मोबाइल की घातक चाह का आत्मघाती दलदल और दम तोड़ते नौनिहाल

The suicidal quagmire of a deadly obsession with mobile phones and the young lives being snuffed out

अशोक भाटिया

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से आई हालिया हृदयविदारक घटना ने आधुनिक समाज की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। एक उन्नीस वर्षीय किशोर ने महज एक महंगे आईफोन की मांग पूरी न होने पर पहाड़ी की चोटी से छलांग लगा दी। उसे बचाने की तीन घंटे की मर्मभेदी कोशिशों के बीच पिता ने उसे पकड़ना चाहा, पर दोनों का संतुलन बिगड़ गया और वे सैकड़ों फीट गहरी खाई में जा गिरे। इस भयावह मंजर को अपनी आंखों से देखने वाली बेबस मां ने भी बदहवास होकर मौत की उसी खाई में छलांग लगा दी। चंद पलों में, एक स्मार्टफोन की जिद ने हंसते-खेलते पूरे परिवार का अस्तित्व ही मिटा दिया। यह कोई अकेली घटना नहीं है। कुछ ही समय पहले गाजियाबाद में तीन सगी बहनों द्वारा डिजिटल लत और मानसिक तनाव के चलते की गई सामूहिक खुदकुशी की घटना ने भी देश को झकझोर दिया था। उत्तर प्रदेश के अमरोहा में 10 साल के मासूम बच्चे की रील देखते-देखते अचानक दिल का दौरा पड़ने से हुई मौत ने तो चिकित्सा जगत को भी हैरत में डाल दिया है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में पुरानी मोबाइल बैटरी के फटने से मासूम की जान जाने का मामला हो या ऑनलाइन गेम में पैसे हारने पर किशोरों द्वारा उठाए जाने वाले आत्मघाती कदम; ये सभी घटनाएं चिल्ला-चिल्लाकर कह रही हैं कि ‘मोबाइल की चाह’ अब सिर्फ एक लत नहीं, बल्कि हमारे नौनिहालों के लिए एक जानलेवा महामारी बन चुकी है।

आखिर वह कोमल बचपन, जो कभी तितलियों के पीछे भागने, कागजों की कश्ती तैरने और गलियों में मिट्टी से सराबोर होने में अपनी खुशी ढूंढता था, आज पांच इंच की इस कांच की स्क्रीन का गुलाम कैसे हो गया? यह सवाल आज हर उस घर का है जहां एक बच्चा चौबीस घंटे अपनी उंगलियों को स्क्रीन पर सरकाता रहता है। सरकार के आधिकारिक आर्थिक सर्वेक्षण तक में इस समस्या को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में चिह्नित किया चुका है। डॉक्टरों और न्यूरोलॉजिस्ट्स का स्पष्ट मानना है कि किशोरावस्था में बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता है। ऐसे में अत्यधिक और अनियंत्रित डिजिटल एक्सपोजर उनके सोचने की क्षमता को विकृत कर देता है। उनमें आवेग और चिड़चिड़ापन इस कदर बढ़ जाता है कि वे ‘ना’ सुनने की क्षमता पूरी तरह खो देते हैं। किसी वस्तु की मांग पूरी न होने पर या ऑनलाइन दुनिया में खुद को कमतर पाने पर वे सीधे अपनी जीवनलीला समाप्त करने जैसा भयावह कदम उठा लेते हैं।

इस विकट स्थिति के लिए किसी एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराकर हम अपनी सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते। इसके जिम्मेदार कई स्तरों पर मौजूद हैं। सबसे पहली और प्राथमिक जिम्मेदारी माता-पिता की है। आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़, काम के दबाव और अपनी व्यक्तिगत व्यस्तताओं के कारण पेरेंट्स ने स्मार्टफोन को एक ‘सस्ते बेबीसिटर’ या ‘डिजिटल लोरी’ के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। बच्चा रोया नहीं कि उसके हाथ में फोन थमा दिया गया, बच्चा खाना नहीं खा रहा तो स्क्रीन पर कार्टून चला दिया गया। शुरुआती दौर में जिस स्क्रीन को बहलावे का साधन समझा गया, वह धीरे-धीरे कब बच्चों के मानसिक तंत्र पर हावी हो गई, इसका अंदाजा अभिभावकों को तब लगता है जब पानी सिर से ऊपर बह चुका होता है। इसके साथ ही, बच्चों के स्क्रीन टाइम और वे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं, इस पर प्रभावी निगरानी रखने में पैरेंट्स पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। इस मायाजाल के पीछे बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों का व्यावसायिक लालच भी पूरी तरह जिम्मेदार है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, रील्स, शॉर्ट्स और ऑनलाइन बैटल गेम्स का एल्गोरिदम इस तरह से डिजाइन किया जाता है जो सीधे मानवीय मस्तिष्क में ‘डोपामाइन’ के स्तर को नियंत्रित करे। यह बिल्कुल किसी मादक पदार्थ के सेवन जैसा है। जैसे ही यूजर एक रील स्क्रॉल करता है, उसे एक नया रोमांच मिलता है, जिससे उसे लगातार फोन देखते रहने की लत लग जाती है। इन कंपनियों के पास बच्चों को हानिकारक कंटेंट, साइबर बुलिंग या अश्लीलता से बचाने के लिए कोई ठोस और फुलप्रूफ सुरक्षा फिल्टर मौजूद नहीं हैं। उनके लिए बच्चे सिर्फ एक ‘डेटा’ और मुनाफे का जरिया हैं। हम एक ऐसे समाज में तब्दील हो चुके हैं जहां कंक्रीट के जंगलों के बीच बच्चों के लिए खेल के मैदान खत्म हो चुके हैं। एकल परिवारों के बढ़ते चलन और पड़ोसियों से संवादहीनता के कारण आज का बच्चा बेहद अकेला है। जब उसे घर के भीतर अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए कोई सजीव साथी, दादा-दादी या दोस्त नहीं मिलते, तो वह इस अकेलेपन को भरने के लिए स्मार्टफोन की आभासी दुनिया की शरण लेता है। यह आभासी दुनिया उसे झूठी तसल्ली तो देती है, लेकिन असल जिंदगी में उसे और अधिक संवेदनशून्य, आत्मकेंद्रित और कमजोर बना देती है।

