी अफ़वाह पर।” कंगना ने बाबा रामदेव को करारा जवाब देते हुए कहा, “इसलिए आप मुझे चरित्र का पाठ मत पढ़ाइए। मेरा चरित्र आपसे कहीं ज़्यादा बेहतर है, यहां कोई धोखाधड़ी/फ़्रॉड नहीं पकड़ी गई है।” कंगना द्वारा रामदेव इसतरह के शब्द बाण भी अकारण नहीं छोड़े गये। इसके पीछे रामदेव और उनकी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद के खिलाफ विभिन्न अदालतों विशेषकर सुप्रीम कोर्ट और सरकारी प्राधिकरणों द्वारा की गई कई गंभीर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाइयां शामिल हैं। कभी सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद को उन सभी दवाओं और उत्पादों के विज्ञापन और ब्रांडिंग करने से पूरी तरह रोक दिया, जो ‘ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954’ के तहत प्रतिबंधित बीमारियों को पूरी तरह ठीक करने का दावा करते थे कभी कोर्ट में लिखित आश्वासन देने के बावजूद भ्रामक विज्ञापन जारी रखने पर कोर्ट ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया। कभी कोर्ट ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाज़िर होने का आदेश दिया और उनकी क़ानूनी टीम को कड़ी फटकार लगाई। तो कभी उन्होंने अदालत में बिना शर्त माफ़ी मांगी अदालत ने “महज़ दिखावा” कहकर ख़ारिज कर दिया था। यहाँ तक कि कड़े अदालती रुख़ के बाद पतंजलि को देश के प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों में बड़े आकार में सार्वजनिक माफ़ीनामा प्रकाशित करना पड़ा। इस तरह के अनेक उदाहरण हैं जिनसे यह साबित होता है कि रामदेव व उनका व्यवसाय भी दूध का धुला नहीं। कुल मिलाकर कंगना रानौत हों या रामदेव दोनों ही अपने उज्जवल भविष्य के लिये चिंतित व संघर्षरत देश की युवा पीढ़ी के लिये आदर्श नहीं हो सकते न ही इनकी नसीहत या आलोचना युवाओं के पतन या उत्थान का कारण बन सकती है। हाँ युवा पीढ़ी के बहाने इनके बीच चले वाक्युद्ध से यह ज़रूर साफ़ हो गया है कि जिनके अपने घर शीशे के हों उन्हें दूसरों के घरों पत्थर हरगिज़ नहीं फेंकना चाहिये।