अमेरिका में अब चलेगा इंडिया इलेक्शन मॉडल?

Will the Indian election model now work in America?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की चुनावी व्यवस्था को लेकर देश के भीतर भले ही चुनाव-दर-चुनाव राजनीतिक बहस,आरोप-प्रत्यारोप और चुनाव आयोग कीकार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हों,लेकिन 18 अगस्त 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय चुनाव प्रणाली और विशेष रूप से मतदाता पहचान व्यवस्था की सार्वजनिक प्रशंसा ने एक बिल्कुल अलग अंतरराष्ट्रीय तस्वीर सामने रख दी है।उन्होंने 2024 के भारतीय लोकसभा चुनाव में लगभग 64.6 करोड़ मतदाताओं की भागीदारी का उदाहरण देते हुए सेव अमेरिका एक्ट को पारित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।ट्रंप ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए अमेरिका में चुनाव सुधारों के लिए सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट यानी सेव एक्ट को आगे बढ़ाने की अपील की। ट्रंप ने भारत के विशाल चुनावी पैमाने का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब भारत इतनी बड़ी आबादी और करोड़ों मतदाताओं के साथ पहचान-आधारित चुनाव करा सकता है, तो अमेरिका में मतदाता पहचान को लेकर अधिक सख्त और एकसमान व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती।भारत की चुनावी विशालता अमेरिका के लिए मिसाल बन गई है,भारत का चुनाव मॉडल इसलिए असाधारण है क्योंकि यहां चुनाव केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि विशाल भौगोलिक, भाषाई,सामाजिक और जनसंख्या विविधता के बीच संवैधानिक लोकतंत्र को संचालित करने का सबसे बड़ा प्रशासनिक अभ्यास है। इलेक्शन कमिशन ऑफ़ इंडिया लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सात चरणों में मतदान कराया गया था।

साथियों, निर्वाचन आयोग के अनुसार मतदान के लिए ईपीआईसी यानी वोटर आईडी के अलावा पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस,पैन कार्ड,आधार सहित कई निर्धारित फोटो पहचान दस्तावेज स्वीकार किए जाते हैं। यानी भारत में मूल सिद्धांत यह है कि मतदाता की पहचान मतदान केंद्र पर सत्यापित होनी चाहिए, हालांकि यह समझना जरूरी है कि केवल वोटर आईडी ही एकमात्र स्वीकार्य दस्तावेज नहीं है।यही वह बिंदु है जिसने अमेरिकी राजनीतिक बहस को भारत की ओर देखने के लिए प्रेरित किया है। ट्रंप ने 18 अगस्त की सुबह अपने ट्रुथ सोशल पोस्ट में कहा कि इस महीने की शुरुआत में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से सवाल किया था कि अमेरिका वैध फोटो पहचान के बिना चुनाव कैसे कराता है। ट्रंप ने भारत के पिछले आम चुनाव का उल्लेख करते हुए लगभग 64.6 करोड़ मतदाताओं का आंकड़ा सामने रखा और कहा कि एक प्रतिशत से भी कम लोगों ने डाक के जरिए मतदान किया तथा प्रत्येक मतदाता के पास वैध फोटो पहचान दस्तावेज था। इसी तुलना को आधार बनाकर उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से सेव एक्ट पारित करने की मांग की।

साथियों बात अगर हम भारत और अमेरिका की चुनावी व्यवस्था में सबसे बड़ा अंतर क्या है? इसको समझने की करें तो, भारत और अमेरिका दोनों विश्व के महत्वपूर्ण लोकतंत्र हैं, लेकिन उनकी चुनावी संरचना एक जैसी नहीं हैभारत में चुनावों के संचालन के लिए एक केंद्रीयसंवैधानिक संस्था,निर्वाचन आयोग,की प्रमुख भूमिका है, जबकि अमेरिका में चुनावों का प्रशासन काफी हद तक राज्यों और स्थानीय चुनावी संस्थाओं के हाथ में है। यही कारण है कि अमेरिका में मतदाता पंजीकरण, पहचान संबंधी नियम,अर्ली वोटिंग एब्सेंटी वोटिंग और मेल – इन वोटिंग जैसी व्यवस्थाओं में राज्य-दर-राज्य अंतर दिखाई देता है।इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि अमेरिका में कोई एक समान राष्ट्रीय मतदान प्रक्रिया नहीं है, जबकि भारत में चुनाव संचालन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अधिक केंद्रीकृत संवैधानिक ढांचा मौजूद है।

भारत में मतदाता पंजीकरण के बाद मतदान केंद्र पर मतदाता की पहचान की जांच होती है। दूसरी ओर, अमेरिका में संघीय चुनावों के लिए पहचान और नागरिकता संबंधी नियमों का ढांचा अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकता है। यही अंतर ट्रंप के सेव एक्ट अभियान का मूल राजनीतिक मुद्दा बन गया है। व्हाइट हाउस स्वयं दावा करता है कि भारत और ब्राजील जैसे देश मतदाता पहचान को अधिक मजबूत पहचान- प्रणालियों से जोड़ते हैं, जबकि अमेरिका में नागरिकता के संबंध में व्यापक रूप से सेल्फ- अटेस्टेशन कीव्यवस्था पर निर्भरता रही है। हालांकि इस तुलना को सावधानी से समझना जरूरी है,भारत में भी आधार को अनिवार्य मतदाता पहचान के रूप में इस्तेमाल करने का अर्थ नहीं है; निर्वाचन आयोग मतदान के लिए कई वैकल्पिक फोटो पहचान दस्तावेज स्वीकार करता है।