स्मार्टफोन की लत सिर्फ जानलेवा हादसों या खुदकुशी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अंदर ही अंदर हमारी आने वाली पीढ़ी की मानसिक और शारीरिक क्षमता को घुन की तरह खा रही है। स्क्रीन के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों में अनिद्रा (Insomnia), आंखों की गंभीर बीमारियां, मोटापा और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं आम हो चुकी हैं। इससे भी खतरनाक है उनका मानसिक स्वास्थ्य। जब एक बच्चा सोशल मीडिया पर दूसरों की ‘परफेक्ट’ जिंदगी या महंगे गैजेट्स देखता है, तो उसमें हीन भावना घर कर जाती है। वह यह समझने में असमर्थ रहता है कि स्क्रीन पर दिखने वाली दुनिया बनावटी है। इसी हीन भावना के वशीभूत होकर वह अपने माता-पिता पर महंगे फोन या साधनों के लिए दबाव बनाता है, और इंकार मिलने पर चरम कदम उठा लेता है।

छत्रपति संभाजीनगर की घटना हमारे लिए आखिरी चेतावनी की तरह है। अगर आज भी हमने अपनी आंखें नहीं खोलीं, तो डिजिटल एडिक्शन का यह अजगर न जाने कितने और परिवारों को निगल जाएगा। समाधान के लिए हमें एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। हर घर में ‘नो-गैजेट जोन’ और ‘नो-मोबाइल ऑवर्स’ निर्धारित होने चाहिए, जिसका पालन बच्चों के साथ-साथ माता-पिता भी करें। पैरेंटल ऐप्स और इंटरनेट फिल्टर्स का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए ताकि बच्चे की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। माता-पिता को अपने बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना होगा। बच्चों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि उनकी पहचान किसी महंगे गैजेट या सोशल मीडिया के लाइक्स से तय नहीं होती। उन्हें ‘ना’ सुनने और असफलताओं को स्वीकार करने का हौसला बचपन से ही देना होगा। सरकार को टेक कंपनियों और गेमिंग प्लेटफॉर्म्स के लिए अत्यंत सख्त नियम बनाने होंगे। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित करने वाले फीचर्स को इन-बिल्ट करना और हानिकारक वेबसाइट्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना वक्त का तकाजा है। शिक्षा व्यवस्था में भी ‘डिजिटल हाइजीन’ को एक अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

स्मार्टफोन विज्ञान का एक बेहतरीन आविष्कार है, लेकिन जब कोई आविष्कार इंसानी जान की कीमत पर हावी होने लगे, तो उसे वरदान नहीं, अभिशाप माना जाता है। नौनिहालों की जाती जान के लिए सीधे तौर पर हम सब जिम्मेदार हैं—वह माता-पिता भी जो फोन देकर निश्चिंत हो गए, वह समाज भी जिसने बच्चों से उनके खेल के मैदान छीन लिए, वह व्यवस्था भी जो तकनीक के इस बेलगाम घोड़े पर लगाम लगाने में सुस्त है। समय आ गया है कि हम बच्चों के हाथों से स्मार्टफोन छीनकर उन्हें फिर से वही पुरानी किताबें, मिट्टी के खिलौने और खुले आसमान के नीचे खेलने वाले खेल वापस लौटाएं। हमें यह याद रखना होगा कि एक आईफोन दोबारा खरीदा जा सकता है, लेकिन किसी मां-बाप के बुझ चुके घर का चिराग कभी दोबारा नहीं जल सकता।

अंततः, हमें यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग का यह संकट किसी एक घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, यह हमारी पूरी सभ्यता की परीक्षा है। तकनीक सुविधा के लिए थी, समर्पण के लिए नहीं। जब हम अपने बच्चों को समय देने के बजाय उनके हाथों में चमचमाता स्मार्टफोन थमाते हैं, तो असल में हम उनकी मासूमियत का सौदा कर रहे होते हैं। आज हर माता-पिता को खुद से यह कड़वा सवाल पूछना होगा—”क्या पांच इंच की उस बेजान स्क्रीन की कीमत, मेरे बच्चे की अनमोल मुस्कान और उसकी जिंदगी से ज्यादा है?”

यदि आज भी हमारा समाज इस सामूहिक मतिभ्रम से बाहर नहीं निकला, तो आने वाला इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। यह समय दोषारोपण का नहीं, बल्कि आत्म-मंथन और कड़े फैसलों का है। सरकारें नियम बनाएंगी, कंपनियां मुनाफा कमाएंगी, लेकिन अपने बच्चे को इस ‘सफेद जहर’ से बचाना अंततः हमारी अपनी जिम्मेदारी है। याद रखिए, बचपन दोबारा लौटकर नहीं आता, और खोई हुई सांसें किसी भी डिजिटल स्टोर पर वापस नहीं मिलतीं। आइए, आज ही संकल्प लें कि हम अपने घरों को तकनीक का गुलाम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का जीवंत केंद्र बनाएंगे।