मायावती भी चुनावी मूड में, भतीजे को कमान, सतीश मिश्रा को नई जिम्मेदारी

Mayawati also in election mood, nephew takes charge, Satish Mishra gets new responsibility

संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अब छह माह का समय बचा है, इसको देखते हुए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती ने अभी से जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। पार्टी के भीतर बीते कुछ हफ्तों में जो संगठनात्मक फेरबदल हुए हैं, उनसे साफ संकेत मिलता है कि बसपा इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। एक तरफ मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को संगठन और चुनाव प्रचार की अगुवाई सौंपी है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भरोसेमंद ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा का कद और बढ़ा दिया गया है। यह दोहरी रणनीति बसपा के सामाजिक समीकरण और पारिवारिक उत्तराधिकार, दोनों मोर्चों को साधने की कोशिश मानी जा रही है।बसपा में उत्तराधिकार को लेकर पिछले कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। एक समय मायावती ने आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, फिर विवादों के चलते उन्हें पार्टी पदों से हटाया भी गया। लेकिन विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही पार्टी ने उन्हें फिर से सक्रिय भूमिका में ला खड़ा किया है। अब आकाश आनंद राष्ट्रीय संयोजक के तौर पर सक्रिय हैं और उन्हें प्रत्याशियों के चयन की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनकी अगुवाई में होने वाले कार्यकर्ता सम्मेलनों में संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मुहर लगाई जाएगी। इस नई भूमिका के तहत आकाश आनंद ने 10 अगस्त को हाथरस के सादाबाद से अपने अभियान की शुरुआत की। इसके बाद 25 अगस्त को गौतमबुद्ध नगर के जेवर में भी उनकी अध्यक्षता में कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित होना तय है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, लखनऊ में हुई तीन दिवसीय बैठक के बाद यह फैसला लिया गया कि आकाश आनंद को अब यूपी और उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय भूमिका दी जाए, जबकि पहले उन्हें इन राज्यों की राजनीति से जानबूझकर दूर रखा गया था। पार्टी पदाधिकारियों का मानना है कि प्रचार अभियान की कमान संभालने से आकाश आनंद का सियासी कद और मजबूत होगा।

हालांकि मायावती ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि टिकट बंटवारे का अंतिम और सर्वोच्च फैसला सिर्फ वही लेंगी। इसमें आकाश आनंद की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होगी। राजनीतिक हलकों में इस बयान को शक्ति-संतुलन बनाए रखने की एक सोची-समझी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। मतलब साफ है कि प्रचार और संगठन की जिम्मेदारी भतीजे को, लेकिन असली सत्ता की डोर अभी भी मायावती के हाथ में ही रहेगी। इसी बीच बसपा ने एक और अहम संगठनात्मक फैसला लिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की जिम्मेदारियां और बढ़ा दी गई हैं। अब वे कानूनी और मीडिया से जुड़े कामकाज के साथ-साथ चुनाव आयोग से संबंधित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी संभालेंगे। मायावती ने खुद सोशल मीडिया पर लिखा कि यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के तहत पार्टी का जनाधार सभी वर्गों में मजबूत किया जा रहा है, साथ ही प्रत्याशियों के चयन और उनकी घोषणा की प्रक्रिया भी विधानसभा-स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलनों के जरिए चल रही है। उन्होंने दावा किया कि बसपा की इन तैयारियों से विरोधी दलों में बेचैनी बढ़ गई है।

सतीश चंद्र मिश्रा को दी गई यह नई जिम्मेदारी अचानक नहीं आई है। बसपा के लिए ब्राह्मण वोट बैंक हमेशा से एक अहम सामाजिक समीकरण रहा है, और मिश्रा दशकों से इस समीकरण के केंद्र में रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी के कई कद्दावर ब्राह्मण नेता एक-एक कर साथ छोड़ते गए हैं। पूर्व मंत्री नकुल दुबे 2022 में कांग्रेस में चले गए, पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय, रंगनाथ मिश्रा और विनय शंकर तिवारी जैसे नेता भी पार्टी से दूर हो चुके हैं। हाल ही में बसपा के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को भी पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किया गया। दिलचस्प बात यह है कि अंटू मिश्रा को सतीश चंद्र मिश्रा का करीबी माना जाता रहा है, और चर्चा यह भी थी कि वे चुनाव से पहले किसी दूसरे दल का रुख कर सकते हैं। इन घटनाक्रमों के बीच बसपा की सियासी नर्सरी से ब्राह्मण नेताओं का लगातार खिसकना पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में मायावती का सतीश मिश्रा पर भरोसा जताना और उनकी जिम्मेदारियां बढ़ाना, इस बिखराव को थामने और बचे-खुचे ब्राह्मण जनाधार को एकजुट रखने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी अब पूरी तरह से मिश्रा के चेहरे और उनके संगठनात्मक अनुभव पर दांव लगाना चाहती है, ताकि सर्व समाज के जनाधार वाली अपनी पुरानी छवि को दोबारा मजबूत किया जा सके।

दोहरी रणनीति के मायने

मायावती की यह दोहरी रणनीति एक तरफ पारिवारिक उत्तराधिकार को संस्थागत रूप देना, दूसरी तरफ सामाजिक समीकरणों को संभालने के लिए अनुभवी चेहरों को आगे रखना और बसपा के भविष्य की दिशा तय करने वाली मानी जा रही है। आकाश आनंद के जरिए पार्टी युवा और सक्रिय नेतृत्व का संदेश देना चाहती है, जबकि सतीश मिश्रा के जरिए पार्टी अपने परंपरागत सामाजिक आधार और अनुभव को बरकरार रखने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा के लिए 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि पार्टी के अस्तित्व से जुड़ा सवाल भी है। बीते कुछ चुनावों में लगातार कमजोर होते प्रदर्शन के बाद पार्टी को अपने कोर वोट बैंक के साथ-साथ नए सामाजिक समीकरण बनाने की जरूरत है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आकाश आनंद की सक्रियता और सतीश चंद्र मिश्रा की नई भूमिका मिलकर बसपा के जनाधार को कितना विस्तार दे पाती है, और क्या पार्टी विरोधी दलों की उस बेचैनी को हकीकत में बदल पाती है, जिसका दावा मायावती खुद कर रही हैं।