साथियों बात अगर हम क्या है सेव अमेरिका एक्ट ?इसको समझने की करें तो,यहां एक महत्वपूर्णतथ्यात्मक स्पष्टता आवश्यक है। इसका आधिकारिक नाम सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट , संक्षेप में सेव एक्ट है। यह कोई स्वास्थ्य संबंधी सेव कानून नहीं, बल्कि अमेरिकी चुनावों में मतदाता पात्रता और नागरिकता सत्यापन से जुड़ा प्रस्तावित संघीय कानून है। इसका मूल उद्देश्य संघीय चुनावों में मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण अनिवार्य करना है। आधिकारिक विधायी रिकॉर्ड के अनुसार एच.आर.22 को 3 जनवरी 2025 को प्रतिनिधि सभा में पेश किया गया और 10 अप्रैल 2025 को सदन ने इसे 220-208 मतों से पारित कर दिया। इसके बाद यह सीनेट को भेजा गया। इसलिए इसे यह कहना सही नहीं होगा कि सेव एक्ट पहले ही पूर्ण संघीय कानून बन चुका है।प्रस्तावित कानून में अमेरिकी नागरिकता साबित करने के लिए विभिन्न दस्तावेजों की व्यवस्था की गई है, जिनमें वैध अमेरिकी पासपोर्ट, कुछ प्रकार के रियल आईडी -अनुरूप पहचान दस्तावेज, सैन्य पहचान एवं संबंधित रिकॉर्ड तथा सरकार द्वारा जारी कुछ अन्य दस्तावेज शामिल हैं। कानून का मूल लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि संघीय चुनावों में केवल पात्र अमेरिकी नागरिक ही पंजीकृत हों।

साथियों बात अगर हम मेल-इन वोटिंग पर भी सख्ती का प्रस्ताव को समझने की करें तो,सेव एक्ट की बहस केवल फोटो पहचान तक सीमित नहीं है। व्हाइट हाउस के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था में सामान्य मेल-इन बल्लोंट्स को सीमित करने और बीमारी, विकलांगता,सैन्य सेवा अथवा यात्रा जैसे विशेष मामलों में उन्हें अनुमति देने का प्रस्ताव है। साथ ही राज्यों को मतदाता सूचियों से गैर- नागरिकों के नाम हटाने के लिए व्यवस्था मजबूत करने की बात कही गई है।यहीं से अमेरिका की चुनावी बहस अधिक संवेदनशील हो जाती है। समर्थकों का तर्क है कि मतदान प्रक्रिया में नागरिकता और पहचान की मजबूत पुष्टि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को बढ़ाएगी। विरोधियों की चिंता है कि अत्यधिक दस्तावेजी बाध्यताएं उन वैध मतदाताओं के लिए मतदान कठिन कर सकती हैं जिनके पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए अमेरिकी बहस का वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि वोटर आईडी होना चाहिए या नहीं? बल्कि यह है कि पहचान और नागरिकता सत्यापन की व्यवस्था ऐसी कैसे हो जो चुनावी सुरक्षा भी बढ़ाए और पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार में अनावश्यक बाधा भी न डाले।

साथियों बात अगर हम ट्रंप का अमेरिक़ी फर्स्ट अब इंडिया इलेक्शन मॉडल से जुड़ता दिखाई दे रहा है,ट्रंप लंबे समय से अमेरिक़ी फर्स्ट की राजनीति केसमर्थक रहे हैं। लेकिन इस बार उनके चुनावी सुधार अभियान में भारत का उदाहरण सामने आना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जिस भारत की चुनावी प्रणाली को लेकर भारतीय राजनीति में लगातार बहस होती रहती है, उसी व्यवस्था को अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश में चुनावी सुधारों के पक्ष में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यहअतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना अमेरिकी चुनावी बहस का संदर्भ 18 अगस्त 2026 की ट्रंप टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने भारत-अमेरिका संबंधों की चर्चा को व्यापार,रक्षा,तकनीक और रणनीतिक साझेदारी से आगे बढ़ाकर लोकतांत्रिक चुनावी व्यवस्थाओं तक पहुंचा दिया है। ट्रंप ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के कथित सवाल का हवाला देकर अपने सेव एक्टअभियान को मजबूत करने की कोशिश की है और भारत के विशाल चुनावी अनुभव को अमेरिकी मतदाता पहचान बहस के केंद्र में ला दिया है।लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से कुछ सीखने की बात करे।आज सवाल केवल यह नहीं है कि अमेरिका भारत से क्या सीखेगा;बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत भी इस अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा को आत्ममुग्धता के बजाय अपनी चुनावी व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी, विश्वसनीय और आधुनिक बनाने के अवसर में बदलेगा? यही वह बिंदु है जहां अमेरिक़ी फर्स्ट की बहस में भारत का चुनावी मॉडल एक नई कड़ी जोड़ता दिखाई देता है डेमोक्रेसी फर्स्ट ,वोटर फर्स्ट और ट्रस्ट फर्स्ट। भारतीय लोकतंत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक उल्लेखनीय क्षण है।यहां एक दिलचस्प विरोधाभास भी दिखाई देता है।भारत में प्रत्येक बड़े चुनाव के बादईवीएम मतदाता सूची, चुनाव आयोग की निष्पक्षता मतदान प्रतिशत और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद उठते हैं। विपक्ष कई बार चुनाव आयोग से सवाल करता है और सत्ता पक्ष चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता का बचाव करता है। लेकिन उसी समय अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा भारत की मतदाता पहचान व्यवस्था को अमेरिकी चुनाव सुधार के संदर्भ में उद्धृत किया जाना यह संकेत देता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का मूल्यांकन केवल घरेलू राजनीतिक चश्मे से सटीकता से नहीं किया जाना चाहिए।

साथियों बात अगर हम क्या अमेरिका को भारत से सीखना चाहिए? इसको समझने की करें तो इस प्रश्न का उत्तर न तो पूरी तरह हां है और न ही पूरी तरह नहीं। भारत और अमेरिका की संवैधानिक संरचना, संघीय व्यवस्था,चुनावी इतिहास, मतदान पद्धति और प्रशासनिक ढांचे अलग हैं। इसलिए भारत की पूरी चुनाव प्रणाली को ज्यों का त्यों अमेरिका में लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा। लेकिन कुछ सिद्धांत अवश्य साझा किए जा सकते हैं,जैसे मतदाता की पहचान की विश्वसनीय पुष्टि, मतदाता सूची का नियमित शुद्धिकरण, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता, मतदान की ऑडिटेबिलिटी, मजबूत चैन ऑफ़ कस्टडी और मतदाता पात्रता की स्पष्ट पुष्टि।भारत का अनुभव यह दिखाता है कि विशाल पैमाने पर चुनाव कराना केवल कानून बनाने से संभव नहीं होता; इसके लिए चुनावी प्रशासन, सुरक्षा व्यवस्था, तकनीकी प्रणाली, प्रशिक्षित कर्मचारियों, मतदाता सूची प्रबंधन और चरणबद्ध मतदान की विशाल मशीनरी चाहिए। यही भारत की वास्तविक चुनावी क्षमता है।

साथियों, दूसरी ओर अमेरिका की चिंता भी समझना जरूरी हैँ, अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि लोकतंत्र में सबसे पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि चुनाव का फैसला उन्हीं नागरिकों द्वारा किया जाए जिन्हें कानूनन मतदान का अधिकार प्राप्त है। व्हाइट हाउस ने इसी उद्देश्य से नागरिकता सत्यापन, मतदाता पहचान और मेल – बैलट सुरक्षा को प्रमुख चुनाव सुधार मुद्दा बनाया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने मार्च 2026 में एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से संघीय चुनावों में नागरिकता सत्यापन और मेल /एब्सेंटी बैलट प्रक्रियाओं को अधिक सुरक्षित बनाने की दिशा में कदम भी उठाया था।लेकिन अमेरिकी व्यवस्था में राज्यों की संवैधानिक भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए संघीय स्तर पर एक समान कठोर नियम लागू करना राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से जटिल विषय है। सेव एक्ट के समर्थक इसे चुनावी सुरक्षा की जरूरत बताते हैं, जबकि आलोचक इसे मताधिकार पर संभावित अतिरिक्त बोझ के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि यह कानून अमेरिका में सिर्फ चुनाव सुधार का विषय नहीं बल्कि मताधिकार, संघवाद और नागरिक स्वतंत्रता की बहस भी बन गया है।

साथियों बात अगर हम भारत के लिए भी यह आत्ममंथन का अवसर है इसको समझने की करें तो,ट्रंप की टिप्पणी को केवल भारत की प्रशंसा मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।यह भारत के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है। यदि विश्व का सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश भारत की चुनावी पहचान प्रणाली से कोई तत्व सीखने योग्य मानता है,तो भारत को भी अपनी चुनावी व्यवस्था को लगातार अधिक पारदर्शी तकनीकी रूप से सुरक्षित और राजनीतिक रूप से विश्वसनीय बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत केवल इस बात में नहीं होती किचुनाव समय पर हो जाए; असली ताकत तब होती है जब मतदाता को विश्वास हो कि उसका नाम सही है, उसकी पहचान सुरक्षित है, उसका वोट सही तरीके से दर्ज हुआ है और परिणाम निष्पक्ष प्रक्रिया से निकला है। भारत ने दुनिया को सबसे बड़े पैमाने पर चुनाव कराने की क्षमता दिखाई है। अब अगली चुनौती इस क्षमता के साथ विश्वास की गहराई बढ़ाने की है।